अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं भारत - International Monetary Fund and India
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं भारत - International Monetary Fund and India
भारत 44 देशों में से एक था जिन्होंने ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में भाग लिया था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। भारत 27 दिसंबर, 1945 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य बन गया। मार्च, 1947 में भारत ने अपने 400 मिलियन डॉलर के अभ्यंश की अदायगी की भारत का कोटा 2003 में बढ़कर 4158 मिलियन हो गया जबकि यह पहले 3056 मिलियन था। इसका 2003 में कोटे में हिस्सा केवल 1.92 प्रतिशत था और यह 2008 में बढ़कर 2.34 प्रतिशत हो गया। 1970 से पहले भारत उन पांच देशों में से एक था जिनके अभ्यश सबसे अधिक थे। इसी आधार पर भारत को मुद्रा कोष के संचालक मंडल में स्थान दिया गया था। किन्तु 1970 के बाद भारत का कोटा जापान तथा इटली से भी कम हो गया। इसलिए संचालक मंडल भारत की स्थायी सदस्यता समाप्त कर दी गई।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की सदस्यता से भारत को लाभ भी है और कुछ हानियां भी हुई हैं। इसके लाभ और हानियां निम्नलिखित है:
(i) विश्व बैंक की सदस्यता:- मुद्रा कोष का सदस्य होने कारण ही भारत विश्व बैंक का सदस्य भी है। भारत विश्व बैंक की सहायता प्राप्त कर सका है। इस संस्था से भारत को अपने पुननिर्माण एवं विकास में काफी सहायता प्राप्त हुई है।
(ii) विदेशी मुद्रा की उपलब्धि-फड की सदस्यता के कारण भारत की आवश्यकतानुसार विदेशी मुद्राए उपलब्ध हो सकी हैं। इससे भारत अपनी भारत आर्थिक उन्नति के लिए विदेशों में पूजीगत सामान आयात कर सकता है तथा भुगतान असंतुलन का घाटा पूरा कर सकता है। भारत ने मुद्रा कोष से 31 मार्च 1971 तक 818 करोड़ की मुद्रा खरीदी थी जिसे वापिस कर दिया गया। 1981 तक भारत की मुद्रा कोष से 275 करोड़ डालर एस.डी.आर की सहायता विदेशी विनिमय संकट पर नियंत्रण करने के लिए प्राप्त की थी। भारत ने कोष की सुविधाओं का अधिकतम प्रयोग किया है। 1991 से 1993 के बीच भारत ने 3.6 करोड़ डालर का ऋण लिया था।
इन सभी ऋणों का भुगतान भारत ने कर दिया। 2002 से 2006 तक भारत ने 4493 मिलियन एस.डी. आर. का लेन-देन आई.एम.एफ के साथ किया। इसके साथ ही 4665 मिलियन एस.डी.आर की पुर्नखरीद की
(iii) पौण्ड स्टर्लिंग के बंधन से रुपये की मुक्तिः - मुद्रा कोष की स्थापना से पहले भारतीय रूपया पौण्ड स्टर्लिंग से बचा हुआ था तथा उसी में इसकी विनिमय दर निर्धारित होती थी। मुद्रा कोष की सहायता के कारण रुपया स्टर्लिंग पौण्ड की दासता से स्वतंत्र हो गया है। अब भारतीय रूपए ने अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए स्वतंत्र मौद्रिक इकाई का स्थान प्राप्त कर लिया है।
(iv) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का सदस्य होने के नाते अपने विदेशी व्यापार में वृद्धि करने की अनेक सुविधाएं मिली हैं। इस कोष की स्थापना के पश्चात भारत के विदेशी व्यापार ने अत्यधिक प्रगति की है।
