सार्थकता परीक्षण की सामान्य प्रक्रिया - General Procedure for Testing Significance

सार्थकता परीक्षण की सामान्य प्रक्रिया - General Procedure for Testing Significance


सार्थकता परीक्षण की सामान्य प्रक्रिया निम्न प्रकार है:-


1. समस्या प्रस्तुतिकरण सर्वप्रथम समस्या को स्पष्ट रूप से लिपिबद्ध कर लिया जाता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस संबंध मे साख्यिकीय निर्णय लेना है परिकल्पना स्वीकार करने या अस्वीकार करने के सबंध में या प्रतिदर्शज औ प्राचल के अंतर की सार्थकता की जांच करने के संबंध में।


2 शून्य परिकल्पना का निर्धारण समस्या प्रस्तुतिकरण के बाद अगला चरण परिकल्पना का निर्धारण है। परिकल्पना दो प्रकार की हो सकती है-


(i) शून्य परिकल्पना तथा


(ii) वैकल्पिक परिकल्पना


शून्य परिकल्पना के अतर्गत यह माना जाता है कि प्राचल और प्रतिदर्शज में एक निश्चित माप के संबध में कोई अंतर नही है जो अंतर है वह केवल निदर्शन उच्चावचना के कारण ही है, किसी अन्य कारण से नहीं। उदाहरणार्थ यदि हम दो दवाइओ के बारे में यह निर्णय होना चाहें कि इनमें एक ज्यादा प्रभावकारक है और दूसरी कम तो हम इस परिकल्पना का चुनाव करेंगे कि दोनों दवाइयों के प्रभाव के बीच का अंतर सार्थक नहीं है और यह अंतर केवल निदर्शन उच्चावचनों के परिणामस्वरूप है। इसी प्रकार कैंसर की नई दवा की सफलता का मूल्यांकन करने से पहले यह मान लेना कि उस दवा से कोई भी लाभ नहीं है. शून्य मान्यता होगी। संक्षेप में, जब हम किसी परिकल्पना का चुनाव केवल उसे स्वीकार करने के उद्देश्य से ही करते है कि वह शून्य परिकल्पना कहलाती है।

इसके विपरीत, वैकल्पिक परिकल्पना वह है जिसे साख्यिकीय स्वीकार करना चाहता है या जिसकी सत्यता में वह विश्वास करता है।


3. सार्थकता स्तर का चुनाव अगला कदम पूर्व स्थापित परिकल्पना की जांच एक पूर्वनिर्धारित सार्थकता स्तर पर करना है। वास्तव में, सार्थकता परीक्षण की सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रायिकता सिद्धान्त पर आधारिक है। अतः जो भी निर्णय लिया जाता है वह प्रायिकता के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है। इसके लिए किसी यथोचित स्तर का चुनाव कर लिया जाता है।


4. संबंधित प्रमाप त्रुटि का परिकलन सार्थकता स्तर के चुनाव के बाद सबंधित प्रतिदर्शज की प्रमाप त्रुटि का परिकलन किया जाता है। 


5. सार्थकता अनुपात की गणना प्रतिदर्शज और प्राचल के अंतर को प्रमाण त्रुटि से भाग देकर सार्थकता अनुपात शांत कर लिया जाता है।


6 निर्वचन प्रमाप त्रुटि के परिकलन के पश्चात् सबंधित अनुपात का मान निकालकर, वह किस सीमा में स्थित है, यह जांच की जाती है और सार्थकता स्तरों के अनुसार शून्य परिकल्पना को अस्वीकृत किया जाता है।


(iii) काई वर्ग परीक्षण दो गुणों की स्वतन्त्रता की जांच करने के लिए काई वर्ग का प्रयोग किया जाता है। यह प्रेक्षित या वास्तविक आवृत्तियों और तत्सवादी प्रत्याशित या सैद्धान्तिक आवृत्तियों के अंतर का माप है काई वर्ग बटन से हमें यह प्रमाणिक रूप से पता चलता है कि एक विशिष्ट क्षेत्र में अवलोकन व प्रत्याशा का अंतर केवल संयोग के कारण है या हमारी आधारभूत परिकल्पना के गलत होने के कारण है।