विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कारक - Factors Affecting Exchange Rate

विनिमय दर को प्रभावित करने वाले कारक - Factors Affecting Exchange Rate


एक स्वतंत्र विनिमय बाजार में विदेशी विनिमय दर प्रायः विनिमय की साम्य दर से भिन्न होती है विनिमय दर की दीर्घकालीन प्रवृत्ति स्थिरता की होने पर भी अल्प काल में उच्चावचन होते ही रहते है जिनका आन्तरिक अर्थ व्यवस्था, विशेष रूप से उत्पादन, रोजगार तथा राष्ट्रीय आय की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है विनिमय दर में होने वाले उच्चावचनों के अनेक कारण हो सकते हैं जो अलग-अलग अथवा एक साथ तीन भागों में बांटे जा सकते है।


(i) विदेशी मुद्राओं की मांग और पूर्ति की स्थिति,


(ii) चलन सम्बन्धी दशाएं तथा


(iii) राजनीतिक स्थिति।


(क) विदेशी मुद्राओं की मांग तथा पूर्ति की स्थिति


विदेशी मुद्राओं की मांग तथा पूर्ति में परिवर्तन विनिमय दर को बहुत अधिक प्रभावित करते है। पूर्ति की तुलना में विदेशी विनिमय की माग अधिक होने पर विनिमय दर में वृद्धि की सम्भावना होती है। इसी प्रकार विदेशी विनिमय की पूर्ति इसकी मांग की अपेक्षा अधिक होने पर विनिमय दर में कमी हो सकती है अल्प काल में विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति पर निम्नलिखित बातों का प्रभाव पड़ता है।


(i) विदेशी व्यापार की स्थिति यदि किसी देश के निर्यात अधिक और आयात कम होते है तो विदेशों में उस देश की मुद्रा की मांग उसकी पूर्ति से अधिक होती है और स्वदेश में विदेशी मुद्रा की माग कम तथा पूर्ति अधिक होती है जिसके परिणामस्वरूप इस देश की मुद्रा को विदेशी मुद्राओं में मूल्य बढ़ जाता है।

इसके विपरीत, देश के आयात जब निर्यात की अपेक्षा अधिक होते हैं तो विदेशी विनिमय की मांग पूर्ति से अधिक होती है तथा विदेशी मुद्राओं का मूल्य देश की मुद्रा की तुलना में बढ़ जाता है। इस प्रकार व्यापार सन्तुलन की स्थिति विदेशी मुद्राओं की मांग तथा पूर्ति को प्रभावित करके विनिमय दर को भी प्रभावित करती है।


(ii) सट्टा बाजार तथा स्टॉक एक्सचेन्ज का प्रभाव भविष्य मे विनिमय दर में परिवर्तन की आशा से जब किसी देश के लोग अन्य देशों में स्टॉक, शेयर, अथवा प्रतिभूतियां खरीदने लगते हैं तो उनके भुगतान के लिए विनिमय की मांग बढ़ जाती है तथा विदेशी मुद्राओं के मूल्य में वृद्धि होती है।

इसके विपरीत जब विदेशी किसी देश में स्टॉक शेयर तथा प्रतिभूतियां खरीदने लगते है तो देश की मुद्रा का मूल्य ऊंचा उठ जाता है। इसी प्रकार ऋण, ब्याज तथा लाभांश के लेन-देन और सढ़े के रूप में होने वाले लेन-देन का भी विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति पर प्रभाव पड़ता है और विनिमय दर में परिवर्तन हो जाता है।


(iii) बैंकिंग प्रभाव विनिमय दर में परिवर्तन देश की बैंकिग नीति के भी परिणाम हो सकते है ऊँची ब्याज दर विदेशी पूंजी को आकर्षित करती है जिसके फलस्वरूप विदेशी मुद्राओं की पूर्ति मांग से अधिक हो जाती है तथा उनका देश की मुद्रा में मूल्य गिर जाता है। अन्य देशों की अपेक्षा किसी देश में बैंक दर नीची है तो इस देश की पूजी अन्य देशों में जाने लगेगी विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होने पर विनिमय दर गिर जायेगी।


