वैश्वीकरण / अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय की रणनीतिया - Globalization / International Business Strategies
वैश्वीकरण / अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय की रणनीतिया - Globalization / International Business Strategies
विभिन्न कंपनियां वैश्वीकरण की भिन्न रणनीतिया अपनाकर अपने व्यवसाय को वैश्विक स्तर पर फैलाती हैं। कुछ कंपनियां अलग अलग देशों में वैश्वीकरण की भिन्न भिन्न रणनीतियां अपनाती है। वैश्वीकरण की मुख्य रणनीतियां निम्नलिखित है
(क) निर्यात करना
निर्यात द्वारा व्यवसाय को वैश्विक स्तर पर फैलाना वैश्वीकरण की एक पुरानी रणनीति है प्रारंभ में घरेलू कंपनी एक ही देश को अपने उत्पाद निर्यात करती है। फिर धीरे-धीरे यह अपने उत्पाद अन्य देशों को निर्यात करके अपने व्यवसाय को कई देशों में फैला कर वैश्विक स्तर की व्यावसायिक इकाई बन जाती है। यदि घरेलू कंपनी की उत्पादन क्षमता पूर्ण रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था में प्रयोग नहीं हो पाती है
तथा उसकी उत्पादन लागत अन्य देशों की व्यावसायिक इकाईयों की तुलना में कम है तो वह अपनी अप्रयुक्त उत्पादन क्षमता का पूर्ण लाभ उठाने के लिए उसका निर्यात करना शुरू कर देती है। किसी एक देश में उत्पादन लागत अन्य देशों की तुलना में विभिन्न कारणों से कम हो सकती है, जैसे-कम श्रम लागत, उच्च क्वालिटी के कच्चे माल की अधिक उपलब्धता, अच्छी तकनीक की उपलब्धता आदि ।
(ख) लाइसेंसिंग फ्रेंचाइजिंग
लाइसेंसिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई अपनी बौद्धिक संपदा, जैसे-पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट आदि का प्रयोग करने का अधिकार किसी अन्य देश की व्यावसायिक इकाई को प्रदान करती है। लाइसेंस प्राप्त करने वाली व्यावसायिक इकाई को एक निश्चित समय अवधि के लिए रॉयल्टी या फीस देती है।
अधिकतर देशों में रॉयल्टी की यह दर विकय के 5 प्रतिशत से 8 प्रतिशत मध्य होती है। लाइसेंसिंग समझीते से लाइसेंस धारक अपनी बौद्धिक संपदा का अधिकतम प्रयोग करके लाभ कमा सकती है। इसी तरह लाइसेंस प्राप्तकर्ता भी रॉयल्टी का भुगतान करके आधुनिकतम टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके लाभन्वित हो सकता है।
फेचाइजिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई किसी दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई को विधिवत ढंग से व्यवसाय करने का अधिकार प्रदान करती है। इसमें फ्रेंचाइजी फ्रेंचाइजर के बाड नाम से उत्पाद व सेवाएं बेच सकती है। कई बार फ्रेंचाइजर कुछ मुख्य उपकरण व कलपुर्जे फ्रेंचाइजी को उपलब्ध करवाता है। कुछ दशाओं में फेंचाइजर दूसरे देश में डीलरों की नियुक्ति करता है। उदाहरण के लिए सॉफट ड्रिंक निर्माता जैसे पेप्सी, कोका कोला अपने उत्पाद का सिरप दूसरे देशों में ऊंचाइजी को उपलब्ध करवाते है। फचाइजी इकाई का अपना बॉटलिंग प्लाट होता है। जहां वे सिरप से सॉफ्ट ड्रिंक बनाकर बोतलों में पैक करके फ्रेंचाइजर के ब्रांड नाम से इसे बेचते हैं।
