समको की व्याख्या - Explanation of Eq
समको की व्याख्या - Explanation of Eq
डेलेन्स का इस संबध में विचार है कि विपणन अनुसंधान में विश्लेषण तथा व्याख्या दोनों चरण एक-दूसरे से इतने अधिक जुड़े हुए हैं कि यह कहना कठिन है कि कौनसा कहां से शुरू होता है तथा कहां पर अंत होता है यह आवश्यक है कि व्याख्या का बहुत-सा भाग विश्लेषण के भाग के रूप में सम्पादित किया जाता है विश्लेषण में संग्रहित तथ्यों का विस्तृत अध्ययन सम्मिलित होता है जो यह पता लगाता है कि उससे कौन से तथ्य और विचार उभरकर सामने आते हैं। दूसरी ओर व्याख्या में इन तथ्यों को तार्किक क्रम में प्रस्तुत किया जाता है जिससे कि उनकी वास्तविक महत्ता का पता लगाया जा सके। सम्पादन, सारणीयन तथा विश्लेषण के दौरान समकों की जांच एवं संशोधन किया जाता है।
इस प्रकार विपणन अनुसंधान के किसी क्षेत्र में संकलित समको के विश्लेषणात्मक अध्ययन से तर्कपूर्ण निष्कर्ष निकालना सम्मिलित है।
एक अर्थ में निवर्धन संकलित समकों के भीतर संबंधों से संबंधित है, जबकि अशत यह विश्लेषण के साथ जुड़ी हुई क्रिया है।"
सी. विलियम एमौर्य के अनुसार, समक के निवचन या व्याख्या में विश्लेपित समको से अनुमान एवं निष्कर्ष निकालना सम्मिलित है एक अर्थ में निवचन संकलित समंकों के भीतर संबंधों से संबंधित है, जबकि अंशत यह विश्लेषण के साथ जुड़ी हुई क्रिया है।" फेड एन. कलिंजर के अनुसार, समक व्याख्या में समक विश्लेषण से परिणाम निकालना तथा विशिष्ट समस्या के मद्देनजर उपयुक्त निष्कर्ष निकालना है।"
इस प्रकार अनुसंधान के किसी क्षेत्र में संकलित समको के विश्लेषणात्मक अध्ययन से तर्क पूर्ण निष्कर्ष निकालने तथा उनकी सार्थकता बतलाने की साख्यिकीय क्रिया को समंक का निवर्चन कहते है।
विपणन अनुसंधान में समको का निवर्चन या व्याख्या क्रिया का बहुत महत्व है। संकलित समको का विश्लेषण तभी उपयोगी होता है जब समको की किसी निष्पक्ष और योग्य विश्लेषक द्वारा व्याख्या की जाये वास्तव में समक स्वयं कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते है। ये मूक और अमूर्त होते हैं। उनसे परिणाम निकालना तथा आगे की कार्यवाही करना विश्लेषक के महत्वपूर्ण कार्य है।
जब व्याख्याकरण का कार्य प्रारम्भ होता है, तो सर्वे के निष्कपों को सर्वेक्षण की जा रही समस्या से संबंधित किया जाता है। प्रत्येक तथ्य की महत्ता को लक्ष्यों से सम्बद्ध किया जाना चाहिए। समकों के पुर्नमूल्यांकन करते रहने से जो सामान्यीकरण ज्ञात होते हैं,
वे स्वभावत निष्कपों के समान ही होते हैं। विभिन्न विचारों को समन्वित करके एक विस्तृत निष्कर्ष रूप में लिखा जा सकता है। उदाहरणार्थ, एक सर्वे की सूचनाओं के आधार पर यह स्पष्ट हो सकता है कि विक्रय में कमी का कारण यह हो सकता है कि ग्राहक की प्राथमिकता में परिवर्तन हो गया हो। यह मुख्य निष्कर्ष हो सकता है।
किंतु सहायता के रूप में परिवर्तन के कारणों का उल्लेख किया जा सकता है। अंत में, यह देख लिया जाना चाहिए कि विभिन्न तथ्य निष्कर्ष की पुष्टि से संबंधित ही है। इसके लिए निम्न बिंदुओं को ध्यान में रखना चाहिए
(i) क्या सहायक समक पर्याप्त है?
(ii) क्या किसी कारण की उपेक्षा कर दी गयी थी?
(iii) क्या कुछ असंगताएं हैं?
(iv) क्या निष्कर्ष में कहीं पक्षपात का तत्व विद्यमान है?
(v) क्या निष्कर्ष उत्तम है?
उपर्युक्त बिन्दुओं के संदर्भ में जब निष्कर्षो को ठीक प्रकार से देख लिया जाय तथा उन्हें सही पाया जाए तो उन्हें अनुसंधान से प्राप्त निष्कर्ष कहा जा सकता है। एक बार जब निष्कर्म जान लिया जाये तो समंकों को केवल प्रतिवेदन के रूप में लिखना शेष रह जाता है, जोकि विपणन अनुसंधान प्रक्रिया का अतिम महत्पूर्ण चरण है।
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