भारत में मानव संसाधन प्रबंधन - Human Resource Management in India
भारत में मानव संसाधन प्रबंधन - Human Resource Management in India
विकासशील देशों के अंतर्गत, भारत व्यापक रूप से विश्व की सबसे रोमांचक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में पहचाना जा रहा है। इसे आउटसोर्सिंग का एक वैश्विक केन्द्र माना जा रहा है तथा भारतीय संगठन विलय और अधिग्रहण के माध्यम से विश्व स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। मानव संसाधन प्रबंध', जो की अपेक्षाकृत एक नवीन पद हैं, की अवधारणा का उद्भव 1970 के दशक के हुआ, 1980 के दशक के दौरान इसे औपचारिक पहचान मिली तथा भारत में इसका सूत्रपात 1990 के दौरान माना जा सकता है, किन्तु मानव संसाधन प्रबंध के पूर्व संगठन में कार्य करने वाले कर्मचारियों की स्थिति एवं प्रबंधन पर दृष्टि डाली जाए, तो स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व एवं बाद के लगभग सभी दशकों में इस दिशा में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलेंगे। इसी कारण से बहुत से लोग इस विषय को अब भी इसके परम्परागत नामों जैसे कार्मिक प्रबंधन (Personnel Management), कार्मिक प्रशासन (Personnel Administration) आदि से संबोधित करते हैं।
कई सदियों से भारत सम्पूर्ण विश्व से प्रबंधकीय विचारों और व्यवहारों को ग्रहण करता चला आ रहा है। 4500 बी.सी. से 300 ईसा पूर्व के प्रारंभिक व्यापारिक अभिलेखों से न केवल अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक सम्बद्धता के संकेत मिलते हैं बल्कि सामाजिक और लोक प्रशासन के विचारों के भी। 300 ईसा पूर्व लिखी गई कौटिल्य की रचना 'अर्थशास्त्र' में, प्राचीन भारत की मानव संसाधन प्रथाओं के कई पहलुओं को कूटबद्ध किया गया है। इस ग्रंथ में राज्य के वित्तीय प्रशासन के साथ-साथ, व्यापार और वाणिज्य के लिए सिद्धांतों तथा लोगों के प्रबंधन से सम्बंधित विचार भी प्रस्तुत किए गए। 250 ई तक रोमन लोगों के साथ बढ़ते हुए व्यापार ने शासन के व्यापक और व्यवस्थित तरीकों में वृद्धि की। प्रथम भारतीय साम्राज्य, गुप्ता राजवंश ने अगले 300 वर्षों में प्रभंधकीय तंत्र हेतु मानकों एवं विनिमयों की स्थापना पर जोर दिया तथा के लिए नेतृत्व के साथ सगाई शामिल बढ़ाने से प्रथम भारतीय साम्राज्य, गुप्ता राजवंश के बारे में बाद में नियमों और प्रबंधकीय व्यवस्था के लिए नियमों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित किया और तत्पश्चात,
लगभग 1000 ई में इस्लाम ने व्यापार और वाणिज्य के कई क्षेत्रों को प्रभावित किया। भारत के प्रबंधकीय इतिहास पर एक और शक्तिशाली प्रभाव, कॉर्पोरेट संगठन की ब्रिटिश प्रणाली द्वारा लगभग 200 साल के लिए होना अभी बाकी था।
स्पष्ट है की भारतीय विरासत की सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ें विविध रही हैं और पुराने विश्व के अन्य भागों से लिए गए विचारों सहित कई स्रोतों से निर्मित हैं। समकालीन परिप्रेक्ष्य में, भारतीय प्रबंधन विचारधारा, वैश्विक वास्तविकताओं की जटिलताओं का सामना करते हुए अब भी प्राचीन ज्ञान के अवशिष्टों से प्रभावित है।
वेदांत दर्शन के रूप में, समग्र ज्ञान की एक धारा, कार्य संगठनों के सभी स्तरों पर प्रबंधकीय व्यवहार में व्याप्त है।
