क्षेत्रीय असंतुलन की विशेषताएं - Features of regional imbalance

क्षेत्रीय असंतुलन की विशेषताएं - Features of regional imbalance


• जनसंख्या वृद्धि में असंतुलन


• जनसंख्या घनत्व में असमानता


• साक्षरता दर में असंतुलन


• शहरी जनसंख्या में असमानता


• प्रति व्यक्ति आय में असमानता


• कृषि क्षेत्र में असमानता


• औद्योगिक क्षेत्र में असमानता


• प्राकृतिक साधनों के प्रयोग में असमानता


• विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में असमानता


• वित्तीय व्यवस्था में असमानता


• मानव विकास सूचकांक में असमानता


(v) प्रति व्यक्ति आय में असमानता - भारत में विभिन्न राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में काफी असमानताएं है।

केंद्र शासित प्रदेशों में यह दिल्ली में सबसे अधिक रु. 201083 है


(vi) कृषि क्षेत्र में असमानता:- भारत में कृषि क्षेत्र में भी विषमता है।

पंजाब तथा हरियाणा कृषि क्षेत्र में अधिक विकसित राज्य है। इन दोनों राज्यों द्वारा कुल गेहूं के उत्पादन का लगभग एक तिहाई भाग उत्पन्न किया जाता है। इन राज्यों में हरित क्रान्ति का प्रभाव दिखाई देता है, परंतु कुछ राज्यों में हरित क्रांति का कोई प्रभाव नजर नहीं आता, जैसे कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि। इसलिए ये राज्य कृषि दृष्टि से पिछड़े हुए राज्य हैं।


(vii) औद्योगिक क्षेत्र में असमानता भारत में औद्योगिक क्षेत्र में भी क्षेत्रीय असंतुलन है। - औद्योगिक दृष्टि से महाराष्ट्र सबसे अधिक विकसित राज्य है। इसके द्वारा कुल औद्योगिक उत्पादन के 25 प्रतिशत भाग का उत्पादन किया जाता है।

पंजाब में बड़े उद्योगों की अपेक्षा लघु उद्योग काफी मात्रा में है। इसलिए पंजाब का भी औद्योगिक क्षेत्र में विशेष स्थान है। कुल 12 राज्यों (महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक) में कुल कारखाना उत्पादन का 83 प्रतिशत भाग पैदा होता है। इस प्रकार ये 12 राज्य औद्योगिक दृष्टि से काफी विकसित है। शेष राज्य तथा संघीय प्रदेश केवल 17 प्रतिशत भाग उत्पन्न करते हैं। इसलिए ये राज्य औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए है।


(viii) प्राकृतिक साधनों के प्रयोग में असमानता भारत में अनेक राज्य जैसे उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश प्राकृतिक साधनों की दृष्टि से काफी संपन्न हैं।

परंतु ये राज्य पिछड़े हुए राज्य कहलाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इन राज्यों में विभिन्न प्राकृतिक साधनों, जैसे वन, जल, खनिज भूमि का पूर्ण रूप से प्रयोग नहीं होता है वास्तव में इन राज्यों में प्राकृतिक साधनों का उचित उपयोग नहीं हो पाता। इसलिए ये राज्य साधन सम्पन्न होते हुए भी विकास की दृष्टि से पिछड़े हुए रहते हैं।


(ix) अधोसंरचना में असंतुलन:- अधोसंरचना के अंतर्गत यातायात, संचार, विद्युत, सिंचाई की सुविधाएं तथा निर्माण कार्य आते है। अधोसंरचना की दृष्टि से भारत में काफी असमानताएं है। पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल, गुजरात, इत्यादि राज्यों में अधोसंरचना की स्थिति काफी अच्छी है। इसलिए इन राज्यों में तीव्र गति से विकास हो रहा है। शेष राज्यों में अधोसंरचना की स्थिति संतोषजनक नहीं है। परिणामस्वरूप इन राज्यों में विकास गति भी धीमी है


(x) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में असमानता- 1991 में नई आर्थिक नीति को अपनाया गया। तब से अब तक भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में काफी वृद्धि हुई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सबसे अधिक हिस्सा कुछ राज्यों जैसे देहली, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तथा आंध्र प्रदेश को प्राप्त हुआ है। इसलिए इन राज्यों में विकास तीव्र गति से हो रहा है। यही कारण है कि उड़ीसा, बिहार, उत्तरांचल, झारखंड इत्यादि राज्य पिछड़ गए हैं।


(xi) वित्तीय व्यवस्था में असमानता कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, इत्यादि राज्यों की सरकारों ने लोगों को लुभाने के लिए ऐसी नीतिया लागू की है जिससे सरकारी खजाने खाली हो गए।

पंजाब सरकार ने भी पंजाब में किसानों को बिजली तथा पानी मुफ्त देकर राज्य की आर्थिक स्थिति खराब कर दी हैं। इन राज्य सरकारों ने गैर विकासात्मक व्यय को कम करने तथा आय के साधनों को बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। इसलिए ये पिछड़े रह गए हैं। इसके विपरीत गोआ, कर्नाटक, तमिलनाडु इत्यादि राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इनकी वित्तीय स्थिति अच्छी है। इसलिए ये राज्य विकास के पथ पर अग्रसर है। वास्तव में राजस्व का बहुत बड़ा भाग कर्मचारियों के वेतन, पेन्शन भुगतान, ब्याज तथा सब्सिडी का भुगतान करने पर व्यय कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप राज्यों की केंद्रीय सरकार पर निर्भरता तथा सरकारी वित्तीय भुगतानों के कारण कुछ राज्य पिछड़े हुए बन कर रह गए हैं।


(xii) मानव विकास सूचकांक में असंतुलन- यूएन. डी. पी. की रिपोर्ट के अनुसार मानव विकास के तीन मुख्य अंग हैं- (i) साक्षरता, (ii) जीवन प्रत्याशा, (iii) जीवन स्तर इन तीनों के आधार पर मानव विकास सूचकांक तैयार किया जाता है। 2011 में भारत के मानव विकास के सूचकाक का मूल्य 0.504 था । यदि 2011 की रिपोर्ट के अनुसार 15 राज्यों में मानव विकास के सूचकांक की तुलना करें तो पता चलता है कि विभिन्न राज्यों में काफी असमानताएं हैं केरल में मानव विकास सूचकांक का मूल्य सबसे अधिक (0.625 ) है तथा उड़ीसा में सबसे कम ( 0442) है।