विपणन अनुसंधान में माप एवं पैमाना - Measurement and Scale in Marketing Research
विपणन अनुसंधान में माप एवं पैमाना - Measurement and Scale in Marketing Research
पिछले कुछ समय से विपणन के क्षेत्र में माप एवं पैमाना उपकरणों के विकास पर अत्याधिक बल दिया जा रहा है। फलस्वरुप विपणन घटनाओं एवं समस्याओं को मापने के लिए अनेक पैमानों की खोज की गई है। सतत प्रयासों के बावजूद इन पैमानों में वह परिशुद्धता नही आ पाती जो भौतिक घटनाओं को मापने वाले पैमानों में देखी जाती है। इस संबंध में कुछ प्रमुख बाधाए निम्नलिखित है-
(i) अधिकांश विपणन समस्याएं एवं घटनाए अमूर्त होती है जिनकी इन्द्रियों द्वारा अध्ययन नहीं किया जा सकता है स्वभाव रुचि प्राथमिकता, लगाव आदि में परिवर्तन न केवल अमूर्त होता है अपितु गुणात्मक प्रकृति का भी होता है अतः ऐसे गुणात्मक तथ्यो को परिणात्मक तथ्यों में परिवर्तित किया जा सकता है।
(ii) विपणन घटनाए विविध कारणों का परिणाम होती है। फलत पैमाने के निर्माण हेतु किसी एक प्रमुख कारक को ज्ञात करने का या उसे महत्व देना भी अति जटिल कार्य होता है।
(iii) विपणन घटनाओं में सर्वाधिक असमानता पायी जाती हैं। विभिन्न उपभोक्ताओं या ग्रहकों के रीति-रिवाज, संस्कृति, परम्परा, विश्वास आदि विभेद उत्पन्न करने वाले कारक है जो अनेक उपभोक्ताओं के विचारों मूल्यों एवं मानव समुदायों का निर्माण करते हैं विपणन घटनाओं की परिवर्तनशीलता भी मापन एवं पैमाने निर्माण में बाधा उत्पन्न करते हैं। वस्तुओं की विविधता, विज्ञापन एवं प्रचार, प्रतिस्पर्धा परिवर्तित कीमतें एवं विक्रय शर्तें आदि ऐसे तथ्य है जिनमें सतत परिवर्तन होता रहता है अतः जो पैमाना आज किसी विपणन समस्या विशेष पर लागू होता है वह परिस्थितयों में आगे भी लागू हो कहना कठिन है।
(iv) उपभोक्ताओं के मूल्यो, प्रतिमानों एवं विश्वासों के लिए विपणन अनुसंधान में कोई सर्वसम्मत तथा सर्वप्रचलित माप उपलब्ध नहीं है। ऐसे माप के अभाव के कारण विपणन घटनाओं एवं तथ्यों का मूल्यांकन उपभोक्ता अपनी-अपनी समझ एवं दृष्टिकोण के अनुसार करता है। अतः किसी भी वैध सर्वमान्य पैमाने का निर्माण करना कठिन समस्या बन जाता है।
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