(v) संकटकाल में सहायता - भारत को प्राकृतिक विपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़, अकाल आदि के समय तथा चीन और पाकिस्तान के आक्रमण के कारण आर्थिक कठिनाइयां उत्पन्न हुई हैं। इनका सामना करने के लिए कोष से काफी आर्थिक सहायता प्राप्त हुई । तेल की कीमतें बढ़ने के कारण भारत को व्यापार संतुलन का घाटा हो गया। इस घाटे को पूरा करने के लिए 1979 में फड की तेल सुविधा से 2025 लाख एस. डीआर का ऋण लिया गया। मुद्रा कोष ने सन 1991 में भारत को 5000 करोड़ रुपये के ऋण की मंजूरी दी ॠण तीन वर्ष की अवधि में दिए जाने थे। इसमें से 4070 करोड़ डालर के ऋण जनवरी 2000 तक ले लिए है। शेष ऋण भारत ने न लेने का निर्णय कर लिया।
(vi) आर्थिक परामर्श की प्राप्तिः- मुद्रा कोष का सदस्य होने के नाते भारत ने अपनी आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए समय-समय पर कोष से अनेक सुझाव प्राप्त किए हैं।
(vii) अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में भारत का स्थान:- कोष के प्रबंध संचालन एवं नीति निर्धारण में भारत का महत्वपूर्ण स्थान है। मुद्रा कोष की नीति निर्धारण में भारत सक्रिय रूप से भाग लेता है। इससे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक क्षेत्र में भारत का महत्व बढा है।
(viii) रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी विनिमय का क्रय-विक्रयः- कोष ने रिजर्व बैंक को 2 लाख रुपये से अधिक की विनिमय के क्रय-विक्रय का अधिकार दिया है। रिजर्व बैंक द्वारा 2 लाख रूपये से कम की मुद्राओं को क्रय विक्रय नहीं किया जा सकता है।
(ix) पंचवर्षीय योजनाओं के लिए सहायता - भारत ने इस कोष से दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान कई ऋण प्राप्त किए।
इस योजना काल में भारत को 127 करोड़ डालर के बराबर विदेशी सहायता प्राप्त हुई। मुद्रा कोष की सलाह से भारत ने तीसरी योजना में रूपये का अवमूल्यन किया। 1980 में मुद्रा कोष द्वारा भारत को क्षतिपूरक वित्त सुविधा के अंतर्गत 1980 में मुद्रा कोष के द्वारा भारत को 283 करोड़ रूपये की मंजूरी दी। भारत उन 69 विकासशील देशों में से एक है जो मुद्रा कोष द्वारा स्थापित खाते से पूरक सहायता पर सब्सिडी प्राप्त कर सकते हैं। यह 3 प्रतिशत वार्षिक से अधिक नहीं होती।
(x) उदारीकरण की नीति में सहायता 1991 में भारत आर्थिक संकट से गुजर रहा था। भारत ने आर्थिक सुधारों की एक उदारीकरण नीति बनाई। इसे सफल बनाने के उद्देश्य से मुद्रा कोष ने अक्तूबर 1991 से जुलाई 1993 के बीच उद्यत ऋण व्यवस्था के अंतर्गत 22 अरब डालर का ऋण मंजूर किया। इस राशि में से 114 अरब डालर का भुगतान भारत कर चुका है।
(xi) विदेशी विनिमय संकट में सहायता - भारत को सन 1991 में विदेशी विनिमय के सकट का सामना करना पड़ा। उस समय भारत को विदेशी विनिमय की बहुत अधिक आवश्यकता थी। इस सकट से उभरने के लिए भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष 1992-93 में 480 एस.डी. आर. करोड़ रूपये के विदेशी मुद्रा में ऋण प्राप्त किए। भारत को 1993-94 में 500 करोड़ की सहायता मिली। परिणामस्वरूप भारत में विनिमय संकट समाप्त हो गया। इसलिए भारत ने फड़ से नया ऋण न लेने का निर्णय लिया।
(xii) विशेष प्राप्ति अधिकार भारत का 2000 में एस.डी.आर. का कोटा 68 करोड़ था । यह बढ़कर 2003 में बढ़कर 4158 मिलियन एस. डी. आर. हो गया। संसार के कुल कोटे में भारत को भाग 2003 में 19 प्रतिशत से बढ़कर 2008 में 2.34 प्रतिशत हो गया है।
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