साख का महत्व - importance of credit

साख का महत्व - importance of credit


वर्तमान समय में साख का महत्व इतना अधिक है कि इसे व्यावसायिक संगठन का प्राण कहा जाता है। हाँट्रे तथा विलिस ने साख को वर्तमान आर्थिक प्रणाली की आधारशिला कहा है जिस पर सभी आर्थिक क्रियाए आश्रित है। डेनियल वेब्स्टर के शब्दों में, साख ने संसार को धनी बनाने में संसार की सारी खानों की अपेक्षा हजार गुना अधिक कार्य किया है। इसने श्रम को प्रोत्साहित किया है, निर्माणकर्ताओं को प्रेरित किया है, वाणिज्य को सागरों पार तक विस्तृत किया है, और प्रत्येक राज्य तथा मानव की प्रत्येक छोटी जाति को परस्पर एक दूसरे से परिचित करा दिया है।" साख के महत्व को साख से प्राप्त होने वाले लाभों द्वारा समझा जा सकता है जो निम्नलिखित है:


(क) पूँजी की उत्पादन शक्ति में वृद्धि जे एस मिल के अनुसार साख मुद्रा द्वारा पूँजी का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरण करना होता है परंतु यह हस्तातरण उन व्यक्तियों का किया जाता है

जो पूँजी का उत्पादक उपयोग कर सकते हैं ब्याज पर उद्यमकर्ताओं को पूँजी उधार मिल जाने से इसका उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से उपयोग करना सम्भव हो जाता है। यद्यपि साख मुद्रा का व्यापक प्रयोग होने से समस्त पूँजी की मात्रा मे कोई परिवर्तन नहीं होता है परंतु उत्पादन क्षमता का उपयोग होन पर अभीष्टतम उत्पादन संभव हो जाता है।"


(ख) सरल भुगतान - साख के कारण बैंकों आदि संस्थाओं का जन्म हुआ है जिनके माध्यम से भुगतान करना बहुत सरल हो गया है। साख पत्रों के प्रयोग से न केवल देशी तथा विदेशी भुगतान सरलतापूर्वक तथा सुरक्षापूर्ण ढंग से किए जा सकते हैं, बल्कि विनिमय के माध्यम के आकार में वृद्धि होती है जिससे अधिक व्यावसायिक सुविधाएं प्राप्त होती हैं।


(ग) उपभोग में वृद्धि - साख द्वारा जीवन के भौतिक सुखों की सामयिक पूर्ति मे यथेष्ट योगदान मिलता है।

एक लम्बे समय तक त्याग तथा बचत करते रहने के पश्चात् उपभोग की वस्तुएँ प्राप्त करने से अच्छा यह है कि वस्तुओं को साख के आधार पर प्राप्त कर लिया जाए और उनके मूल्य का भुगतान धीरे-धीरे होता रहे। जीवन के आरम्भ मे ही किसी व्यक्ति के द्वारा उपभोग की महत्वपूर्ण सुविधाएँ प्राप्त करना केवल साख के प्रयोग द्वारा ही संभव होता है। अनेक व्यापारिक संस्थाएं किस्तों पर माल उधार देती है जिससे उपभोक्ता साख का निर्माण होता है। वस्तुओं की माँग बढ़ती है जिसको पूरा करने के लिए उत्पादन बढ़ता है तथा जीवन सुखमय होने लगता है।


(घ) मितव्ययता:- साख मुद्रा का प्रयोग करने से धातु तथा अन्य विधिग्राह्य मुद्रा की बचत होती है विधिग्राहा मुद्रा यदि पत्र मुद्रा ही है तो भी यह साख मुद्रा से अधिक खर्चीली होती है,

क्योंकि इसके पीछे भी कुछ धातु कोष रखने की आवश्यकता होती है। साख पत्रों के माध्यम से देशी तथा विदेशी भुगतान करना भी मितव्ययतापूर्ण होता है।


