राष्ट्रीय आय का अर्थ , परिभाषायें - Meaning and definitions of national income

राष्ट्रीय आय का अर्थ , परिभाषायें - Meaning and definitions of national income


राष्ट्रीय आय की अवधारणा का अर्थशास्त्रा में महत्वपूर्ण स्थान हैं। साधारण शब्दों में किसी देश में एक वर्ष में जितना उत्पादन होता है चाहे वो भौतिक पदार्थों का हो और चाहे सेवाओं का, वही उस देश की आय है । यथार्थतः किसी देश में एक वर्ष की अवधि में उत्पादित अन्तिम वस्तुओं एंव सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय आय कहते हैं । दोहरी गणाना से बचने के लिए इसमें कच्चे माल तथा मध्यवर्ती पदार्थों के उत्पादन को सम्मिलित नहीं किया जाता है। राष्ट्रीय आय, राष्ट्रीय लाभाष, राष्ट्रीय व्यय, राष्ट्रीय उत्पादन आदि शब्द एक दूसरे के स्थान पर एवं पयार्यवाची शब्दों के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाते समय वस्तुओं एवे सेवाओं के उत्पादन में प्रयुक्त मशीनों एवं संयत्रों के मूल्य ह्यास अथवा टूट फूल को घटा दिया जाता है राष्ट्रीय आय को लगान, ब्याज, मजदूरी एवं लाभ के रूप में विभन्न उत्पत्तिस साधनों (भूमि पूंजी श्रम एव साहसी इत्यादि) में वितरित कर दिया जाता है।

अन्य बातों के समान रहते हुये राष्ट्रीय आय जितनी अधिक होगी, उतना ही प्रत्येक साधन का अंश अथवा भाग (Share) अधिक होगा। राष्ट्रीय आय को तीन भिन्न दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है कुल उत्पादन मूल्य के रूप में, कुल प्राप्तियों (receipts) के रूप में तथा कुल व्यय ( expenditure ) के रूप में, तीनों दृष्टिकोणों से हम एक ही परिणाम पर पहुचते हैं। ऐसा क्यों ? अर्थव्यवस्था में जो कुछ भी व्यय किया जाता है वह तत्काल किसी न किसी की आय होती है, अतः सभी आयों का जोड़ बराबर होगा सभी व्ययों के जोड़ के चूंकि उत्पादित पदार्थों और प्रस्तुत सेवाओं के विक्रेता उनको उन कीमतों पर बेचते हैं जिन पर कि क्रेता उनसे खरीदते हैं, इसलिये विक्रेताओं की कुल आय (total receipts) बराबर होगी क्रेतराओं के कुल व्यय के और कुल आय या कुय व्यय बराबर होगा उन समस्त पदार्थों एवं सेवयाओं के मूल्य के जो खरीदी या बेची गयी है।


परिभाषायें (Definition)


राष्ट्रीय आय की तीन प्रमुख परिभाषायें मार्शल, पीगू तथा फिशर द्वारा प्रस्तुत की गयी है। प्रो० मार्शल के अनुसार, किसी देश का श्रम व पूंजी उस देश के प्राकृतिक साधनों पर कार्य करते हुये जो प्रतिवर्ष भौतिक तथा अभौतिक वतुओं एवं सभी प्रकार की सेवाओं का जो शुद्ध योग (net aggregate) उत्पन्न करते हैं उसे ही उस देश की शुद्ध वार्षिक आय अथवा राष्ट्रीय लाभांश करते है ।"


इस प्रकार मार्शल के अनुसार देश की सम्पूर्ण उत्पादन क्रियाओं द्वारा उत्पन्न शुद्ध निर्गतों (Net Outputs) का योग करने पर हमें देश की कुल शुद्ध उत्पत्ति का पता चल सकता है। शुद्ध उत्पत्ति को निकालने के लिये कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से मशीनों की घिसावट अर्थात मूल्य ह्रास को घटा दिया जाता है और विदेशों में विनियोग की गयी पूंजी पर मिलने वाली ब्याज आय को जोड़ दिया जाता है। स्मरण रहे, बिना किसी आर्थिक लाभ के की गयी व्यक्तिगत सेवायें या उत्पादन क्रियाओं का उत्पादन मूल्य उसमें नहीं जोड़ा जाता है जैसे बढ़ई द्वारा स्वयं के लिये फर्नीचर बनाना आदि ।