पंचवर्षीय योजनाओं का प्रभाव - impact of five year plans
पंचवर्षीय योजनाओं का प्रभाव - impact of five year plans
पहली सात पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान भारत ने औद्योगिक क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त की है। औद्योगिक क्षेत्रों के विकास से भारत की जी.डी.पी. का अनुपात 1950-51 में 11.8 से बढ़कर 1990-91 में 24.6 प्रतिशत हो गई। भारत की जी.डी.पी. में बढ़ोतरी उद्योगों के विकास का सूचक है। इस समय के दौरान औद्योगिक विकास की दर 6 प्रतिशत वार्षिक संवृद्धि दर प्रशंसनीय है। भारत का औद्योगिक विकास अब केवल सूती तथा पटसन उद्योग तक सीमित नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र प्रायः सार्वजनिक क्षेत्र के कारण विविधतापूर्ण बन गया था। लघु उद्योगों के संवर्धन से उन लोगों को अवसर प्राप्त हुए जिनके पास व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए बड़े फर्मों को प्रारंभ करने हेतु पूजी नहीं थी। विदेशी प्रतिस्पर्धा के प्रति संरक्षण से उन इलेक्ट्रोनिकी व ऑटोमोबइल क्षेत्रों में देशी उद्योगों का विकास हुआ, जिनका विकास संभव नहीं था।
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के योगदान के बावजूद अर्थशास्त्रियों ने सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उद्यमों के निष्पादन की कड़ी आलोचना की है। शुरू में सार्वजनिक क्षेत्र की आवश्यकता अधिक थी अब यह पूर्ण रूप से स्वीकार किया गया है। सरकारी क्षेत्रों ने कुछ वस्तुओं तथा सेवाओं पर एकाधिकार रखते हुए उत्पादन जारी रखा है जिनकी आवश्यकता नहीं थी। दूरसंचार सेवा इसका उदाहरण है। इस उद्योग को सार्वजनिक क्षेत्र से आरक्षण प्राप्त है जबकि निजी क्षेत्र भी इस सेवा को उपलब्ध करा सकते हैं। 1990 के दशक में निजी क्षेत्र द्वारा सेवा उपलब्ध नहीं होने कारण लोगों को टेलीफोन कनेक्शन लेने के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। इसका दूसरा उदाहरण माडर्न ब्रेड की स्थापना है जो ब्रेड निर्माण करने वाली एक फर्म थी और निजी क्षेत्र को इसका निर्माण करने की अनुमति नहीं थी। 2001 में यह फर्म निजी क्षेत्र को बेच दी गई। भारत की अर्थव्यवस्था को विकसित करने के चार दशक बाद भी इन दोनों के बीच अंतर नहीं किया गया है कि (क) सार्वजनिक क्षेत्र क्या कर सकता है
तथा (ख) निजी क्षेत्र क्या कर सकता है। आज भी केवल सार्वजनिक क्षेत्र ही राष्ट्रीय सुरक्षा प्रदान कर सकता है। जैसे सरकार होटलों की व्यवस्था कर सकती है। लेकिन कुछ विद्वानों का मानना है कि सरकार को उन क्षेत्रों से हट जाना चाहिए जो कार्य निजी क्षेत्र कर सकता है। सरकार को केवल उन्हीं संसाधनों का संकेंद्रण करना चाहिए जिनको निजी क्षेत्र उपलब्ध नहीं कर सकता है। भारत के अनेक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को भारी हानि सहन करनी पड़ी है, लेकिन सरकार द्वारा नियंत्रण होने के कारण इन्हें बंद करना आसान नहीं था। भले ही इसके कारण राष्ट्र के सीमित संसाधनों का निकास होता रहे। इसका अर्थ यह था कि निजी क्षेत्र को लाभ होता रहे। उसके बाद कामगारों की नौकरियों की सरक्षा के लिए उनका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
• किसी उद्योग को शुरू करने के लिए आवश्यक लाइसेंस का कुछ औद्योगिक घरानों द्वारा दुरुप्रयोग किया गया। ये बड़े औद्योगिक घराने नई फर्म शुरू करने के लिए लाइसेंस नहीं,
बल्कि प्रतिस्पर्धा को रोकने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर लेते थे। कई बड़ी कंपनियां उत्पादन के लायक नहीं होने पर भी लाइसेंस लेने में कामयाब हो जाती थी। उद्योगपति अपने उत्पादन के विषय में विचार करने की अपेक्षा लाइसेंस प्राप्त करने के लिए संबंधित मंत्रालयों में लॉबी बनाने में समय व्यतीत करते थे।
विदेशी प्रतिस्पर्धा से सरक्षण की आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि यह उस स्थिति के बाद भी जारी रहा, जबकि यह सिद्ध हो चुका था कि इससे कोई विशेष लाभ के स्थान पर हानि अधिक होगी। आयातों पर प्रतिबंध के कारण भारतीय उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं को खरीदना पडता था
जिनका उत्पादन भारतीय उद्योग करते थे। उत्पादकों को यह पता था कि उनके पास एक आबद्ध बाजार है, जिनके कारण भारतीय उद्योगों को उत्पाद की गुणवता सुधारने की प्ररेणा नहीं थी। जब ये उद्योग घटिया वस्तुओं को ऊची कीमत पर बेच सकते थे इसलिए उनको अपनी गुणवत्ता सुधारने की आवश्यकता नहीं थी। आयातों की प्रतिस्पर्धा ने हमारे उत्पादकों को और अधिक दक्ष बनने को बाध्य किया। कुछ विशेषज्ञों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र उद्योगों का मुख्य लक्ष्य लाभ कमाना नहीं था, बल्कि देश के विकास को बढ़ाना था। इसलिए सार्वजनिक क्षेत्र उद्योगों का मूल्यांकन जनता के कल्याण के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका मूल्यांकन उनके द्वारा कमाए गए लाभों के आधार पर नहीं किया जा सकता। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हमें विदेशी प्रतिस्पर्धा से उत्पादनों का संरक्षण तब तक करना चाहिए जब तक धनी राष्ट्र ऐसा करते रहें। इन सभी विरोधों के कारण अर्थशास्त्रियों ने हमारी नीति में परिवर्तन करने का आग्रह किया। अन्य समस्याओं सहित इस समस्या के कारण सरकार ने 1991 में आर्थिक नीति प्रारंभ की।
भारत सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना की विकास दर 82 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। परंतु 27 दिसंबर 2012 को राष्ट्रीय विकास काऊसिलिंग ने 8 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया। इस योजना के मुख्य उद्देश्य:
(क) गरीबी को 10 प्रतिशत तक कम करना।
(ख) निजी निवेश को बढ़ाना।
(ग) आय की असमानता को कम करना ।
(घ) क्षेत्रीय असमानता को कम करना।
(ङ) संसाधनों को बढ़ाना।
(च) रोजगार की उपलब्धता।
(छ) पूंजी बाजार को नियमित करना।
(ज) नई तकनीक व खुली अर्थव्यवस्था के द्वारा ग्रामीण जनता का विकास।
(झ) जनता को सूचनाएं प्रदान करना व उनको उनके अधिकार व ताकत से परिचीत करवाना।
(ञ) वैश्वीकरण के सहयोग से औद्योगिकरण व प्रतिस्पर्धा से तकनीकी सुधार लाना।
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