इस दार्शनिक परंपरा की जड़ें, 2000 बी.सी. से पवित्र ग्रंथों में मिलती हैं और इसके अनुसार, दैनिक चुनौतियों का सामना करते हुए मानव स्वभाव में आत्म परिवर्तन और आध्यात्मिक उप्लब्धि को प्राप्त करने की क्षमता है। इस तरह की संस्कृति आधारित परंपरा और विरासत, परिवार के संबंधों और दायित्वों की पारस्परिकता के सन्दर्भ में, वर्तमान प्रबंधकीय मानसिकता पर काफी प्रभाव डाल सकती है। जाति व्यवस्था, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज के लेखन में दर्ज की गई थी, भारतीय सामाजिक विरासत की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है, जो सदियों से संगठनात्मक वास्तुकला तथा प्रबंधकीय प्रथाओं प्रभावित करती रही और वर्तमान में सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी चिंतन एवं ध्यान का विषय-केन्द्र हो गई है। मूल्यों और सांस्कृतिक प्रथाओं के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक जाति व्यवस्था रही है। जाति व्यवस्था ने परंपरागत रूप से, सामाजिक एवं संगठनात्मक संतुलन बनाए रखा। ब्राह्मण (पुजारियों और शिक्षकों) शीर्ष पर, तथा क्षत्रिय ( शासकों और योद्धाओं ),
वैश्य (व्यापारियों और प्रबंधकों) और शूद्र (कारीगरों और श्रमिकों) का स्थान उनके बाद का था। जाति पदानुक्रम के बाहर आने वालों को 'अछूत' कहा जाता था। यहां तक कि दशकों पहले, एक निश्चित सार्वजनिक उद्यम विभाग पर एक खास जाति के लोगों का वर्चस्व हो सकता था। जाति के मामलों से जुड़ी भावनाओं ने प्रबंधकों को भर्ती, पदोन्नति और कार्य आवंटन जैसे क्षेत्रों में प्रभावित किया। भारतीय संस्थानों निचली जातियों के लिए और आदिवासी समुदायों के लिए 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति नामों से कूटबद्ध किया। सरकार द्वारा 'आरक्षण' नाम की एक सख्त कोटा प्रणाली के माध्यम से, जातियों में एक सकारात्मक समतुल्यता प्राप्त करने का प्रयास किया गया है। केंद्र सरकार ने कुल भर्ती का 15 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लिए और साढ़े सात प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों के लिए निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों के लिए निर्धारित किया गया है।
हालांकि, बाजार और वैश्विक संबंधों के उदारीकरण ने मानव संसाधन (HR) की नीतियों और प्रथाओं के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया है। भारतीय संगठन के बदलते सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य में संगठन के पश्चिमी विचारों की प्रासंगिकता की चुनौती का सामना करने के लिए भारत में मानव संसाधन प्रबंधन क्षेत्र के पेशेवर जानकारों ने आगे बढ़कर मानव संसाधन प्रबंधन के एक व्यापक एवं चिंतनशील दृष्टिकोण को अपनाया है।
भारत में कार्मिक प्रबंध (Personnel Management) का विकास 1920 के दशक के दौरान चलाए गए श्रम कल्याण कार्यक्रमों के साथ हुआ था। श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 (Workmen's Compensation Act, 1923) के रूप में प्रथम सामाजिक सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया। श्रमिकों में एकता की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए 1926 में श्रम संग अधिनियम पारित किया गया।
फलस्वरूप श्रमिक अब पहले की अपेक्षा अधिक संगठित एवं सशक्त थे। 1931 में जे. एच. व्हिटले की अध्यक्षता में * रॉयल कमीशन ऑन लेबर' (Royal Commission on Labour ) ने भारतीय उद्योग कारखानों में श्रम कल्याण अधिकारी (Labour Welfare Officer) की नियुक्ति की सिफारिश करके भारत में कार्मिक प्रबंध औपचारिक शुरुआत की। 1930 से 1940 के दशकों के दौरान श्रम संघों के तीव्र विकास के फलस्वरूप, श्रम अनुबंधों का प्रशासन, सामूहिक सौदेबाजी, परिवेदनाओं एवं विवादों का निपटारा आदि कार्य कार्मिक विभाग के दायित्वों में सम्मिलित किए गए। इन उल्लेखनीय परिवर्तनों के कारण ही औद्योगिक सम्बन्ध तथा श्रम सम्बन्ध जैसी शब्दावली का प्रचलन हुआ।
इसी क्रम में 1946 में औद्योगिक रोजगार अधिनियम ( Industrial Employment: Standing Orders Act) तथा 1948 में कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम (Employees' State Insurance Act) जैसे महत्वपूर्ण अधिनियम पारित किए गए।
