भारत में वैश्वीकरण के लिए किए गए उपाय - Measures taken for Globalization in India
भारत में वैश्वीकरण के लिए किए गए उपाय - Measures taken for Globalization in India
भारत की नयी आर्थिक नीति की घोषणा वर्ष 1991 में की गई। इस नीति में नए आर्थिक सुधारों, जिसमें मुख्यत उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण शामिल हैं. को अपनाया गया है। इन आर्थिक सुधारों का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को बहुत तीव्र करना तथा इसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने योग्य बनाना था। इस नीति में सरकार ने उत्पादों व सेवाओं के आयात व निर्यात पर लगे टैरिफ व गैर-टैरिफ प्रतिबंधों को कम कर दिया है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया है। सरकार ने विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवेश की अनुमति दे दी है तथा भारतीय कंपनियों को विदेशों में निवेश की विदेशी सहयोग की विदेशों में संयुक्त उपक्रम स्थापित करने की अनुमति दे दी है। इन आर्थिक सुधारों से भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ गई है तथा अधिक प्रतिस्याधात्मक हो गई है। इन आर्थिक सुधारों के परिणामस्वरूप बहुत-सी विदेशी कंपनियों ने भारत में व्यावसायिक इकाईया स्थापित की है,
भारतीय व्यावसायिक इकाइयों को आधुनिक टेक्नोलॉजी उपलब्ध करवाई गई हैं, भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक उत्पाद उपलब्ध करवा कर उनकी चयन क्षमता को बढ़ाया है।
(क) विदेशी निवेश में वृद्धि
आर्थिक सुधारा से पहले भारत में स्थापित किसी उद्योग में विदेशी पूंजी की अधिकतम सीमा 40 प्रतिशत निर्धारित की गयी थी नयी आर्थिक नीति में इसे बढ़ाकर कुछ क्षेत्रों के लिए 100 प्रतिशत, कुछ क्षेत्रों के लिए 74 प्रतिशत तथा कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योगों के लिए 49 प्रतिशत कर दिया गया है। विदेशी विनिमय अधिनियम, जो विदेशी पूंजी के स्वतंत्र प्रवाह में बाधा था, इसे रद्द करके इसके स्थान पर विदेशी विनिमय प्रबंध अधिनियम को लागू किया गया है।
इस अधिनियम में विदेशी पूजी से सबंधित नियमों को आसान बनाया गया है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों के निवेशों को भारत में आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रोत्साहनों की घोषणा की गई है।
(ख) भारतीय रूपये की आर्थिक परिवर्तनशीलता:
नयी आर्थिक नीति में भारतीय रूपये का विदेशी मुद्रा में बदले जाने को स्वतंत्र कर दिया गया है। अब भारतीय रुपये की विदेशी मुद्राओं से विनिमय दर बाजार शक्तियों द्वारा निर्धारित की जाती है। जबकि पहले इस विनिमय दर को रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित किया जाता था। निम्न कियाओं के लिये भारतीय रूपये की परिवर्तनशीलता को स्वतंत्र किया गया है (1) वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात (ii) विदेशी निवेश पर दिया जाने वाला व्याज या लाभाश (iii) भारत में कार्य कर रहे विदेशियों द्वारा अपने परिवारों को भेजी जाने वाली राशि हाल ही में भारतीय सरकार रूपये को विदेशी मुद्रा में पूर्ण रूप से परिवर्तनशील बनाने के लिए योजना बना रही है।
(ग) दीर्घकालीन विदेशी व्यापार नीति:
विदेशी व्यापार नीति में आयात व निर्यात से संबंधित नीति को शामिल किया जाता है। वैश्वीकरण को बढ़ावा देने के लिए विदेशी व्यापार नीति को उदार बनाया गया है। आयात व निर्यात पर लगी रूकावटों को कम किया गया है। भारत की वर्तमान निर्यात व आयात नीति 2009-14 भी एक उदार नीति है।
(घ) टैरिफ में कमी:
