योजनाकाल में औद्यगिक विकास - industrial development during the planning period
योजनाकाल में औद्यगिक विकास - industrial development during the planning period
भारत में आर्थिक नियोजन 1951 से आरंभ हुआ। अब तक योजनाओं के 65 वर्ष पूरे हो चुके हैं।
बारहवीं योजना आरंभ हो चुकी है। इनमें औद्योगिक विकास ने नई फेर-बदल देखे है। इनकी संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है
(क) प्रथम योजना में औद्योगिक विकास प्रथम योजना वैसे तो मूल रूप से कृषि योजना थी, फिर भी इसमें औद्योगिक विकास की बिल्कुल उपेक्षा नहीं की गई। इसमें औद्योगिक विकास की नींव रखने के लिए लगभग 97 करोड़ रु व्यय किए गए जो कि कुल व्यय को केवल 5 प्रतिशत था।
प्रगति- इसमें सार्वजनिक क्षेत्र में विभिन्न कारखाने जैसे सिंदरी का खाद का कारखाना, चितरजन लोकोमोटिव ईनटैग्रल कोच फैक्ट्री, इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्री, केबिल्स फैक्ट्रीज, पैन्सिलीन तथा डी.डी.टी. के कारखाने आदि स्थापित किए गए हिंदुस्तान मशीन टूल्स, नेपानगर का अखबारी कागज बनाने का कारखाना तथा यू.पी सीमेंट फैक्ट्री पूर्ण रूप से चलाई गई। इसमें औद्योगिक विकास दर 74 प्रतिशत वार्षिक रही।
इसमें शक्ति तथा परिवहन सुविधाओं का विकास हुआ, प्रति व्यक्ति आय तथा उपभोक्ता स्तर में वृद्धि हुई ।
(ख) दूसरी योजना में औद्योगिक विकास- दूसरी योजना, वास्तव में औद्योगिक योजना थी। इसमें आधारभूत उद्योगों के विकास को उच्च प्राथमिकता दी गई तथा इसे रोज़गार प्रेरित क्षेत्र स्वीकार किया गया। यह योजना 1956 की औद्योगिक नीति पर आधारित थी, जिसमें उद्योगों के तीव्र विकास का उतरदायित्व सरकार ने अपने ऊपर ले लिया।
योजनाकाल में औद्योगिक विकास पर 1125 करोड़ रू. राशि खर्च की गई, जिसमें से 938 करोड़ रु. बड़े उद्योगों तथा 187 करोड़ रू. लघु उद्योगों के विकास पर खर्च किए गए।
प्रगति - कृषि तथा परिवहन के प्रयोग में आने वाली पूजीगत वस्तुओं का उत्पादन आरंभ किया गया। इसके साथ पेपर,
रसायन, सूती वस्त्र सीमेंट, चाय, चीनी व खनिज उद्योगों का विस्तार किया गया। इसके अतिरिक्त स्थायी उपभोग वस्तुओं जैसे साइकिल, बिजली के पंखे, लैंप, सिलाई मशीनों आदि के उत्पादन में भी वृद्धि हुई
(ग) तीसरी योजना में औद्योगिक विकास-तीसरी योजना का मुख्य उद्देश्य अधूरे विकास कार्यक्रमों को पूरा करना था। इसमें उन उद्योगों को विकसित किया जाना था, जिनमें देश में आत्म निर्भरता के लक्ष्य को पूरा किया जा सके।
इस योजनाकाल में 1520 करोड बड़े उद्योगों तथा खनिज उद्योगों पर और 264 करोड लघु
उद्योगों पर खर्च किए जाने थे किंतु वास्तव में 1726 करोड़ रू. बड़े तथा खनिज उद्योगों पर तथा 241 करोड़ रू. ग्रामीण व लघु उद्योगों पर खर्च किए गए।
प्रगति- इस योजना काल में मशीन टूल्ज की नई फैक्ट्रिया पिंजौर तथा हैदराबाद में लगाई गई। हरिद्वार में बिजली की मोटरें, त्रिचनापल्ली में बायलर, मद्रास में सर्जीकल इन्स्ट्रमेंट फैक्ट्री तथा कोटा में वैज्ञानिक औजार बनाने के कारखाने लगाए गए। बोकारो में इस्पात बनाने का सार्वजनिक क्षेत्र में चौथा कारखाना खोला गया।
औद्योगिक उत्पादन की असंतोषजनक वृद्धि निम्न कारणों से थी-
(i) विदेशी आक्रमण,
(ii) खाद्यान्न संकट एवं प्राकृतिक विपत्तियां,
(iii) कच्चे माल का अभाव,
(iv) विदेशी सहायता की प्राप्ति में बाधाएं,
(v) मूल्य स्तर में निरंतर वृद्धि,
(vi) अतिरिक्त करों का दबाव,
(vii) बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण मांग में वृद्धि ।
(घ) चौथी योजना में औद्योगिक विकास चौथी योजना में मुख्य लक्ष्य औद्योगिक उत्पादन में संतुलन लाना,
वर्तमान उत्पादन क्षमता का अधिकतर प्रयोग, आयात वृद्धि के लिए उत्पादन तथा आयात प्रतिस्थापन पैदा करना था। इसके लिए योजनाकाल में बड़े तथा खनिज उद्योगों के विकास पर 2864 करोड रू खर्च किए गए तथा लघु उद्योगों के विकास पर 243 करोड़ रु खर्च किए गए। इस अवधि में औद्योगिक विकास 8 प्रतिशत से 10 प्रतिशत वार्षिक गति से करने का लक्ष्य रखा गया।
