अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते - international trade agreements

अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते - international trade agreements


अंतरराष्ट्रीय वातावरण मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय समझौतों द्वारा निर्धारित होता है। जीनोवा में 1948 में सीमा शुल्क तथा व्यापार पर सामान्य समझौते स्थापित हुए, ताकि स्वतंत्र व्यापार के उद्देश्य को पूरा करके सभी सदस्य देशों के व्यापार तथा प्रगति को उत्साहित किया जा सके। गैट के समझौते, पहले सात दौर में सीमा शुल्क घटा कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रत्साहित करने से संबंधित थे। किंतु वा दौर जिसे युरुग्वा दौर भी कहते है, 1986 में आरंभ हुआ था। यह बहु-पक्षीय व्यापार समझौता कहलाता है, जिसमें व्यापार में सरचनात्मक परिवर्तनों के बारे में सोचा गया तथा इसमें विश्व व्यापार संगठन के बीज बोए गए। परिणामस्वरूप युरुग्वा दौर में गैट को 1995 में डबल्यु.टी.ओ. में बदल दिया गया।


डब्ल्यु.टी.ओ. के विशेष पांच कार्य इस तरह से हैं-


(i) डब्ल्यू. टी. ओ. बहु-पक्षीय व्यापारिक समझौतों के प्रशासन तथा उन्हें लागू करने के लिए सुविधाजनक बनाता है।


(ii) डब्ल्यू. टी. ओ. बहु-पक्षीय व्यापारिक समझौतों के लिए आवश्यक संगठन प्रदान करता है।


(iii) डब्ल्यु.टी.ओ झगड़ों का निपटारा करने के लिए नियमों तथा विधियों का प्रशासन करता है। 


(iv) डब्ल्यु.टी.ओ. व्यापार अवलोकन प्रणाली का प्रशासन करता है। 


(v) डब्ल्यू.टी.ओ. विश्व आर्थिक नीति में कार्यरत अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को सहयोग देता है । 


डब्ल्यू.टी.ओ. ने अभी हाल ही में भारत को अपनी आधारभूत आयात ड्यूटी 30 प्रतिशत से घटाने तथा निर्यातों पर अनुदान घटाने के लिए सिफारिश की है।

इसने बौद्धिक संपत्ति से संबंधित निवेश से संबंधित आदि विश्व पैंटेंटस राइट्स तथा निवेशों को उत्साहित करने के समझौतें बनाए हैं। किंतु डब्ल्यु.टी.ओ की विभिन्न धाराओं को अपनाने के संबंध में विकासशील देशों में काफी मतभेद पाए जाते हैं। इसका उद्देश्य सेवा निर्यातों को पूरे विश्व में उत्साहित करने का लक्ष्य है तथा भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह बढ़ाने का लक्ष्य है।


1 विदेशी व्यापारिक नीतियां


विदेशी व्यापारिक नीति देश के आयात तथा निर्यात करों से सम्बन्धित होती है। इसमें आयातों को निरुत्साहित तथा निर्यातों को उत्साहित करने के प्रयत्न किए जाते है ताकि देश के भुगतान संतुलन को ठीक किया जा सके। भारत के निर्यातों को आम तौर पर कम कीमत प्राप्त होती है तथा इसे आयातों के बदले में ऊंची कीमत देनी पड़ती है। वर्तमान समय में देश में आयातो तथा निर्यातों को प्रोत्साहन देने के लिए उदारवादी नीति अपनाई गई है।