1946 में केन्द्रीय श्रम अनुसन्धान समिति की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 तथा कारखाना अधिनियम, 1948 पारित किए गए। कारखाना अधिनियम, 1948 ने ऐसे सभी कारखानों में एक श्रम कल्याण अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य कर दी, जहाँ 500 अथवा उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। तत्पश्चात, 1948 की औद्योगिक नीति ने, 1950 में भारत के संविधान ने तथा 1951 से शुरू हुई पंचवर्षीय योजनाओं ने क्रमशः भारत में कार्मिक प्रबंधन की दिशा को सुदृढ़ता प्रदान की। इस अवधि में श्रम कल्याण सम्बन्धी अनेक अधिनियम पारित किए गए जिनके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण के अतिरिक्त उन सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, बोनस, प्रशिक्षण एवं विकास, सामूहिक सौदेबाजी, परामर्श तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा आदि अनेक प्रबंध किए गए।
इसी दौरान इस क्षेत्र से सम्बंधित कुछ व्यावसायिक संस्थाओं,
जैसे जेविअर इंस्टिट्यूट ऑफ़ लेबर रिलेशंस, जमशेदपुर (XLRI, Jamshedpur), इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेर्सोनेल मैनेजमेंट, कोलकाता (IIPM, Kolkata) तथा नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ लेबर मैनेजमेंट, मुंबई (NILM, Mumbai) का गठन हुआ जो कार्मिक प्रबंध के क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण तथा शोध कार्य से सम्बंधित रही हैं। 1960 एवं 1970 के दौरान इसमें से दो प्रमुख संस्थाओं, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेर्सोनेल मैनेजमेंट, कोलकाता तथा नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ लेबर मैनेजमेंट, मुंबई का विलयन हो गया तथा नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेर्सोनेल मैनेजमेंट, कोलकाता का गठन हुआ। इस समय तक कार्मिक प्रबंधकों की भूमिका तकनीकी तथा विनियामक हो चुकी थी तथा इस क्षेत्र में अनेक नवीन तकनीकों, विधियों एवं प्रक्रियाओं विकास हुआ। अतः अब कार्मिक प्रबंधन का स्तर एक प्रकार से प्रशासनिक हो गया था। यह वह समय था जब मानवीय सम्बन्धों के प्रति दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा था। औद्योगिक गतिविधियों के प्रबंध में अंतरानुशासनिक विषयों जैसे अभियांत्रिकी, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र आदि का उपयोग बढ़ने लगा। उद्योगों में मानव को एक उपकरण के तौर पर नहीं,
बल्कि एक संसाधन के रूप में देखा जाने लगा तथा साथ ही साथ मानवीय व्यवहार एवं कर्मचारी संबंधों को संज्ञान में लिया गया तथा मान्यता दी गई। नए ज्ञान एवं सूचनाओं के आधार पर कार्मिक प्रबंध क्षेत्र की शब्दावली में भी परिवर्तन हुए, जैसे मानव अभियांत्रिकी (Human Engineering), श्रम सम्बन्ध ( Labour Relations), कार्मिक प्रशासन ( Personnel Administration), जन-शक्ति नियोजन (Manpower Planning) आदि।
1970 के दशक में हुए तकनीकी, सामाजिक तथा वैधानिक पर्यावरण के परिवर्तनों के फलस्वरुप कार्मिक प्रबंध के क्षेत्र में व्यावसायिक तथा मानवीय मूल्यों का विकास होने लगा। अब यह स्वीकार किया जाने लगा कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए कार्य पर स्थित व्यक्तियों को अभिप्रेरित करना होगा तथा इसके लिए उनक वेतन के अतिरिक्त अन्य सुविधाएँ, प्रशिक्षण एवं शिक्षा देनी होगी। कार्मिक प्रबंधकों,