प्रगति- इस योजनाकाल में सार्वजनिक, निजी एवं सहकारी क्षेत्र में औद्योगिक विकास के लिए लोचशील पद्धति अपनाई गई। इसमे आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण को रोकने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। चौथी योजना में बैंक तथा कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
औद्योगिक दृष्टि से चौथी योजना भी असफल रही। इस असफलता के मुख्य कारण निम्न थे
(i) औद्योगिक उत्पादन की मांग में कमी,
(ii) कच्चे माल का अभाव,
(iii) शक्ति साधनों की कमी,
(iv) औद्योगिक झगडे,
(v) प्रशासकीय समस्याए आदि
(ङ) पांचवी योजना में औद्योगिक विकास पांचवीं योजना आत्मनिर्भरता एवं सामाजिक व्यय के
उद्देश्य से आरंभ की गई। इसके निम्न मुख्य उद्देश्य थे
(i) कोर क्षेत्र का विकास,
(ii) निर्यात उत्पादन तथा आयात प्रतिस्थापन के उत्पादन में वृद्धि,
(iii) उपभोग वस्तुओं एवं अनिवार्य वस्तुओं के उत्पादन पर नियंत्रण,
(iv) लघु उद्योगों को प्रोत्साहन,
(v) पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक विकास
इस उद्देश्य से इस योजनाकाल में बड़े उद्योगों तथा खनिज उद्योगों पर 8989 करोड़ रु. तथा ग्रामीण एवं लघु उद्योगों के विकास पर 592 करोड रू. खर्च किए गए।
प्रगति- इस योजनाकाल में 8.1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य रखा गया किंतु वास्तविक वृद्धि केवल 59 प्रतिशत वार्षिक गति से हुई।
इसके मुख्य कारण बिजली, परिवहन व अन्य शक्ति साधनों की कमी तथा असतोषजनक प्रबंधस्वीकार किए जाते हैं।
(च) छठी योजना में औद्योगिक विकास इस योजना में सर्वोच्य प्राथमिकता शक्ति क्षेत्र को दी गई, क्योंकि पांचवी योजना की असफलता का मुख्य कारण शक्ति साधनों की कमी थी। इसके अतिरिक्त इस योजनाकाल में कुटीर एवं लघु उद्योगों के विकास पर 1945 करोड़ रु. खर्च किए गए।
प्रगति- इसमें औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य 7 प्रतिशत निर्धारित किया गया, जबकि वास्तविक विकास की उपलब्धि 5.5 प्रतिशत वार्षिक थी। इस योजनाकाल में औद्योगिक उत्पादन के कम होने के मुख्य कारण बिजली की कमी, कच्चे माल की कमी तथा औद्योगिक झगडे आदि थे।
(छ) सातवी योजना में औद्योगिक विकास:- सातवीं योजना का मुख्य लक्ष्य देश के औद्योगिकरण को तीव्र करना था इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे उद्योगों को प्राथमिकता दी गई जो जल्दी प्रतिफल देने वाले हैं। वर्तमान उद्योगों का आधुनिकीकरण करके पुरानी मशीनों के स्थान पर नई मशीनें लगाकर औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने का प्रयत्न किया गया।
इस अवधि में बड़े उद्योगों तथा खनिज के विकास पर 25971 करोड़ रु तथा लघु उद्योगों के विकास पर 3249 करोड़ रु. खर्च किए गए जो कि कुल व्यय का 13.4 प्रतिशत था ।
प्रगति- इसमें सार्वजनिक उद्यमों को अधिक प्रतियोगी बनाया गया।
उद्योगों के आधुनिकीकरण, पूंजी के कुशल प्रयोग तथा उत्पादकता बढ़ाने को अधिक महत्व दिया गया। रोजगार प्रेरित उद्योगो के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया गया तथा विकास सभावनाओं वाले सनराईज उद्योगों जैसे इलेक्ट्रॉनिक, कंप्यूटर उद्योगों की स्थापना की ओर योजना अधिकारियों ने विशेष ध्यान दिया किंतु इसमें वास्तविक विकास दर केवल 7.8 प्रतिशत हुई जबकि लक्ष्य 8 प्रतिशत रखा गया था।
(ज) उद्योग और आठवीं योजना:-8वीं पंचवर्षीय योजना 2 वर्ष के अंतराल के बाद 1 अप्रैल, 1992 से प्रारम्भ हुई। इस योजना में 24 जुलाई 1991 को नई औद्योगिक नीति की घोषणा हुई। नई नीति में औद्योगिक विकास की व्यूहरचना स्वतंत्रता के उपरान्त पंचवर्षीय योजनाओं में अपनाई गई व्यूहरचा से हटकर है जो इस प्रकार है -
(i) इस नीति के अनुसार अब देश में औद्योगिक विकास सार्वजनिक क्षेत्र की अपेक्षा निजी क्षेत्र के माध्यम से होगा।
