वैश्वीकरण का विकासशील देशों / भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव - Impact of Globalization on Developing Countries / Indian Economy

वैश्वीकरण का विकासशील देशों / भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव - Impact of Globalization on Developing Countries / Indian Economy


वैश्वीकरण के विकासशील देशों / भारतीय अर्थव्यवस्था पर दोनों तरह के लाभकारी तथा हानिकारक प्रभाव पड़ है मुख्य लाभकारी तथा हानिकारक प्रभावों का वर्णन इस प्रकार है-


वैश्वीकरण के लाभकारी प्रभाव


(क) विदेशी व्यापार में वृद्धिः


वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत विदेशी व्यापार के सम्बन्ध में अपनाई गई नीतियों में फलस्वरूप विश्व व्यापार में भारत के भाग में वृद्धि हुई है। 1990-91 में विश्व व्यापार में भारत का भाग 053 प्रतिशत था। 1995-96 में यह बढ़ कर 0.50 प्रतिशत तथा 2010-11 बढ़ कर 1.96 प्रतिशत हो गया। भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा तालिका 1 में दिखाया गया है।


विदेशी व्यापार की उदारवादी नीतियों के फलस्वरूप विश्व व्यापार में भारत के भाग में वृद्धि हुई है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी निर्यातों का प्रतिशत भाग निस्तर बढ़ रहा है। 1990-91 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में निर्यात का भाग 6 प्रतिशत था 2010-11 में यह बढ़ कर 23.39 प्रतिशत हो गया।


(ख) विदेशी निवेश में वृद्धिः


भारत में वैश्वीकरण में फलस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तथा पोर्टफोलियो विदेशी निवेश दोनों में काफी वृद्धि हुई है।


(i) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश विदेशी प्रत्यक्ष निवेश से तात्पर्य विदेशी कंपनियों द्वारा अन्य देश में पूर्ण स्वामित्व वाली कम्पनियाँ बनाने और उनका प्रबन्ध करने से है।

इसके अंतर्गत प्रबंध करने के उद्देश्य से अशी को खरीद कर अधिग्रहण की गई कम्पनी भी शामिल है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की विशेषता मेजबान देश की घरेलू कम्पनियों को अपने प्रबंध में लेना या अन्य देश में प्रबन्ध के उद्देश्य से पूर्ण स्वामित्व वाली कम्पनियाँ बनाना है। इस तरह के निवेश में उत्तम का पूरा जोखिम विदेशी निवेशक उठाता है और विदेशी निवेशक ही उद्यम के पूरे लाभ या हानि के लिये जिम्मेदार होता है। 


(ii) पोर्टफोलियो निवेश: इस तरह के निवेश में विदेशी निवेशक, विदेशी कम्पनिया या विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय कम्पनियों के अशो या ऋणपत्रों में निवेश करते हैं। इस तरह के निवेश में विदेशी निवेशक मेजबान देश की व्यावसायिक इकाई का प्रबंध अपने हाथों में नहीं लेते, बल्कि उस इकाई का प्रबंध एवं नियन्त्रण घरेलू देश पर ही छोड़ दिया जाता है।


भारत में विदेशी निवेश में काफी बड़ी मात्रा में बढोत्तरी हुई है। वर्ष 1990-91 में कुल विदेशी निवेश 103 मिलियन यूएस डॉलर था वर्ष 2007-08 में विदेशी निवेश बढ़ कर 62 106 मिलियन यूएस डॉलर हो गया। भारत में बढ़ ते विदेशी निवेश के कारण भुगतान शेष में सुधार आया है तथा देश के विदेशी मुद्रा कोपों में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है। वैश्विक मंदी के कारण 2008-09 में विदेशी निवेशों के अंतप्रवाह में कमी आई। 2008-09 में विदेशी निवेश कम होकर 23.983 मिलियन यूएस डॉलर रह गया। वर्ष 2009-10 तथा 2010-11 में विदेशी निवेश पुन बढ़ कर कमश 70.139 मिलियन यू.एस. डॉलर तथा 84,372 मिलियन यू.एस. डॉलर हो गया।


(iii) विदेशी सहयोगों में वृद्धि. वैश्वीकरण से भारतीय कम्पनियों के साथ विदेशी कम्पनियों के सहयोग में वृद्धि हुई है। ये सहयोग तकनीकी सहयोग या वित्तीय सहयोग या दोनों के रूप हो सकते हैं

