औद्योगिक लाइसेंस नीतियां - Industrial License Policies

औद्योगिक लाइसेंस नीतियां - Industrial License Policies


औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 के अंतर्गत जो लाइसेंस देने की प्रणाली अपनाई गई, उसकी देश मे कटु आलोचना की गई और यह बताया गया है कि लाइसेंस प्रणालिया दोषपूर्ण है, जिनके कारण पक्षपात व भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन मिलता है। एकाधिकार जांच आयोग 1956 ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि, "इस नीति ने बड़े उद्योगों को लाभ पहुंचाया है।" इसलिए इसमें सुधार के लिए समय-समय पर विभिन्न समितियों की नियुक्तियां की गई। 1966 में डॉ. आर. के. हजारी की अध्यक्षता में लाइसेंसिग प्रणाली की जांच के लिए एक समिति बनाई गई जिसने अपनी रिपोर्ट 1967 में दी जिसमें कहा गया है कि बिड़ला समूह को उदारतापूर्वक लाइसेंस दिए गए। 1967 की रिपोर्ट में ही केंद्रीय सरकार ने औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति जांच समिति नियुक्त की जिसके अध्यक्ष एस दत्त थे।

इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1969 में सरकार को दे दी जिसमें कहा गया कि इस नीति से लाभ विशाल औद्योगिक प्रतिष्ठानों को हैं तथा इससे कुछ क्षेत्रों में एकाधिकार को प्रोत्साहन मिलता है। मुख्य औद्योगिक लाइसेंस नीतिया निम्नलिखित है हुआ


(क) औद्योगिक लाइसेन्स नीति, 1970- इस नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है। हजारी समिति एवं दत्त समिति के प्रतिवेदनों के आधार पर 18 फरवरी, 1970 को नवीन लाइसेंसिंग नीति की घोषणा की गई। इस नीति के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार थें- (i) नए उद्यमियों को औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रोत्साहन देना, (ii) बड़े व्यावसायिक घरानों के हाथों में आर्थिक सत्ता के केंद्रीयकरण पर रोक लगाना, (iii) सार्वजनिक क्षेत्र का विकास करना एवं उनका महत्व बढ़ना, (iv) लाइसेंसिंग नीति की जटिल प्रक्रिया को सरल बनाना, (v) लघु उद्योग क्षेत्र के विकास के लिए समस्त सुविधाओं की पूर्ति करना।


(i) औद्योगिक ( विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 के अंतर्गत उन अनुसूचित उद्योगों को लाइसेंस लेना अनिवार्य था जिनकी पूंजी 25 लाख रु. थी, लेकिन लाइसेंसिंग नीति 1970 के अतर्गत इस सीमा को बढ़ाकर एक करोड़ रु कर दिया गया।


(ii) सरकार ने घोषणा की कि उद्योगों का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा जिसके विकास के लिए योजनाएं बनाई जाएंगी तथा उन्हें विदेशी मुद्रा एवं अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएगी। भारी विनियोग क्षेत्र में ऐसे नए उपक्रमों को शामिल किया जाएगा जिनकी स्थायी संपत्तितयों में प्रस्तावित पूजी विनियोग की मात्रा पांच करोड़ रु. या इससे अधिक होगी। विशाल औद्योगिक गृह व विदेशी कंपनियों को ऐसी दोनों प्रकार के उद्योगों की स्थापना के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे।


(iii) विद्यमान लाइसेन्स प्राप्त उपक्रमो को जिनकी स्थायी संपत्तियों में पांच करोड़ रु से अधिक पूंजी नही लगी है, अपना महत्वपूर्ण विकास करने के लिए अब लाइसेंस या अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। 


(iv) औद्योगिक नीति, 1956 की तालिका ए में दिए हुए उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में रखने की नीति को जारी रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण क्षेत्र व भारी विनियोग क्षेत्र में भी सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना की जाएगी।


(v) इस लाइसेंसिंग नीति में महत्वपूर्ण क्षेत्र व भारी विनियोग क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली बड़ी परियोजनाओं को संयुक्त क्षेत्र में रखने की बात को स्वीकार किया गया।


(vi) उन उद्योगों को लाइसेंस प्राथमिकता के आधार पर दिए जाएंगे जो निर्यात करने वाली वस्तुओं के लिए स्थापित किए जाएंगे। लघु एवं मध्यम आकार के उद्योगों को भी निर्यात के विकास करने में सहायता दी जाएगी।