(iv) मध्यस्थों की कियाएँ अथवा अंतरपणन कियाए जैसा कि पहले बताया गया है। अन्तरपणन कियाओं के अन्तर्गत मध्यस्थों द्वारा सस्ते बाजारों में विदेशी मुद्राए खरीदकर महगे बाजार में बेची जाती है। सस्ते विनिमय बाजारों में विदेशी विनिमय की मांग अधिक होती है तथा महंगे बाजार में पूर्ति अधिक ये कियाए विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति को प्रभावित करके विनिमय दर पर प्रभाव डालती है। 


(v) विदेशी विनियोग, ऋण तथा भुगतान: जब किसी देश द्वारा अन्य देश में पूंजी निवेश किया जाता है अथवा ऋण दिये जाते है अथवा अन्य किसी प्रकार के भुगतान किये जाते है तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाने के कारण देशी मुद्रा की विनिमय दर में वृद्धि की सभावना उत्पन्न होती है। स्थिति इसके विपरीत होने पर विनिमय दर में कमी हो सकती है।


उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारण भी विदेशी मुद्रा की मांग तथा पूर्ति को प्रभावित करते हैं, जैसे वास्तविक राष्ट्रीय आय देश की उत्पादन शक्ति एवं लागत मूल्य इत्यादि ।


(ख) चलन सम्बन्धी दशाएं


देश की चलन स्थिति का विनिमय दर पर प्रभाव पड़ता है। मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन्न होने पर मुद्रा की आंतरिक कय शक्ति गिर जाती है. अर्थात कीमत स्तर ऊंचा हो जाता है जिसके फलस्वरूप देश के निर्यात कम हो जाते हैं तथा आयात में वृद्धि होती है। विदेशी मुद्राओं की मांग अधिक हो जाने पर उनका मूल्य बढ़ जाता है तथा स्वदेशी मुद्रा की विनिमय दर गिर जाती है।

मुद्रा संकुचन का इसके विपरीत प्रभाव होगा तथा विनिमय दर बढ़ने लगेगी। कभी-कभी कोई देश स्वयं ही वैधानिक रूप से अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर देता है जिससे विनिमय दर कम हो जाती है। 


(ग) राजनीतिक स्थिति


यदि देश में स्थायी सरकार है, शान्ति और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था है, सरकारी नीति निष्पक्ष है, औद्योगिक सम्बन्ध अच्छे है तो ऐसे देश में अधिक विदेशी पूंजी का आगमन होगा तथा इससे विदेशी व्यापार का भी विस्तार होगा। ऐसी दशा में विनिमय दर इस देश के पक्ष में होगी। जिन देशों में निरन्तर गृह-क्लेश, युद्ध एवं राजनीतिक अस्थिरता एवं अशान्ति रहती है उनकी साख पर अन्य देशों को विश्वास नहीं रहता,

उन्हें विदेशी पूंजी अथवा ऋण प्राप्त नहीं होते जिससे उनकी आर्थिक स्थिति अस्थिर और संकटमय हो जाती है और उनकी मुद्राओं की विनिमय दर गिरने लगती है।


उपर्युक्त प्रभावों के अंतर्गत अल्प काल में विदेशी विनिमय दर में निरन्तर उच्चावचन होते रहते है। गिरती हुई विनिमय दर देश के लिए प्रतिकूल होती है. और बढ़ती हुई विनिमय दर देश के लिए अनुकूल होती है विनिमय दर अनुकूल होने की दशा में विदेशों से आयात करना सस्ता होता है परिणामस्वरूप आयात बढ़ जाते हैं और वस्तुओं की कीमत गिरने लगती है परन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रह पाती। आयात सस्ते होने पर देश में उत्पादन महंगा पड़ता है। अतः उद्योग बंद होने लगते हैं. बेरोजगारी फैलती है और निर्यात गिर जाते हैं। इन परिस्थितियों में व्यापार संतुलन देश के विपक्ष में हो जाता है और विनिमय दर में गिरावट आरम्भ हो जाती है। प्रतिकूल विनिमय दर की दशा में निर्यातों में वृद्धि होती है, व्यापार संतुलन अनुकूल होने लगता है तथा विनिमय दर बढ़ने लगती है। इस प्रकार दीर्घ काल में विनिमय दर की प्रवृत्ति विनिमय की साम्य दर के आस पास रहने पर होती है परन्तु अल्प काल में अस्थिरता बनी रहती है।