निदेशकों तथा मानव संसाधन विभाग के अन्य अधिकारियों के लिए आवश्यक योग्यताओं का निर्धारण किया जाना महत्वपूर्ण समझा जाने लगा। 1980 के दशक में मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management) तथा मानव संसाधन विकास (Human Resource Development) की विचारधाराओं का आविर्भाव हुआ जिससे प्रबंधकों के समक्ष नई चुनौतियाँ प्रकट हुई। इस अवधि में कार्मिक प्रबंधन के क्षेत्र में व्यावसायिक मूल्यों का, व्यावसायिक शिष्टता तथा सामाजिकता के तात्वों का उद्भव हुआ तथा उसका दृष्टिकोण व्यावसायिक, वैधानिक तथा अवैयक्तिक हो गया। इस समय कार्मिक प्रबंधन में नियमन, विनियमन, अनुपालन मानकों आदि की आवश्यकता पर जोर दिया जाने लगा।
वर्तमान में कार्मिक प्रबंध के क्षेत्र में मानव संसाधन सूचना प्रणाली (Human Resource Information System) तथा मानव संसाधन अंकेक्षण (Human Resource Audit) जैसे नए सप्रत्ययों का आविर्भाव हुआ है। इस कारण से क्षेत्र का परिप्रेक्ष्य दार्शनिक हो गया।
तथा मानवीय मूल्यों, सामर्थ्यां एवं वैयक्तिक भिन्नताओं को संज्ञान में लेकर उत्पादकता एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से संगठनात्मक, वैयक्तिक एवं सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रयास किया जा रहा है। आज मानवीय संसाधनों की आवश्यकता को अपरिहार्य समझा जाता है तथा उनके योगदानों की अतुलनीय महत्ता है। संगठनों की प्रगति एवं सफलता का आधार, निर्विवादित रूप से उनके मानव संसाधन तथा मानवीय मूल्यों के प्रति सम्मान है।
1980 में प्रोफेसर उदय पारीक तथा प्रोफेसर टी. वी. राओ के उल्लेखनीय प्रारंभिक प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत के संगठनात्मक प्रमुखों की सोच में, विशेषकर लोगों के प्रबंधन के प्रति उनकी मनोवृत्ति तथा नजरिए में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। संगठन इस तथ्य को स्वीकारने लगे थे की मानव संसाधन, संगठन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण संपत्ति हैं तथा उनकी क्षमताओं के अधिकाधिक विकास के लिए एक स्वस्थ कार्य वातावरण अत्यावश्यक है।
यदि संगठनात्मक आवश्यकताओं को कर्मचारी कौशलों, ज्ञान तथा अनुभव के साथ संतोषजनक ढंग से सम्बद्ध किया जाए तो कर्मचारियों की संगठन के प्रति निष्ठा में वृद्धि संभव है। जब मानव संसाधन विकास (Human Resource Development) की अवधारणा संगठनात्मक जीवन की एक सोच के रूप में विकसित होती है तो संगठन को प्रतियोगात्मक लाभ मिलने आरंभ हो जाते है तथा वह उत्कृष्ट प्रदर्शन करने लगता है।
1990 के दशक में उदारीकरण, निजीकरण तथा वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप संगठनों का कर्मचारी क्षमताओं, उत्पाद गुणवत्ता, त्वरित निर्णय, उपभोक्ता संतुष्टि आदि पर ध्यान देने के दबाव के कारण संगठनात्मक पुनर्संरचना तथा लागत न्यूनता प्रयासों पर जोर दिया जाने लगा। विश्व स्तर पर व्याप्त संगठनों जैसे रिलायंस, टाटा मोटर्स, टिस्को, रैनबेक्सी आदि में कार्यरत कर्मचारियों के विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक, क्षेत्रिय तथा धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण कार्य - बल अथवा जन-बल / जन-शक्ति विविधता (workforce diversity) ने भी मानव संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में पर्याप्त ध्यान आकर्षित किया है।
सन 2000 एवं उसके बाद, अधिकांश संगठन वैश्विक सगठनों के साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं तथा प्रतियोगिता में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रयासरत हैं। परिणामस्वरूप, मानव संसाधन प्रबंधन को अब समृद्धि के तौर पर नहीं, बल्कि एक प्रतियोगात्मक आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है।
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