(ग) उत्पादन समझौता :
इस रणनीति में विश्व स्तर पर विपणन का कार्य करने वाली कंपनी किसी विदेशी कंपनी के साथ निर्धारित प्रमापों के अनुसार, उत्पाद को उसके द्वारा बनाने का समझौता करती है तथा उस उत्पाद के विपणन का दायित्व स्वयं लेती है। अर्थात उत्पाद का निर्माण तो घरेलू इकाई करती है परन्तु उत्पाद के विपणन कार्य का दायित्व विदेशी कंपनी लेती है। इस रणनीति से विदेशी कंपनी अन्य देशों में बिना अपनी निर्माणी इकाई स्थापित किए अपने व्यवसाय को अन्य देशों में फैला सकती है। यदि किसी देश में इसका व्यवसाय अधिक नहीं चलता है, तो विदेशी कंपनी बड़ी सरलता से उस देश में अपना व्यवसाय बंद कर सकती है क्योकि वहाँ उसकी कोई अपनी निर्माणी इकाई नहीं है।
(घ) संयुक्त उपक्रम
विदेशी बाजार में प्रवेश लेने के लिए यह रणनीति बहुत प्रचलित है। संयुक्त उपकम में विदेशी साझेदार घरेलू साझेदार के साथ मिलकर व्यावसायिक इकाई स्थापित करता है।
इस संयुक्त उपक्रम का स्वामित्व व प्रबंधकीय अधिकार, दोनों साम्रदारों के आय स्तर, फैशन, पसद प्राथमिकता आदि के बारे में ज्ञान होता है। उसके पास व्यवसाय को चलाने के लिए आधारभूत सुविधाएं जैसे- निर्माणी इकाई, वितरण नेटवर्क, सेवा केन्द्र आदि होते हैं। यदि विदेशी साझेदार विकसित देश से होता है तो उसके पास उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी व तकनीकी विशेषज्ञ होते है घरेलू इकाई अपनी निर्माणी इकाई, अपना वितरण नेटवर्क, स्थानीय श्रम आदि उपलब्ध करवाती है। संयुक्त उपक्रम का लाभ विदेशी साझेदार व घरेलू इकाई आपस में निर्धारित अनुपात में बाँटते हैं।
(ङ) प्रबन्धकीय समझौता:
इस समझौते के अंतर्गत विदेशी कंपनी किसी अन्य देश में अपनी प्रबंधकीय एजेसिया स्थापित करती है। इन प्रबंधकीय एजेंसियों की सहायता से यह अन्य देशों की व्यावसायिक इकाइयों में बिना अपनी पूंजी निवेश किए इन्हें प्रबंधित करती है
अर्थात इस समझौते में केवल प्रबंधकीय जानकारी ही उपलब्ध करवाई जाती है। इस सेवा के बदले विदेशी कंपनी घरेलू कंपनी से लाभ का कुछ प्रतिशत या एकमुश्त राशि फीस के रूप में लेती है।
(च) पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां:
कुछ विदेशी कंपनिया अन्य देशों में अपने पूर्ण स्वामित्व वाली निर्माणी इकाइयां स्थापित करती है। इन सहायक कंपनियों की पूर्ण पूजी विदेशी कंपनी क पास ही होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनिया वैश्वीकरण की इस रणनीति को तब अपनाती है, जब वे निर्माण कियाओं व विपणन कियाओं पर अपना संपूर्ण नियंत्रण रखना चाहती है। यह रणनीति वैश्वीकरण की अन्य रणनीतियों से इस प्रकार भिन्न है कि इसमें निर्माणी इकाई भी विदेशी कंपनी द्वारा ही लगाई जाती है। जैसे- एल. जी. इलेक्ट्रॉनिक्स ने भारत में एल. जी. इण्डिया से संपूर्ण निर्माणी इकाई सहायक कंपनी के रूप में स्थापित की है
इस सहायक कंपनी की संपूर्ण निर्माणी क्रियाए भारत में ही की जाती है। मूल कंपनी के ब्रांड नाम से ही सहायक अपने उत्पाद बेचती है।
(छ) संग्रहण समझौते.
