क्षेत्रीय संतुलित विकास के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय - Measures adopted by the Government for Regional Balanced Development

क्षेत्रीय संतुलित विकास के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय - Measures adopted by the Government for Regional Balanced Development


क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लिए या क्षेत्रीय संतुलित विकास के लिए सरकार ने विभिन्न प्रकार के प्रयास किए है। सरकार द्वारा किए गए मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं -


(क) एक्ट लागू करना भारत सरकार द्वारा सन 1951 में औद्योगिक विकास एवं नियमन एक्ट - पास कर दिया गया। इसका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक केंद्रीयकरण वाले क्षेत्रों में नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना करने पर प्रतिबंध लगाना था ।


(ख) सार्वजनिक उपक्रमों का विकास भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का विकास किया। इन उद्योगों को अविकसित क्षेत्रों या कम विकसित क्षेत्रों में स्थापित करने पर बल दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि ऐसे क्षेत्रों में छोटी इकाइयों के रूप में सहायक उद्योगों की स्थापना हो सके। 


(ग) केंद्रीय सब्सिडी योजना क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने के लिए यह योजना 1970 में आरंभ की गई। इस योजना के अंतर्गत निम्नलिखित प्रावधान किए गए - 


(I) सरकार द्वारा निजी, सार्वजनिक, सयुक्त तथा सहकारी सभी क्षेत्रों के उद्योगों को सब्सिडी दी जाएगी।


(ii) यह सब्सिडी आयकर से मुक्त होगी।


(iii) इस योजना के अंतर्गत केंद्रीय सरकार विशेष रूप से 102 पिछड़े हुए जिलों में स्थापित होने वाले उद्योगों को सहायता देगी ऐसे उद्योगों को पूंजी निवेश का 15 लाख रूपए या 15 प्रतिशत, जो भी कम हो,

सब्सिडी के रूप में दिया जाता है। 


(iv) आरंभ में यह सब्सिडी प्रत्येक पिछड़े राज्य के एक पिछड़े हुए जिले को ही दी जाती थी।

अब यह बढ़कर प्रत्येक पिछड़े राज्य के 2 से 6 जिलों तथा विकसित राज्य के 1 से 3 जिलों में कर दी गई है।


(घ) यातायात सब्सिडी योजना - केंद्रीय सरकार द्वारा यह योजना 1971 में आरंभ की गई। वर्तमान में यह योजना पहाड़ी राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, असम, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम तथा उत्तराखंड के पहाड़ी इलाको में लागू है।

उन राज्यों को उद्योगों के लिए कच्चा माल लाने तथा तैयार ले जाने के लिए यातायात लागत का 50 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में प्रदान किया जाता है।


(ङ) आयात की सुविधाएं भारत में पिछड़े हुए क्षेत्रों में स्थापित उद्योगों के लिए कच्चा माल, मशीनों इत्यादि के आयात की आवश्कता पड़ती है। ऐसे उद्योगों को आसान आयात लाइसेन्स देने की सुविधा दी गई है।


(च) आयकर से छूट:- भारत सरकार ने 31 मार्च, 1973 के पश्चात् पिछड़े हुए क्षेत्रों में स्थापित होने वाले उद्योगों अथवा होटलों के लाभों का 20 प्रतिशत आयकर से मुक्त घोषित कर दिया है। ऐसी छूट पहले दस वर्षो तक दी जाएगी। 


(छ) औद्योगिक बस्तिया- सरकार ने देश के विभिन्न राज्यों में विशेष तौर पर पिछड़े हुए राज्यों में औद्योगिक बस्तियां स्थापित की हैं। इन बस्तियों में सभी प्रकार की सेवाएं जैसे विकसित भूमि, विद्युत तथा जरूरी सेवाए रियायती दरों पर दी जाती है। मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :


(i) उद्योगों का विकेंद्रीकरण,


(ii) बड़े नगरों की अपेक्षा छोटे नगरों के पास औद्योगिक बस्तिया स्थापित करना,


(iii) सहायक उद्योगों को प्रोत्साहित करना ।


(ज) भूमि एवं भवन व्यवस्था- कई राज्यों में पिछड़े हुए क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइया स्थापित करने के लिए कई प्रकार की रियायतें दी जाती हैं, जैसे


(i) आसान शर्तों पर लंबी अवधि के लिए भूमि पट्टे पर दी जाती है। 


(ii) औद्योगिक बस्तियों में बनाए जाने वाले भवनों के लिए आशिक अनुदान की व्यवस्था की गई है