वित्तीय सहयोग में विदेशी साझेदार वित्त प्रदान कराता है. जबकि तकनीकी सहयोग में विदेशी साझेदार आधुनिक तकनीक प्रदान कराता है। विदेशी सहयोगों में विदेशी कम्पनिया भारतीय कम्पनियों के साथ मिलकर भारत में बहुत से उद्यम स्थापित कर रही है।


(iv) विदेशी विनिमय कोषों में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के फलस्वरूप विदेशी विनिमय कोपी में काफी वृद्धि हुई है। सन् 1991 में भारत का विदेशी विनिमय कोष 4,388 करोड़ था वह अप्रैल 2012 में बढ़ कर 15,24,328 करोड़ हो गया। इस प्रकार विदेशी विनिमय कोपों में 347 गुणा वृद्धि हुई है। 


(v) बाजार का विस्तार वैश्वीकरण की नीति से बाजार का विस्तार हुआ है।

इससे भारतीय व्यावसायिक इकाईया पूरे विश्व में व्यवसाय करने में लगी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए राष्ट्रीय सीमाएं महत्वहीन हो गई है भारतीय कम्पनिया जैसे-इफासिस, टाटा कंसलटेंसी, विप्रो, टाटा स्टील, रिलायंस, आदि विश्व के देशों में व्यापार कर रही है।


(vi) तकनीकी विकास वैश्वीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी तकनीक का अर्तप्रवाह हुआ है। इससे औद्योगिक इकाईयों में नवीनतम तकनीक का प्रयोग होने लगा है। इससे उनकी उत्पादकता बढ़ी है।


(vii) ब्रांड - विकास: वैश्वीकरण से ब्रांडेड वस्तुओं का प्रयोग बढ़ा है। यह केवल टिकाऊ वस्तुओं में ही नहीं, बल्कि साधारण उत्पादों, जैसे- जूस, स्नैक्स, कपड़ों, खाद्यान्नों आदि में भी होने लगा है। इससे उत्पादों की क्वालिटी में सुधार आया है।

(viii) पूंजी बाजार का विकासः वैश्वीकरण से भारतीय पूंजी बाजार का विकास हुआ है। विदेशी निवेशक अब अधिक मात्रा में भारतीय पूंजी बाजारों में निवेश करने लगे है। भारत में विदेशी निवेश में बहुत वृद्धि हुई है।


(ix) सेवा क्षेत्र का विकास: वैश्वीकरण से भारतीय सेवा क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ है। विदेशी कम्पनियों के दूर संचार, बीमा क्षेत्र, बैंकिंग सेवाओं में आने से इन सेवा क्षेत्रों में बहुत प्रगति हुई है, जैसे भारत में अब मोबाइल फोन बहुत सस्ते व काफी प्रचलित हो गए हैं।


(x) रोजगार में वृद्धिः वैश्वीकरण से रोजगार अवसरों में बहुत वृद्धि हुई है।

विदेशी कम्पनिया भारत में अपनी व्यावसायिक व उत्पादन इकाईया स्थापित कर रही है। इससे भारतीयों के लिए रोजगार अवसर बढ़े है जैसे विदेशी बीमा कम्पनियों, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार कम्पनियों में बहुत से लोगों को रोजगार मिला है।


(xi) प्रतिभा पलायन में कमी: वैश्वीकरण से बहुराष्ट्रीय निगमों ने भारत में अपनी व्यावसायिक इकाईया स्थापित की है। इनमें प्रतिभावान भारतीय प्रबंधकों, इंजीनियरों आदि को बहुत ही अच्छे वेतन व अच्छी कार्यदशाओं में नियुक्त किया जाता है। इससे भारत में अच्छे रोजगार अवसर मिलने के कारण जीवन स्तर में सुधार वैश्वीकरण से भारत के लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। प्रतिभावान व्यक्तियों के भारत से विदेशों में पलायन में कमी आई है।


(xii) अब अच्छी क्वालिटी की वस्तुए कम कीमत पर मिलने लगी है। वैश्वीकरण से इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, जैसे- टेलीविजन, ए.सी. मोबाइल फोन, रेफ्रिजरेटर आदि की कीमतों में कमी आई है। अब मध्यम वर्ग के लोग भी इन उत्पादों का प्रयोग करने लगे है।