स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत की औद्योगिक नीति - Industrial Policy of India before Independence
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व भारत की औद्योगिक नीति - Industrial Policy of India before Independence
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ब्रिटिश शासनकाल में सरकार की किसी प्रकार की कोई औद्योगिक नीति नही थी। ब्रिटिश सरकार का भारतीय उद्योगों के विकास के प्रति कोई ध्यान नहीं था। उन दिनों भारत में कच्चा माल इंग्लैंड जाया करता था और वहां के कारखाने में निर्मित होकर भारत में बेचा जाता था। अंग्रेजी सरकार तो केवल यही चाहती थी कि भारत इंग्लैंड में बनी वस्तुओं के लिए अच्छी मंडी बना रही। उस समय केवल उन्हीं उद्योगों को प्रोत्साहित किया गया जिन पर निर्यात व्यापार निर्भर था। यह स्वतंत्र व्यापार का युग था विदेशी प्रतियोगिता के सामने हमारे विश्वविख्यात कुटीर उद्योग न ठहर सके। अत उस काल में भारतीय उद्योगो की विकास गति मंद रही। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि, "ब्रिटेन के औद्योगिक विकास की नींव भारत के उद्योग-धन्धों की मृत्यु शैय्या पर ही रखी गई है।"
प्रथम महायुद्ध के समय इस नीति में कुछ परिवर्तन हुआ। युद्ध की आवश्यकताओं के लिए उत्पादन बढ़ाने का प्रयत्न किया गया। सन 1916 में एक भारतीय औद्योगिक आयोग देश में औद्योगिक संभावनाओं की जांच करने के लिए नियुक्त किया गया। 1923 में संरक्षण की नीति अपनाई गई और कुछ देशी उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से बचाने के लिए प्रयत्न किए गए। किंतु ये प्रयत्न औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं थे। 1945 में औद्योगिक नीति का प्रथम विवरण पत्र तैयार किया गया। इसमें 20 प्रमुख उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण व कई भारी उद्योगों पर सरकारी स्वामित्व का समर्थन किया गया। इसी बीच स्वतंत्रता संग्राम तीव्र होने से यह प्रयत्न अधूरा ही बना रहा।
वार्तालाप में शामिल हों