(iii) कई राज्यों में भूमि के मूल्य का 25 से 50 प्रतिशत अनुदान के रूप में देने की सुविधा है। शेष राशि किश्तों के रूप में ली जाती है।


(झ) विद्युत उत्पादन में छूट कई राज्य सरकारों ने पिछड़े हुए क्षेत्रों में विद्युत उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए विद्युत शक्ति की दर में छूट देने की व्यवस्था की है।

ऐसी छूट पिछड़े हुए या अविकसित क्षेत्रों में स्थापित विद्युत उत्पन्न करने वाली इकाइयों को दी जाती है। जैसे उत्तर प्रदेश सरकार ने 5 वर्ष तक उन इकाइयों को विद्युत कर से छूट दे रखी है जो इकाइयां पिछड़े हुए क्षेत्रों में 85 लाख से अधिक पूंजी निवेश करती हैं।


(ञ) विक्रय कर में छूट - सभी राज्य सरकारें उन औद्योगिक इकाइयों को विक्रय कर में छूट या कुछ रियायतें देती है जो इकाइया पिछडे हुए क्षेत्रों में स्थापित की जाती है जैसे राजस्थान सरकार ने ऐसी इकाइयों पर पाच वर्षों तक विक्रय कर से छूट दे रखी है। 

(ट) पूंजी निवेश सब्सिडी योजना:- यह योजना पाचवी पंचवर्षीय योजना में आरंभ की गई। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों में इस योजना को लागू करना था, जिनमें केंद्रीय सब्सिडी योजना लागू नहीं की गई थी। इसमें पूंजी निवेश का 15 प्रतिशत अथवा 15 लाख रूपए जो कम है, सब्सिडी के रूप में उद्यमकर्ताओं को सरकारों द्वारा दिया जाता है। आदिवासी क्षेत्रो में स्थापित इसकी व्यवस्था 20 प्रतिशत तक की गई है।


(ठ) अधोसंरचना का विकास- इसके अंतर्गत यातायात, संचार, विद्युत, जलापूर्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि सुविधाएं आर्थिक और सामाजिक संरचना में आती है। राज्य सरकारें पिछड़े हुए क्षेत्रों में अधोसंरचना का विकास कर रही है, ताकि कुछ हद तक क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सके। 


(ड) सहयोग देना- राज्य सरकारें औद्योगिक इकाइयों को पिछड़े हुए क्षेत्रों में स्थापित करने के लिए विशेष सहायता प्रदान करती है। जैसे प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने में पूर्ण सहयोग देना तथा राज्य वित्तीय निगमों से सस्ती ब्याज दरों पर ऋण सुविधाएं प्रदान करना इत्यादि


(ढ) सस्ती ऋण सुविधाएं भारत के वित्त निगम पिछड़े हुए क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने के लिए सस्ती ब्याज दर पर ऋण प्रदान करते हैं। ऐसी ऋण सुविधाएं महत्वपूर्ण निगमों द्वारा दी जाती है जैसे भारतीय औद्योगिक वित्त निगम


(ण) तकनीकी सहायता - भारतीय औद्योगिक विकास बैंक के द्वारा राज्यों तथा अन्य वित्तीय निगमों के सहयोग से संगठनों की स्थापना की गई है।

इन संगठनों का उद्देश्य नए उद्यमियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना है। ऐसे सात संगठन जम्मू, कानपुर, कोचीन, गोहाटी, हैदराबाद, भुवनेश्वर, तथा पटना में स्थापित किए गए है। इन संगठनों द्वारा लघु एवं मध्यम इकाइयों तथा राज्य स्तर के निगमों को तकनीकी एवं औद्योगिक प्रबंध के लिए सलाह दी जाती हैं। इन संगठनों द्वारा नए उद्यमकर्ताओं को प्रशिक्षण भी दिया जाता है।


( प ) लघु उद्योगों को सुविधाएं राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम के द्वारा पिछड़े क्षेत्रों में स्थापित होने वाली लघु औद्योगिक इकाइयों को मशीनें उपलब्ध करवाई जाती हैं। ये मशीनें किराया खरीद पद्धति के आधार पर दी जाती हैं। इसके अंतर्गत पिछड़े क्षेत्रों में मशीन की कीमत का 10 प्रतिशत भाग आरंभ में लिया जाता है। परंतु विकसित क्षेत्रों में यह भाग 15 प्रतिशत है। शेष राशि आसान किस्तों में ली जाती है ऐसी राशि पर पिछड़े हुए क्षेत्रों में ब्याज की दर भी कम निर्धारित की गई है।