वैश्वीकरण की इस रणनीति में विदेशी साझेदार मूल उपकरण व पुर्जे उपलब्ध करवाता है, परंतु इनका संग्रहण दूसरे देश में किया जाता है। प्राय विकसित देश की व्यावसायिक इकाई मूल उपकरण उपलब्ध करवाती हैं, जबकि इनका संग्रहण विकासशील देश में किया जाता है। इस प्रकार इस समझौते से विकासशील देश की सस्ती अम लागत का लाभ मिल जाता है। विकासशील देश में इस संग्रहित उत्पाद को विकसित देश के ब्राड नाम से ही बेचा जाता है। इस समझौते से आयात कर की भी बचत होती है,
क्योंकि विदेशों से आयातित उपकरणों पर आयात कर तैयार उत्पादों की तुलना में कम होता है। वैश्वीकरण की इस तकनीक में मेजबान देश में राजनैतिक विरोध भी कम होता है, क्योंकि इसमें उपकरणों को विकासशील देश में ही संग्रहित करने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं। विकासशील देशों में संग्रहण करके तैयार उत्पादों को न केवल यहा के बाजार में ही प्रयोग किया जाता है अपितु वहां से ये अन्य देशों को निर्यात भी किए जाते है इससे विकासशील देशों के निर्यात बढ़ते है।
(ज) अन्य देशों में विलयन व अधिग्रहण:
ऐसे विलयन व अधिग्रहण विभिन्न देशों की व्यावसायिक इकाइयों के बीच होते है विलयन के अंतर्गत पाय एक स्तर पर कार्यरत व एक ही तरह के व्यवसाय में संलग्न ध्यावसायिक इकाइया,
आपसी प्रतिस्पर्धा को रोकने हेतु व दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक सुदृढ़ता के लिए मिलकर एक ही इकाई में परिवर्तित हो जाती है विलयन के बाद वे बड़े स्तर की बचतों के लाभ उठाती है। विदेशी अधिग्रहण के अंतर्गत प्राय: एक देश की बड़ी व्यावसायिक इकाई अन्य देश की किसी व्यावसायिक इकाई (जो पहली इकाई से तुलनात्मक रूप में छोटी होती है) का अधिग्रहण करती है, जैसे- भारत की टाटा स्टील कंपनी ने यूरोप की कोरस स्टील कंपनी का अधिग्रहण किया। इसी तरह भारती एयरटेल ने अफ्रीका में जेन्ज टेलीकॉम ऑपरेशन्स का अधिग्रहण किया। इस प्रकार विदेशों में विलयन व अधिग्रहण द्वारा अन्य देशों में स्थापित व्यावसायिक इकाईयों की निर्माणी इकाइयों व विपणन आधार पर तुंरत पहुंच बन जाती है तथा विदेशी प्रतिस्पर्धा में भी कमी आती है।
(झ) तीसरा देश रूट / स्थान:
वैश्वीकरण की इस रणनीति का प्रयोग दो देशों के मध्य मैत्रिक संबंधों का लाभ उठाने के लिए किया जाता है।
इस रणनीति में एक देश दूसरे देश में प्रत्यक्ष निवेश न करके पहले तीसरे देश में निवेश करता है, तदोपरांत यह निवेश लक्षित देश में किया जाता है। ऐसा लक्षित देश व दूसरे देश के मध्य मैत्रिक सबंधों के कारण निवेश पर उपलब्ध रियायतो व छूटों का लाभ उठाने के लिए किया जाता है जैसे भारत में मॉरिशस से मैत्रिक सबंधों के कारण मॉरिशस से आए निवेश पर करों में छूट व रियायतें दी जाती है इस मैत्रिक समझौते का लाभ उठाने के लिए देश जैसे- जापान, इंग्लैंड, यू.एस.ए. आदि भारत में सीधा निवेश न करके पहले मॉरिशस में निवेश करते हैं. तदोपरांत मॉरिशस से भारत में निवेश किया जाता है। इससे मॉरिशस से आए निवेश पर करो में रियायतों का लाभ अन्य देशों को मिल जाता है। वैश्वीकरण की इस रणनीति को उस दशा में भी अपनाया जाता है, जब मूल निवेशक देश व लक्षित देश के मध्य राजनैतिक या व्यापारिक संबंध अच्छे नहीं है। जैसे मान लो देश A व B के मध्य संबंध अच्छे नहीं हैं। परंतु देश A का निवेशक देश B में या देश B का निवेशक देश A में निवेश करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में तीसरे देश के रूट से लक्षित देश में निवेश किया जाता है।
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