(vii) लघु उद्योगों को सुरक्षित रखने की नीति जारी रखी जाएगी तथा इसके सुरक्षित क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा।


(viii) कृषि पर आधारित उद्योगों में नए उपक्रम स्थापित करने की अनुमति मुख्यतः सहकारी क्षेत्र में दी जाएगी। इसमें विशेष रूप से गन्ना व जूट को रखा गया।


(ix) वे उपक्रम जिनमें 1 करोड़ रु से 5 करोड़ रु. तक पूंजी विनियोजित होगी, मध्य क्षेत्र माने जाएंगे। इस क्षेत्र में नवीन साहसियों एवं उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए उदारता से लाइसेंस दिए जाएंगे। इस क्षेत्र में आने वाले उन उपक्रमों को जिनके संबंध बड़े औद्योगिक घरानों या विदेशी कंपनियों से है, कुशलता में वृद्धि करने या लागत को कम करने के लिए विस्तार की अनुमति दी जा सकती हैं।


(x) वे औद्योगिक इकाइया जिनका रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य नहीं है अब बिना फीस दिए अपना रजिस्ट्रेशन करा सकेगी। ऐसा सांख्यिकी एकत्रित करने के उद्देश्यों से किया गया।


(xi) औद्योगिक घराने तथा विदेशी कंपनियां सामान्य परिस्थितियों में उनको विस्तार की अनुमति नहीं दी जाएगी। कुछ विशेष परिस्थितियों में जैसे लागत कम करने या मितव्ययिता लाने के लिए अनुमति दी जा सकती है।


(xii) इस नीति में उद्योगवार लाइसेंस मुक्ति की सूची की व्यवस्था को समान कर दिया गया है। अब लाइसेंस की छूट की व्यवस्था उद्योगों के आधार पर नहीं होगी, बल्कि पूंजी विनियोग की प्रस्तावित मात्रा के आधार पर होगी।


(ख) औद्योगिक लाइसेंस नीति, 1973 


2 फरवरी, 1973 को नवीन औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति की घोषणा की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य उद्योग क्षेत्र में व्याप्त आवश्यक अनिश्चितता को समाप्त करना एवं पांचवीं योजना की अवधि में औद्योगिक उत्पादन में तेजी से वृद्धि करना था । इस लाइसेंसिंग नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है-


(i) इस नीति में औद्योगिक घरानों की परिभाषा परिवर्तित कर दी गई जिसके अनुसार अब 20 करोड़ रु से अधिक की संपत्तित वाली इकाइयों को बड़े औद्योगिक घरानों की परिभाषा में रखा गया।


(ii) इस नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के बढ़ते हुए महत्त्व को स्वीकार किय गया जिसमें यह कहा गया कि औद्योगिक नीति,

1956 में वर्ग ए में वर्णित 17 उद्योगों तो सार्वजनिक क्षेत्र में रहेंगे ही, इनके अतिरिक्त जन- उपयोगी सेवाएं उपभोग वस्तुओं का निर्माण करने वाले बड़े उद्योग, अधिक विनियोजन वाले उद्योग भी सार्वजनिक क्षेत्र में तीव्र गति से विस्तार कर सकेगें। 


(iii) बहुत सी औद्योगिक परियोजनाओं को विशेष दशाओं में ही सयुक्त क्षेत्र में स्थापित करने की अनुमति दी जाएगी।


(iv) सहकारी क्षेत्र में उद्योग के विकास पर महत्व दिया गया। जो उद्योग कृषि पर आधारित है उन्हें उदारता से लाइसेंस देने की बात स्वीकार की गई। इन उद्योगों में चीनी, जूट उद्योग व सूती वस्त्र उद्योग आते हैं रासायनिक उर्वरक उद्योग के लिए सहकारी क्षेत्र को प्रेरित किया जाएगा।


(v) लघु उद्योग के लिए सुरक्षित वस्तुओं की सूची निर्धारित करने की नीति को आगे भी जारी रखने एवं उसमें वृद्धि करने की बात को पुन स्वीकार किया गया। बड़े औद्योगिक घरानों और विदेशी कंपनियों को इस क्षेत्र में अनुमति न देने की बात भी कही गई। 