(ii) सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व पहले की अपेक्षा 50 प्रतिशत रह गया।
(iii) केवल राष्ट्रीय महत्व के 8 उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित रखकर बाकी सभी उद्योग निजी उद्यमियों के लिए छोड़ दिए गए।
(iv) लाइसेंस लेने में छूट दे दी गई। किसी भी उद्योग के शुरू करने के लिए केवल सूचना मात्र देनी पड़ेगी।
उद्देश्य- (i) औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रखी गई थी।
(ii) इस योजना में देशी एवं विदेशी संसाधनों की पूरकता का लाभ उठाने के लिए सांझे उद्यम स्थापित किए गए थे।
(iii) 8वीं योजना के अंतर्गत तकनीकी और उत्पादकता के अंतरराष्ट्रीय स्तर प्राप्त करने के लिए प्रमुख वस्तु-निर्माताओं से यह आशा की गई कि वे विदेशी सहयोग स्थापित करेंगे।
सफलताएं- (i) औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर 73 प्रतिशत रही।
(ii) औद्योगिक पुनः निर्माण पर विशेष बल दिया गया।
(iii) नवीनीकरण और आधुनिकीकरण की ओर ध्यान दिया गया।
(iv) उद्योग को निर्यात के साथ जोड़ दिया गया।
(झ) उद्योग और नौवीं योजना इस योजनाकाल में 65148 करोड़ रु की राशि (सार्वजनिक क्षेत्र की कुल लागत का 7.6 प्रतिशत) उद्योगों व खनिजों के विकास के लिए निर्धारित की गई।
(i) औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक दर 5 प्रतिशत रही। उपक्षेत्रों में वार्षिक औद्योगिक वृद्धि दर इस प्रकार रही।
औद्योगिक विकास की दर 8.2 प्रतिशत निश्चित की गई। सफलताए- नौवीं पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक सफलताएं निम्नलिखित रहीं-
नौवीं योजना में उपक्षेत्रों के वार्षिक दर (प्रतिशत में)
खनन 2.5
बिजली 5.5
विनिर्माण 5.2
(ii) विभिन्न उद्योगों में 2001-02 में वार्षिक वृद्धि दर इस प्रकार रही
● आधारभूत वस्तु क्षेत्र 2%
• उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र 5.8%
• उपभोक्ता टिकाऊ वस्तु 11.5%
• मध्यवर्ती वस्तु क्षेत्र 1.5%
• 2001-2002 में तंबाकू और संबंधित उत्पादन, यातायात, यंत्र, कागज और कागज उत्पाद में धनात्मक वृद्धि हुई।
• 2001-2002 में इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में 86900 करोड़ रु. का उत्पादन हुआ।
• इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर सॉफ्टवेयर का 42371 करोड़ रू. का निर्यात हुआ।
असफलताएं- नौवीं पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक उत्पादन की असफलताएं निम्नलिखित रही।
(i) नौवीं पंचवर्षीय योजना में औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक दर 5 प्रतिशत रही जबकि लक्ष्य 8. 2 प्रतिशत था।
(ii) 1997-98 तथा पिछले वर्ष की तुलना में औद्योगिक उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर बहुत कम रही। इसका मुख्य कारण उपक्षेत्रों में वृद्धि दर का कम होना था। विनिर्माण क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में सबसे कम वृद्धि हुई।
(iii) कुछ उद्योगों में ऋणात्मक वृद्धि हुई, जैसे लकड़ी और लकड़ी की वस्तुएं, जूट इत्यादि।
(iv) विश्व बाजार में मंदी होने के कारण नौवीं योजना में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर कम रही ।
(ञ) उद्योग और दसवीं पंचवर्षीय योजना- दसवीं पंचवर्षीय योजना में उद्योगों के लिए 58,939 करोड़ रु. का लक्ष्य निर्धारित किया गया। यह कुल व्यय का 3.9 प्रतिशत है। औद्योगिक विकास की दर 8.9 प्रतिशत की गई है।
सफलताएं दसवीं पंचवर्षीय योजना में पहले तीन वर्षो 2002-03, 2003-04 तथा 2004-05 में
औद्योगिक क्षेत्र में प्रगति हुई। मुख्य सफलताएं निम्नलिखित रही -
(i) औद्योगिक क्षेत्र में 2002-03 में 6.6 प्रतिशत, (ii) 2003-04 में 6.6 प्रतिशत,
(iii) 2004-05 में 7.8 प्रतिशत दर से वृद्धि हुई। इस प्रकार 2002-03 तथा 2003-04 में वृद्धि दर समान रही, जबकि 2001-02 में यह वृद्धि दर केवल 34 थी।
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