इस आंदोलन की धीमी प्रगति के मुख्य कारण निम्नलिखित है- Following are the main reasons for the slow progress of this movement.

इस आंदोलन की धीमी प्रगति के मुख्य कारण निम्नलिखित है- Following are the main reasons for the slow progress of this movement.


(क) सरकार का अधिक हस्तक्षेप दूसरे देशों में सहकारी बैंकिंग का जन्म सदस्यों की इच्छा के परिणामस्वरूप हुआ था। परंतु भारत में यह सरकार द्वारा चलाया जाता था और सरकार का इस पर अब भी बहुत अधिक नियंत्रण है। जनता इसे सरकारी काम समझती है। वह सहकारी बैंकों को कर्जा प्राप्त करने का साधन मानती है तथा कर्जे के रुपयों को सरकारी रुपया समझती है। इसलिए इन बैंकों का उचित विकास नहीं हो पाता है। 


(ख) सहकारिता के सिद्धांतों के ज्ञान का अभाव- भारत में सहकारी बैंकिग का विस्तार मुख्य रूप में गांवों में हुआ है। हमारी ग्रामीण जनता सहकारिता का सच्चा अर्थ उनके उद्देश्य व आधार को नहीं समझती है।

इस कारण वे सहकारिता को भली-भाँति नहीं समझ पाते और इसके विकास में कोई रुचि नहीं रखते है।


(ग) धन की कमी - भारत में सहकारी बैंको के पास धन की कमी होती है, क्योंकि सदस्य अधिक धन नहीं बचा पाते है। केंद्रीय संस्थाओं के पास भी जनता कम ही धन जमा करती है धन की कमी के कारण ये बैंक सदस्यों की बहुत कम आवश्यकताएँ पूरी कर पाते हैं। 


(घ) केवल उत्पादक ॠण सहकारी बैंक केवल उत्पादन कार्यों के लिए ऋण देते है। किसानों को अपनी दूसरी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए महाजनों पर निर्भर रहना पड़ता है।


(ड) अशिक्षा- भारत में व्यापक अशिक्षा के कारण सहकारी बैंकिग की प्रगति काफी धीमी हो गई है।

इन बैंकों को चलाने के लिए शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। कई बार गाँवों में सहकारी समितियों के लिए शिक्षित सेक्रेटरी मिलना भी कठिन हो जाता है। शिक्षा के अभाव में कई समितियाँ असफल हो गई है।


(च) स्वार्थी लोगों द्वारा विरोध:- स्वार्थी लोगों द्वारा सहकारी बैकिंग का विरोध किया जाता है। गाँवों में महाजन तथा मण्डियों में व्यापारी इसका काफी विरोध करते हैं। 


(छ) अकुशल प्रबंध: भारत में अधिकतर बैंकों के पदाधिकारी प्रशिक्षित नहीं होते। इसलिए वे बैंकों का काम ठीक प्रकार से नहीं चला पाते कर्जे देने में काफी देर की जाती है, उनकी वसूली के लिए भी विशेष प्रयत्न नहीं किया जाता 


(ज) भ्रष्टाचार तथा पक्षपात - सहकारी बैंकों में भ्रष्टाचार तथा पक्षपात की बुराई पाई जाती है। पदाधिकारी अधिकतर अपने रिश्तेदारों, मित्रों और कृपापात्रों को कर्जा देते हैं। 


(झ) दलबंदी - अधिकतर बैंको के संगठन में दलबदी पाई जाती है। इसके कारण बैंकों का कार्य ठीक रूप से नहीं चल पाता। 


(ञ) ऋण लौटाने में देरी - सहकारी बैंकों के अधिकतर सदस्य ठीक समय पर अपने ऋण वापिस नहीं करते हैं जिसके फलस्वरूप कुछ सदस्यों पर बहुत अधिक कर्जा जमा हो जाता है। इससे इन ऋणों के कार्यों में बाधा पड़ती है। ऋणों के बहुत अधिक मात्रा से समय पर वापिस न होने की बुराई सहकारी बैंकिंग का एक मुख्य दोष है।


(ट) दोषपूर्ण लेखा निरीक्षण इन बैंकों के हिसाब-किताब की जाँच ठीक प्रकार से नहीं हो पाती। अधिकतर बेईमान पदाधिकारियों द्वारा हिसाब-किताब में गड़बड़ की जाती हैं। 


(ठ) असीमित दायित्व - बैंकों का दायित्व असीमित होने के कारण धनी लोग इसके सदस्य नहीं बनते। इस कारण इसके पास आर्थिक साधनों का अभाव रहता है।


(ड) बचत का अभाव - इन बैंकों में लोग अपनी बचत को कम जमा कराते हैं। ये बैंक केवल ऋण लेने की एजेंसियां ही समझे जाते हैं। इन्हें अपनी पूँजी के लिए बाहरी साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।


(ढ) समन्वय का अभाव - भारत में प्राथमिक, केंद्रीय तथा राज्य सहकारी बैंकों में समन्वय का अभाव पाया जाता है। इस कारण इनके कार्यों में बाधा पड़ती है। 


(ण) क्षेत्रीय असमानता भारत मे सहकारी बैंकिंग के संबंध में बहुत अधिक क्षेत्रीय असमानता पाई जाती है। सहकारी ऋण का 70 प्रतिशत भाग आठ राज्यों, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, केरल द्वारा किया जाता है। बाकी राज्यों में सहकारी बैंकिंग का उचित विकास नहीं हो पाया है।