(vi) 19 उद्योगों की एक सूची बनाई गई और यह कहा गया कि इस सूची वाले उद्योगों की स्थापना में बड़े औद्योगिक घराने एवं विदेशी कंपनियों भाग ले सकती है। सामान्यतः इस सूची के अतिरिक्त अन्य उद्योगों में उनको अनुमति नहीं दी जाएगी जब तक कि यह स्पष्ट न हो कि ऐसा करने की निर्यात में वृद्धि होगी।


(ग) औद्योगिक लाइसेंस नीति, 1975


इस नीति को कुछ व्यक्ति उदार लाइसेंसिंग नीति भी कह सकते है

25 अक्तूबर 1975 को नवीन औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति की घोषणा की गई जिसमें निम्नलिखित बातें मुख्य थी:


(i) लाइसेंस से छूट - 21 उद्योगों को लाइसेंस से छूट प्राप्त करने से छूट दे दी गई है। परंतु प्रभावी उपक्रमों व विदेशी कम्पनियों को यह छूट प्राप्त नहीं होगी।


(ii) विदेशी फर्मों व एकाधिकार प्रतिष्ठानों को छूट-विदेशी फर्मों व एकाधिकारी प्रतिष्ठानों को 30 उद्योगों में लाइसेंस प्राप्त क्षमता से अधिक असीमित मात्रा में विस्तार करने की अनुमति दे दी गई। यह छूट भारी विनियोग उद्योगों को भी प्रदान की गई। इस श्रेणी में सभी छूट पाने वाले उद्योगों के लिए यह आवश्यक कर दिया गया कि उनको अतिरिक्त उत्पादन का निर्यात करना होगा या सरकार के निर्देशों के अनुसार बेचना होगा।


(iii) अनाधिकृत क्षमता को नियमित करना 5 नवंबर, 1975 को एकाधिकारी प्रतिष्ठानों तथा विदेशी कंपनियों की क्षमता को नियमित करने की विधि की घोषणा की गई।


(iv) इंजीनियरिंग उद्योगों को छूट - 15 इंजीनियरिंग उद्योगों को कुछ शर्तों के साथ यह छूट दी गई कि वे अपनी लाइसेंस क्षमता का 5 प्रतिशत वार्षिक या पाच वर्ष में 15 प्रतिशत तक की वृद्धि कर लें।


(v) अनुसंधान एवं विकास यदि किसी उद्योग का अनुसंधान एवं विकास के फलस्वरूप क्षमता में वृद्धि करना आवश्यक हो जाता है तो ऐसे उद्योगों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने की अनुमति दे दी जाएगी,

लेकिन प्रभावी उपक्रमों तथा विदेशी कंपनियों को यह अनुमति स्वतः ही नहीं दी जाएगी। इन्हें इसके लिए लाइसेंस लेना होगा जो उदारतापूर्वक दिया जाएगा।


(vi) आधुनिकीकरण एवं प्रतिस्थापन:- यदि किसी उपक्रम में आधुनिकीकरण एवं प्रतिस्थापन के फलस्वरूप उत्पादन क्षमता में विस्तार करना आवश्यक हो जाए तो ऐसे उपक्रम की क्षमता विस्तार की अनुमति दिए जाने की प्रक्रिया को सरल बना दिया गया है।


(vii) उत्पादन में विविधीकरण:- कुछ निर्धारित उद्योगों जैस मशीन टूल्स, बिजली उपकरण, स्टील कास्टिंग, सवारी कारें आदि लाइसेंस क्षमता में पूर्ण उपयोग की दृष्टि से नवीन वस्तुओं के उत्पादन की अनुमति प्रदान की गई।

उपर्युक्त प्रयासों के फलस्वरूप लाइसेंसिंग प्रणाली पहले से सरल एवं उदार हो गई है। सरकारी दृष्टिकोण भी बदला है। सरकार ने निर्णय लिया है कि लाइसेंसिंग प्रणाली में प्रति वर्ष आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए, जिससे आवश्यक प्रक्रियाएं कम हो सके व संसाधनों का अधिकतम प्रयोग किया जा सके। 


(घ) औद्योगिक लाइसेंस नीति, 1978 


31 मार्च, 1978 को जनता सरकार ने रामकृष्ण अध्ययन दल की सिफारिश पर औद्योगिक लाइसेंस नीति में कुछ परिवर्तन किए।