आर्थिक वातावरण को प्रभावित करने वाले घटक या तत्व - Factors or elements affecting the economic environment

आर्थिक वातावरण को प्रभावित करने वाले घटक या तत्व - Factors or elements affecting the economic environment


देश की आर्थिक और राजकोषीय नीति


मौद्रिक नीति - जिस नीति के अनुसार किसी देश का मुद्रा प्राधिकारी मुद्रा की आपूर्ति का नियमन करता है उसे मौद्रिक नीति कहते हैं। इसका उद्देश्य राज्य की आर्थिक विकास एवं आर्थिक स्थायित्व सुनिश्चित करना होता है।


राजकोषीय नीति - सरकार के राजस्व संग्रह तथा व्यय के समुचित नियमन द्वारा अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा देना राजकोषीय नीति कहलाता है अतः राजकोषीय नीति के दो मुख्य औजार है कर स्तर एवं ढांचे में परिवर्तन तथा विभिन्न मदों मे सरकार द्वारा व्यय में परिवर्तन ।


मुद्रा प्रसार


मुद्रा स्फीति वह स्थिति है जिसमें मुद्रा का आंतरिक मूल्य गिरता है और वस्तुओं के मूल्य बढते है। यानी मुद्रा तथा साख की पूर्ति और उसका प्रसार अधिक हो जाता है। इसे मुद्रा प्रसार या मुद्रा का फैलाव भी कहा जाता है।


मुद्रा स्फीति को मुद्रा प्रसार भी कहा जाता है। सामान्यत मुद्रा प्रसार से आशय सरकार अथवा बैंक द्वारा आवश्यकता से अधिक मात्रा में नोट निर्गमन करने से होता है जिससे मुद्रा की इकाई का मूल्य गिर जाता तथा सामान्य मूल्य स्तर ऊंचा उठ जाता है। इस प्रकार मुद्रा प्रसार की स्थिति में मुद्रा की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि वस्तुओं तथा सेवाओं की मात्रा उसकी तुलना में कम रहती है। इससे सामान्य मूल्य स्तर बढ़ जाता है। इसे मुद्रास्फीति कहा जाता है। सामान्यतः मुद्रा के मूल्य मे कमी तथा सामान्य कीमत स्तर में वृद्धि को मुद्रास्फीति मान लिया जाता है,

परंतु कीमत स्तर मे होने वाली प्रत्येक वृद्धि को मुद्रास्फीति कहना उचित नहीं है। मूल्यों में वृद्धि मुद्रास्फीति की एक आवश्यक दशा है, परंतु मूल्यों में प्रत्येक वृद्धि को मुद्रास्फीति नहीं मानना चाहिए।


सामान्यतः मुद्रास्फीति के बढ़ने के कारणों को दो भागों (1) मौद्रिक आय में वृद्धि तथा (2) उत्पादन में कमी, में वर्गीकृत किया जाता है। मौद्रिक आय में वृद्धि होने पर मुद्रास्फीति का उत्पन्न होना स्वभाविक है मौद्रिक आय में वृद्धि सरकार की मौद्रिक नीति, घाटे की अर्थव्यवस्था, गैर विकासात्मक व्ययों में वृद्धि मुद्रा के चालान वेग में वृद्धि, व्यापारिक बैंकों की साख नीति में परिवर्तन करों में छूट ऋण वसूली में ढील एवं पूराने ऋणों के भुगतान, विदेशी पूंजी का आयत तथा वित्तीय अव्यवस्था आदि के कारण होती है।


मुद्रास्फीति के उत्पन्न होने का दूसरा कारण उत्पादन में कमी है। उत्पादन में कमी के प्रमुख कारण है- जनसंख्या में वृद्धि, उत्पति ह्रास नियम की क्रियाशीलता, प्राकृतिक संकट, औद्योगिक अशांति, तकनीकी परिवर्तन, सरकार की कर नीति सरकार की व्यापार नीति सरकार की औद्योगिक नीति, संग्रह की प्रवृत्ति, कच्चे माल का आभाव तथा उत्पादन ढांचा भारत में मुद्रास्फीति की गणना।


भारत में मुद्रास्फीति की गणना थोक मूल्य सूचकांक के आधार कर की जाती है। थोक मूल्य सूचकांक में परिवर्तन की दर मुद्रास्फीति कहलाती है। भारत में थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति औसत विधि तथा बिंदु दर बिंदु विधि से ज्ञात की जाती है।

औसत विधि के अंतर्गत 52 सप्ताह के मूल्स सूचकांक परिवर्तन की दर का औसत ज्ञात किया जाता है।


औसत विधि के अंतर्गत मुद्रास्फीति की गणना करते समय चालू वर्ष के कीमत सूचकांक में परिवर्तन की तुलना पिछले वर्ष में कीमत सूचकांक में हुए परिवर्तन से न करके आधार वर्ष में हुए परिवर्तन से की जाती है, जबकि वास्तव में मूल्य स्तर में परिवर्तन की तुलना पिछले वर्ष के मूल्य स्तर की जानी चाहिए। इसी दोष को दूर करने के लिए बिंदु दर बिंदु विधि का प्रयोग किया जाता है।


भारत में औसत विधि और बिंदु दर बिंदु विधि दोनों के द्वारा मुद्रास्फीति की गणना की जाती है परंतु बिंदु दर बिंदु विधि को आर्थिक संकेतक या वास्तविक विधि के रूप में स्वीकार किया गया है।