साख की मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्व - Factors affecting the amount of credit

साख की मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्व - Factors affecting the amount of credit


साख की मात्रा से तात्पर्य यह है कि किसी देश में वर्तमान परिस्थितियों में साख की पूर्ति तथा माँग कितनी है। साधारणतया साख की मात्रा निम्नलिखित बातों से प्रभावित होती है: 


(क) लाभ की दर यदि ऋण से निवेशक, उत्पादक तथा व्यवसायी को अधिक लाभ प्राप्त होता है, अथवा कैन्स के शब्दों में पूँजी की सीमान्त क्षमता अधिक है तो ऋण के लिए माँग अधिक होती है। ऋण की माँग अधिक होने पर ब्याज दर ऊँची होती है तथा ऋणों की पूर्ति बढ़ती है। 


(ख) व्यापार की दशाएं तेजी के काल में जब कीमते बढ़ रही होती है, व्यापारी भविष्य के लिए आशावादी होते है। इन परिस्थितियों में ब्याज दर ऊँची होती है तथा साख का प्रसार होता है।

इसके विपरीत, मंदीकाल में कीमते गिरने के कारण लाभ घटने लगते है तथा निराशा का वातावरण उत्पन्न होता है। ऋणों की माँग कम हो जाती है तथा साख की मात्रा कम होती है। 


(ग) सट्टेबाजी की स्थिति भविष्य में कीमते बढ़ने की आशा न होने पर सट्टा बाजार में अधिक सौदे होने लगते है तथा ऋणों की माँग बढ़ती है और साख का विस्तार होता है। भविष्य में कीमतें गिरने की सम्भावना होने पर ऋणों की मांग कम होती है तथा साख की मात्रा कम हो जाती है।


(घ) देश की राजनीतिक दशा- देश में शान्ति तथा सुव्यवस्था होने से आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलता है तथा ऋण की माँग एवं पूर्ति में वृद्धि होती है। अशान्ति तथा राजनीतिक अस्थिरता के वातावरण में साख की मात्रा कम हो जाती है।


(ङ) केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति साख की मात्रा पर केंद्रीय बैंकी की मौद्रिक नीति का बहुत अधिक प्रभाव पडता है। यदि सस्ती मुद्रा नीति के अंतर्गत बैंक दर कम कर दी जाती है तो बैंकों को भी ऋणों पर ब्याज दर घटानी पड़ती है जिसके परिणामस्वरूप साख का विस्तार होता है। केंद्रीय बैंक द्वारा ऊँची बैंक दर तथा साख नियंत्रण की नीति अपनाने पर साख की मात्रा में कमी होती है।


(च) देश की मुद्रा व्यवस्था देश की मुद्रा व्यवस्था सुव्यवस्थित होने पर साख का विस्तार होता है। मुद्रा व्यवस्था से अनिश्चितता तथा मूल्यों में अस्थिरता उत्पन्न होने की स्थिति में साख की मात्रा घट जाती है।


(छ) बैंकिंग प्रणाली का विकास बैंक साख का मुख्य स्त्रोत होते है। अतः बैंकिंग प्रणाली के विकसित होने पर साख का प्रसार होगा तथा अविकसित होने पर साख का मात्रा अधिक नहीं हो सकती। अल्प विकसित देशों में बैंकिंग प्रणाली भी प्राय अविकसित होती है तथा साख की मात्रा अपेक्षाकृत कम रहती है। उन्नत देशों में बैंकिग प्रणाली के विकसित होने के कारण साख का अर्थ व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान होता है।