भूमि विकास बैंक या राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक - Land Development Bank or State Co-operative Agriculture and Rural Development Bank
भूमि विकास बैंक या राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक - Land Development Bank or State Co-operative Agriculture and Rural Development Bank
किसानों को दीर्घकालीन साख देने के लिए विशेष प्रकार की समितियाँ बनाई गई है। इन्हें भूमि विकास बैंक कहते थे। अब इन्हें सहकारी कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक कहा जाता है। इन बैंकों की स्थापना सबसे पहले पंजाब में 1920 में झग (पंजाब) नामक स्थान पर हुई। परंतु इसकी वास्तविक शुरूआत 1929 में हुई जब चेन्नई में एक केंद्रीय भूमि विकास बैंक खोला गया। भूमि विकास बैंक से अभिप्राय ऐसे बैंकों से है जो किसानों की भूमि को गिरवी या बंधक रखकर दीर्घकालीन ऋण देते हैं। ये बैंक दो प्रकार के होते है
(i) केंद्रीय भूमि विकास बैक-इन्हें अब राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक कहा जाता है। इन बैंकों का कार्यक्षेत्र सारा राज्य होता है। ये बैंक प्राथमिक विकास बैंकों के द्वारा रुपया उधार देते हैं।
उत्तर प्रदेश, गुजरात, जम्मू कश्मीर तथा बिहार में इन बैंकों ने अपनी शाखाएं विभिन्न स्थानों पर खोली हुई है। जहां प्राथमिक बैंक नहीं है।
(ii) प्राथमिक सहकारी कृषि एवं विकास बैंक इन बैंकों का कार्यक्षेत्र एक तहसील या जिला होता है। ये किसानों को प्रत्यक्ष रूप से दीर्घकालीन कर्जे देते हैं।
(i) कार्य ये बैंक अचल संपति को बंधक रखकर कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए कर्जे देते हैं; जैसे-पुराने कर्जे को चुकाने के लिए भूमि तथा कृषि यंत्रों को खरीदने के लिए और भूमि संबंधी सुधार करने के लिए अधिक से अधिक 20 वर्षों के लिए ऋण देते हैं।
(ii) सदस्यता- इन बैंकों के सदस्य व्यक्ति और सहकारी समितियाँ दोनों हो सकती है।
(iii) पूँजी - ये बैंक अपनी पूँजी शेयर बेचकर तथा सुरक्षित कोष रखकर प्राप्त करते है। पूँजी का सबसे अधिक भाग ऋणपत्रों या डिबेंचरों के द्वारा प्राप्त होता है। ऋणपत्र रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, जीवन बीमा निगम, स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, सहकारी बैंक तथा राज्य सरकारें तथा राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक खरीदता है। सन् 1975 से केंद्रीय सरकार ने भी प्रत्यक्ष रूप से इन बैंकों में धन लगाना आरम्भ कर दिया है।
(iv) प्रगति - मार्च 2007 के अंत में भारत में 20 केंद्रीय सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक तथा 768 प्राथमिक सहकारी कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक थे। केंद्रीय बैंकों ने रु. 2,436 करोड़ के दीर्घकालीन ऋण दिए। इनके रु. 18,644 करोड़ के ऋण बकाया थे। प्राथमिक बैंकों ने 2005-06 में रु. 17,713 करोड़ के ॠण दिए तथा इनके रु 11,209 करोड़ के ऋण बकाया थे।
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