भारत की विदेशी व्यापार नीति ,सफलताएं , असफलताएं - India's foreign trade policy successes and failures

भारत की विदेशी व्यापार नीति ,सफलताएं , असफलताएं - India's foreign trade policy successes and failures


1. निर्यात में वृद्धि सन् 2015 में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 310 अरब डॉलर है और 340 अरब डॉलर का लक्ष्य निर्धारित किया गया। विश्व 


2. निर्यात में भारत का भाग:-सन् 2004 में भारत का विश्व व्यापार में हिस्सा 0.8 प्रतिशत था। यह 2014 में बढ़ कर 2 प्रतिशत हो गया ।


3. आयात में वृद्धिः सन् 2004-05 में 112 अरब डॉलर के आयात किए गए थे ये 2007-08 में बढ़ कर 245 अरब डॉलर के हो गए। इस प्रकार इन चार वर्षो में आयात 2 गुना से अधिक बढ़


4. कुल व्यापार में वृद्धि सन् 2004-05 में कुल व्यापार 196 अरब डॉलर था। यह 2007-08 में बढ़ कर 400 अरब डॉलर का हो गया।


5. रोजगार में वृद्धि - विदेशी व्यापार नीति के अन्तर्गत चार वर्षों में रोजगार के लिए अनेक कदम उठाए गए। परिणामस्वरूप 136 लाख रोजगार अवसरों का सृजन हुआ।


6 विदेशी विनिमय कोषों में वृद्धि चार वर्षों में कुल व्यापार में वृद्धि होने के कारण विदेशी विनिमय कोषों में भी वृद्धि हुई। सन 2004-05 में विदेशी विनिमय कोप 142 अरब डॉलर थे सन् 2007-08 में बढ़ कर 309 अरब डॉलर के हो गये। इस प्रकार चार वर्षों में विदेशी विनिमय कोषों में 2 गुना से भी अधिक वृद्धि हुई।


असफलताएं 


इस नीति के अन्तर्गत चार वर्षों में कुछ असफलताएं भी प्राप्त हुई। मुख्य असफलताएं निम्नलिखित है।


1. आयात-निर्यात से अधिक सन् 2004-05 से 2007-08 तक चार वर्षों में निर्यात में वृद्धि 85% हुई परन्तु आयात में 119 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस प्रकार आयात में वृद्धि निर्यात से अधिक रही। इसी कारण व्यापार शेष निरन्तर बढ़ता गया।


2. व्यापार शेष में वृद्धि - सन 2004-05 में व्यापार शेप 28 अरब डॉलर था जोकि 2007-08 में बढ़ कर 133 डॉलर हो गया। इस प्रकार चार वर्षों में व्यापार शेप में लगभग 5 गुणा वृद्धि हुई।


3. ऊंचे लक्ष्य-चार वर्षों में निर्यात के लक्ष्यों को प्राप्त न किया जा सका। जैसे 2007-08 में निर्यात का लक्ष्य 180 बिलियन (अरब डॉलर था। जबकि केवल 155 बिलियन डॉलर का निर्यात किया गया। इस प्रकार ऊंचे लक्ष्य होने के कारण लक्ष्य और प्राप्तियों में अन्तर बना रहा। 


4. श्रम प्रधान देशों में ऋणात्मक वृद्धि कुछ श्रम प्रधान निर्यातों में अधिक वृद्धि नहीं हुई। परिणामस्वरूप टेक्सटाईल चमड़े का सामान तथा हथकरघा आदि में ऋणात्मक वृद्धि जारी रही।


5. निर्यात में धीमी वृद्धि कुछ क्षेत्र जसे टेक्सटाईल तथा हथकरघा कम आयात तीव्रता वाले क्षेत्र है। इन क्षेत्रों में निर्यात की वृद्धि दर निम्न थी ।

भारतीय रुपये के मूलधन के कारण भी यह वृद्धि धीमी रही।


उपरोक्त वर्णन से प्रतीत होता है कि भारत की विदेशी व्यापार नीति (2004-09) के अन्तर्गत चार वर्षों के दौरान कुछ सफलता तथा असफलताएं भी प्राप्त हुई परन्तु इस विदेशी व्यापार नीति की घोषणा के पश्चात भारत के कुल विदेशी व्यापार में काफी सुधार हुआ।