मानव पूंजी और मानव विकास - Human Capital and Human Development

मानव पूंजी और मानव विकास - Human Capital and Human Development


ये दोनों पारिभाषिक शब्द मिलते-जुलते भले ही प्रतीत होत है, पर इनके बीच स्पष्ट अंतर है। मानव पूजी की अवधारणा शिक्षा और स्वास्थ्य को श्रम की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम मानती है। मानव विकास इस बात आधारित है कि शिक्षा तथा स्वास्थ्य मानव कल्याण के अभिन्न अंग हैं, क्योंकि जब लोगों को शिक्षा तथा सुदीर्घ स्वस्थ जीवन यापन की क्षमता आती है तभी वह ऐसे अन्य चयन करने में सक्षम हो पाते हैं, जिन्हें वे महत्वपूर्ण मानते है। मानव पूजी का विचार मानव को किसी साध्य की प्राप्ति का साधन मानता है। यह साध्य उत्पादकता में वृद्धि का है। इस मतानुसार शिक्षा और सेवाओं के निर्गत में वृद्धि न हो। मानव विकास से श्रम की उच्च उत्पादकता में सुधार नहीं हो, किंतु इनके माध्यम से मानव कल्याण का संवर्धन तो होना ही चाहिए। अतः श्रम की उत्पादकता में सुधार के पक्ष को अनदेखा करते हुए भी बुनियादी शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अपना अलग महत्व हो जाता है।

इस दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर अधिकार सिद्ध हो जाता है। दूसरे शब्दों में, समाज के प्रत्येक सदस्य को साक्षर तथा स्वस्थ जीवन जीने का अधिकार होता है।


भारत में शिक्षा क्षेत्र के अंतर्गत संघ और राज्य स्तर पर शिक्षा मंत्रालय तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद आती है। स्वास्थ्य क्षेत्र के अंतर्गत संघ और राज्य स्तर पर स्वास्थ्य मंत्रालय और विभिन्न संस्थाओं के स्वास्थ्य विभाग तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद आदि कार्य कर रही है।


भारत जैसे विकासशील देश में जहां जनसंख्या का एक विशाल वर्ग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहे हैं, हममें से कई लोग बुनियादि शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर पर्याप्त व्यय नहीं कर सकते हैं। यही नहीं हमारी अधिकांश जनसंख्या अति विशिष्ट स्वास्थ्य देखभाल और उच्च शिक्षा का भार वहन नहीं कर पाती। जब बुनियादि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को नागरिकों का अधिकार मान लिया जाता है तो यह जरूरी हैं कि सभी नागरिकों को विशेषकर सामाजिक दृष्टि से दलित तथा गरीब वर्गो को सरकार निःशुल्क सेवाएं प्रदान करे। शत प्रतिशत साक्षरता और भारतीयों की औसत उपलब्धियों में प्राप्त वृद्धि के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारे पिछले कई वर्षो से अपने शिक्षा तथा स्वास्थ्य क्षेत्र पर व्यय में वृद्धि करती आ रही हैं।


सरकार द्वारा किए गए शिक्षा पर कुल व्यय को अधिक सार्थक रूप से समझने के लिए हम इस खर्च को दो प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है- (क) कुल सरकारी व्यय में इसका प्रतिशत तथा (ख) सकल घरेलू उत्पाद में इसका प्रतिशत ।

कुल सरकारी खर्च में शिक्षा पर व्यय का प्रतिशत सरकारी योजनाओं में शिक्षा के महत्व का सूचक है। सकल घरेलू उत्पाद में शैक्षिक खर्च को प्रतिशत यह व्यक्त करता है कि हमारी आय का कितना भाग देश की शिक्षा के विकास के लिए खर्च हो रहा है। 1952 से 2010 के बीच कुल सरकारी व्यय में शिक्षा पर व्यय 7.92 प्रतिशत से बढ़कर 11.1 प्रतिशत हो गया है। इस संपूर्ण समयाधि में शैक्षिक व्यय में वृद्धि समान नहीं रही है। इसमे अनियमित रूप से उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। यदि इस सरकारी खर्च के साथ हम व्यक्तियों के द्वारा किया गया निजी व्यय तथा परोपकारी संस्थाओं के शैक्षिक खर्च को शामिल कर लें तो शिक्षा पर कुल खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा पर खर्च होता है। उच्चतर शैक्षिक संस्थाओं पर होने वाले खर्च सबसे कम है। यद्यपि औसत रूप से सरकार उच्च शिक्षा पर बहुत कम खर्च करती है, लेकिन उच्च शिक्षा पर खर्च प्राथमिक शिक्षा की तुलना में अधिक आता है। जैसे-जैसे हम विद्यालय शिक्षा का प्रसार करेंगे, वैसे-वैसे हमें उच्च शैक्षिक संस्थाओं से प्रशिक्षित और अधिक शिक्षकों की आवश्यकता होगी।

इसलिए शिक्षा के सभी स्तरों पर व्यय में वृद्धि करना चाहिए। वर्ष 2005 में राज्यों में होने वाले प्रतिव्यक्ति शिक्षा खर्च में काफी अंतर है जहां हिमाचल प्रदेश में इसका उच्च स्तर 2005रु है वहीं बिहार में यह मात्र 515 रु है। इस प्रकार की विषमताओं के कारण ही विभिन्न राज्यों में शिक्षा के अवसरों और शैक्षिक उपलब्धियों के स्तर में बहुत भारी अंतर हो जाता है।


विभिन्न आयोगों के द्वारा शिक्षा खर्च के स्तर के साथ यदि शिक्षा खर्च के साथ तुलना की जाए तो इसकी अपर्याप्तता समझ में आ सकती है। 1964-60 में नियुक्त शिक्षा आयोग ने सिफारिश की थी कि शैक्षिक उपलब्धियों की वृद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार लाने के लिए सकल घरेलू सुधार का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम का कानून बनाया है, जिसके अंतर्गत 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है।

1998 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त तापस मजूमदार समिति के अनुमान लगाया था कि देश के 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने के लिए के दस वर्षों की अवधि में लगभग 13 लाख करोड़ रु. खर्च करना होगा। सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत की तुलना में 4 प्रतिशत का खर्च का स्तर बहुत कम है। आने वाले वर्षों में 6 प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुंचने की आवश्यकता है, जैसा कि सिद्धांत रूप में स्वीकार किया गया है। हाल ही भारत सरकार ने सभी केंद्रीय करों पर 2 प्रतिशत शिक्षा कर लगाना प्रारंभ किया है। शिक्षा कर से प्राप्त राजस्व को प्राथमिक शिक्षा पर खर्च करने के लिए सुरक्षित रखा है। साथ ही सरकार ने उच्च शिक्षा संवर्धन के लिए भी एक विशाल धन राशि स्वीकार करने की बात की है। उच्च शिक्षा के लिए एक नई ऋण योजना की भी घोषणा की गई है।


भारत में सब के लिए शिक्षा अभी भी एक सपना ही है।


हालांकि बच्चों तथा बड़ों की साक्षरता दर में सुधार हो रहा है, किंतु आज भी देश में निरक्षरों की संख्या उतनी ही है जितनी आजादी के समय भारत की जनसंख्या थी भारत की संविधान सभा ने 1950 में सविधान को पारित करते समय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में स्पष्ट किया था कि सरकार सविधान पारित होने के दस साल के अंदर 14 वर्ष की आयु के बच्चों के निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करेगी। इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेते तो अब तक शत-प्रतिशत साक्षरता हो गई होती।