फर्म के आकार को निर्धारित करने वाले घटक - Factors Determining the size of Firm
फर्म के आकार को निर्धारित करने वाले घटक - Factors Determining the size of Firm
1. उस व्यवसाय विशेष या उद्योग विशेष की प्रकृति फर्म अथवा संस्था उद्योग विशेष का एक छोटा सा हिस्सा या अश हैं, अतः उसका आकार उस व्यवसाय विशेष या उद्योग विशेष की प्रकृति पर निर्भर करता है। कुछ उद्योग केवल बड़े पैमाने पर ही स्थापित हो सकते हैं जबकि कुछ उद्योग तब ही सफल हो सकते हैं जब वे छोट पैमाने पर स्थापित किये जायें। उदाहरणार्थ विद्युत उत्पादन एवं वितरण का कार्य इस्पात उद्योग, सीमेन्ट उद्योग आदि बड़े पैमाने पर ही सचालित किये जा सकते हैं जबकि बीड़ी निर्माण का व्यवसाय, बिस्कुट उद्योग आदि का संचालन यदि छोटे पैमाने पर किया जाये तो ज्यादा मितव्ययितापूर्वक सम्भव है।
2. व्यवसाय में पूँजी की आवश्कता- ऐसे व्यवसाय में जहाँ पर भूमि,
भवन, मशीन, संयन्त्र तथा कार्यशील पूँजी की अधिक मात्रा चाहिए अर्थात् इन कार्यों में अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है वह व्यवसाय बड़े पैमाने पर स्थापित किया जाता है, इसके विपरीत जिन व्यवसायों में उपर्युक्त कार्यों के लिए कम पूँजी की आवश्कता होती है उन्हें छोटे पैमाने पर भी स्थापित किया जा सकता है।
3. प्रबन्धको की कार्यक्षमता एवं योग्यता - आज के युग में उत्पादन के घटकों में प्रबन्ध भी एक महत्वपूर्ण एवं अन्य घटकों को प्रभावित करने वाला घटक है, यदि संस्था के प्रबन्धक अधिक कार्यक्षमता वाले एवं योग्य हैं तो व्यवसाय बड़े पैमाने पर स्थापित किया जा सकता है। कम कार्यक्षमता एवं योग्यता वाले प्रबन्धक होने पर व्यवसाय छोटे पैमाने पर स्थापित किया जा सकता है।
4. बाजार के विस्तार की भावी सम्भावनाएँ- यदि वस्तु ऐसी है जिसकी माँग भविष्य में बढ़ने की सम्भावना है तो ऐसी वस्तु के व्यवसाय को बड़े पैमाने पर स्थापित किया जामा है, इसके विपरीत यदि वस्तु फैशनेबल है तथा कुछ समय में फैशन परिवर्तित होने की सम्भावना हो तो व्यवसाय को छोटे पैमाने पर प्रारम्भ किया जाना चाहिए।
5. केन्द्र एवं राज्य सरकारों की उस उद्योग के प्रति नीति केन्द्र एवं राज्य सरकारे यदि उद्योग को प्रोत्साहन प्रदान करती हैं तो उस व्यवसाय को बड़े पैमाने पर स्थापित किया जाना चाहिए। ये प्रोत्साहन निम्न हो सकते हैं:
1. करों में छुट अथवा रियायत
2 सहायता एवं अनुदान
3. उत्पाद का न्यूनतम मूल्य निर्धारित करना
4. उत्पादन का कुछ भाग सरकार द्वारा कय करने का आश्वासन
5 उत्पादित माल के निर्याकी व्यवस्था करना
सरकार निम्न प्रतिबन्ध लगाकर उद्योग की प्रगति को सीमित कर सकते हैं-
1. करों की दर में वृद्धि
2. उत्पादन की अधिकतम मात्रा पर प्रतिबन्ध
3 उत्पाद का अधिकतम मूल्य निर्धारित कर देना
4. निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा देना
5 आयात खोल देना
6. निर्यात शुल्क में वृद्धि कर देना
7 आयात शुल्क में कमी कर देना ।
( 6 ) व्यवसाय विशेष में जोखिम की मात्रा - व्यवसाय में जोखिम की मात्रा अधिक होने से उसे छोटे पैमाने पर प्रारम्भ किया जाता है, इसके विपरीत यदि व्यवसाय में जोखिम कम है तो उसे बड़े पैमाने पर प्रारम्भ किया जाना चाहिए। इस तरह व्यावसायिक जोखिम एवं व्यवसाय के आकार में ऋणात्मक सह-सम्बन्ध पाया जाता है।
(7) साहसी की योग्यता एवं अनुभव - वास्तव में व्यवसाय के हानि-लाभ के लिए साहसी ही पूर्ण रूप से उत्तरदायी होते हैं, अतः यदि साहसी अधिक योग्य एवं अनुभवी होंगे तो व्यवसाय बड़े रूप में प्रारम्भ किया जा सकता है। इसके विपरीत यदि साहेसी नये हो तो व्यवसाय छोटे पैमाने पर प्रारम्भ किया जाना चाहिए।
( 8 ) उत्पादन प्रक्रिया स्वचालित होगी या हाथ से होगी उद्योग की उत्पादन प्रक्रिया पूर्ण रूप से स्वचालित एवं कम्प्यूटर से नियन्त्रित है तो व्यवसाय का आकार बड़ा होगा। यदि उत्पादन प्रक्रिया श्रम शक्ति से संचालित होती है तो उत्पादन की मात्रा कम रखना ही श्रेष्ठहैं।
( 9 ) बाजार में प्रतियोगिता की स्थिति बाजार में यदि पूर्ण प्रतियोगिता हो तो फर्म का आकार छोटा रखा जाता है तथा अपूर्ण प्रतियोगिता होने पर बड़ा आकार श्रेष्ठहै और यदि बाजार में एकाधिकार की स्थिति हो तो फर्म का आकार सबसे बड़ा होगा।
(10) कच्चे माल की पूर्ति - यदि कच्चा माल प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हो तो फर्म का आकार बड़ा रखा जाना चाहिए, इसके विपरीत यदि कच्चे माल के मिलने में बाधा हो तो फर्म का आकार छोटा रखा जाना चाहिए।
( 11 ) शक्ति के साधनों की सुगमता यदि सस्ते एवं पर्याप्त शक्ति के साधन हो तो फर्म का आकार बड़ा रखना ठीक है। इसके विपरीत यदि शक्ति के साधन महँगे एवं अपर्याप्त हो तो फर्म का आकार छोटा रखना ही उचित है।
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