(ङ) व्यापारिक उन्नति - साख के कारण देशी तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होती है क्योंकि बैंको के माध्यम से व्यापारी एक दूसरे के संपर्क में आते हैं। व्यापारिक लेन-देन प्राय साख तथा बैंकों के माध्यम से ही किया जाता है। 


(च) बचत को प्रोत्साहन बैंक व अन्य साख संस्थाएँ जनता की बचतों को अपने पास जमा कर लेती है जो अन्यथा निष्क्रिय ही रहती है। ब्याज के लोभ में बचत को प्रोत्साहन मिलता है तथा देश में पूँजी निर्माण की मात्रा में वृद्धि होती है।


(छ) कीमतों में स्थिरता सरकार तथा केंद्रीय बैंक साख नियंत्रण द्वारा कीमतों में स्थिरता बनाए - रख सकते हैं। कीमतों में वृद्धि होने पर साख संकुचन द्वारा उन्हें घटाया जा सकता है। इसके विपरीत, कीमते गिर जाने पर साख का प्रसार किया जाता है जिससे कीमते ऊपर उठने लगती हैं।


(ज) मुद्रा प्रणाली में लचक- देश की मौद्रिक आवश्यकताओं में परिवर्तन होने पर मुद्रा की मात्रा में तत्काल परिवर्तन करना संभव नहीं हो पाता, परंतु यह कार्य साख की सहायता से सुविधापूर्वक किया जा सकता है। वाणिज्य बैंक देश में व्यापार तथा उद्योगों की मौद्रिक आवश्यकताओं के अनुसार साख की मात्रा का विस्तार व संकुचन करते है, जिससे देश की मुद्रा प्रणाली में लचक बनी रहती हैं।


(झ) आर्थिक विकास में सहायक आधुनिक काल में आर्थिक विकास में सरकार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। विकास के व्यय में एक बड़ा भाग सरकार हीनार्थ प्रबंधन तथा सार्वजनिक ऋणों द्वारा प्राप्त करती है। साख के प्रयोग के द्वारा ही सरकार अपनी आय तथा व्यय के बीच के घाटे को पूरा करती है।


(ञ) उत्पत्ति के साधनों का अधिकतम उपयोगः- आर्थिक कठिनाइयों के कारण अवरुद्ध औद्योगिक विकास के लिए साख ऐसे स्नेहक का काम करती है जिससे औद्योगिक क्षमता एवं कुशलता में वृद्धि होती है और उत्पादन को प्रोत्साहन मिलता है। केन्स के विचारानुसार, पूर्ण रोजगार की स्थिति को प्राप्त करने हेतु कीमत स्तर में मंद गति से वृद्धि होती रहनी चाहिए। वाणिज्यिक बैंकों द्वारा साख का निर्माण तथा विस्तार करते रहने से यह स्थिति सहज ही उत्पन्न हो जाती है।

साधनों के अधिकतम उपयोग द्वारा उत्पादन बढ़ने से रोजगार की मात्रा में वृद्धि होती है तथा आय स्तर ऊँचा होता है।


(ट) आर्थिक संकट से त्राण-व्यक्ति तथा सरकार दोनों की साख की सहायता से आर्थिक संकटों का सामना कर सकते हैं। युद्ध अथवा अन्य विपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए सरकार ऋणों द्वारा अपने साधनों में वृद्धि कर सकती है।


(ठ) नियंत्रित अर्थव्यवस्था केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दी जाने वाली साख की मात्रा तथा दिशा में नियमित ढंग से परिवर्तन करके उसे आर्थिक विकास की आवश्यकताओं के अनुकूल मोड़ सकता है। नियोजित अर्थव्यवस्था में साख नियंत्रण आर्थिक नियमन का एक महत्वपूर्ण शस्त्र है।


डीफो के शब्दों में, साख संसार में व्यापार तथा वाणिज्य के पहिए का तेल, हड्डियों की मज्जा, धमनियों का रक्त तथा हृदय का प्राण है।"