नई आर्थिक नीति में आयात व निर्यात करो को कम किया गया है। सरकार ने विकास को बढ़ावा देने के लिए कच्चे माल, टेक्नोलॉजी तथा पूँजीगत उत्पादों को आयात कर से मुक्त कर दिया है। इससे भारत के अन्य देशों के साथ व्यापार को बढ़ावा मिला है।
(ङ) निर्यात प्रोत्साहन उपाय
विश्व व्यापार में भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिये नयी विदेशी व्यापार नीति में निर्यात प्रोत्साहन से संबंधित विभिन्न उपाय किये गये हैं। बहुत सी निर्यात संवर्द्धन योजनाएं जैसे विशेष कृषि व ग्राम उद्योग योजना, बाजार विशेष योजना, उत्पाद विशेष योजना, सर्ल्ड फॉम इंडिया आदि चलाई गई है।
(च) लाभ व पूजी वापस ले जाने की स्वतंत्रता
नयी आर्थिक नीति से पहले विदेशी निवेश को भारत में आगमन की स्वीकृति इस शर्त पर दी जाती है कि विदेशी निदेशक अपने निवेश व इस पर अर्जित आय को रिजर्व बैंक की पूर्व अनुमति के बिना अपने मूल देश में वापस नही ले जा सकेंगे रिजर्व बैंक इस निवेश व इस पर अर्जित आय को वापस ले जाने की अनुमति बड़ी मुश्किल से देता था।
यह प्रावधान विदेशी निवेश के अंतरप्रवाह में एक बड़ी रूकावट था वैश्वीकरण के अंतर्गत विदेशी निवेश व इस पर अर्जित आय को मूल देश में वापस ले जाने की स्वतः अनुमति दे दी गई है। इससे भारत में विदेशी निवेश के अंतप्रवाह में बहुत वृद्धि हुई है।
(छ) विदेशी तकनीक समझौतों में वृद्धि
नए आर्थिक सुधारों के अंतर्गत सरकार ने विदेशी तकनीक के आयात को उदार बना दिया है। अब बहुत सी भारतीय व्यावसायिक इकाईया विदेशी तकनीक प्राप्त करने के लिए विदेशी प्रौद्योगिकी समझौते करती है। अब भारतीय कंपनिया भारतीय रिजर्व बैंक की अनुमति के बिना भी विदेशी तकनीकी विशेषज्ञों की सेवाओं का भुगतान कर सकती हैं। नयी आर्थिक नीति के अंतर्गत विदेशी तकनीक, विदेशी तकनीकी विशेषज्ञों व स्वदेश में विकसित टेक्नोलॉजी के विदेशों में परीक्षण आदि संबंधित भुगतान के लिए किसी सरकारी पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है।
(ज) संयुक्त उपक्रमों की स्थापना
विदेशों में संयुक्त उपक्रमों की स्थापना संबंधी प्रावधानों को सरल व उदार बना दिया गया है। अब विदेशी निवेशक भारत में स्थापित संयुक्त उपक्रमों की अंश पूजी के 51 प्रतिशत से भी अधिक अशो का स्वामित्व अपने पास रख सकते हैं भारत में व विदेशों में संयुक्त उपक्रमों की स्थापना की प्रक्रिया को बहुत सरल बना दिया गया है। एम.आर. टी. पी. अधिनियम, जो वैश्विक अधिग्रहण व विलयन में बहुत बड़ी बाधा था, उसे रह कर दिया गया है तथा इसे एक उदार अधिनियम प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 से प्रतिस्थापित किया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत वैश्विक अधिग्रहण या विलयन के फलस्वरूप संयुक्त संपत्तिया व संयुक्त विकय संबंधी सीमा को बढ़ा दिया गया है।
(झ) उदारीकरण:
वैश्वीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने विदेश नीति विदेशी निवेश नीति आद्योगिक व लाइसेंसिंग नीति, कराधान नीति,
मौद्रिक नीति आदि को उदार बनाया है। सरकार ने विदेशी व्यापार व विदेशी निवेश संबंधित प्रक्रिया, दस्तावेजों, फार्मों आदि को सरल बनाया है। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए तथा अफसरशाही संबंधी प्रशासनिक बाधाओं को कम करने के लिए तथा लंबी व जटिल प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए एकल खिड़की योजना चलाई गई। इसके अंतर्गत विदेश व्यापार व विदेशी निवेश से संबंधित सभी समस्याओं व अनिवार्यताओं / औपचारिकताओं का एक ही स्थान से निवारण किया जाता है। अब बहुत से उद्योगों को लाइसेंसिंग के प्रावधानों से मुक्त कर दिया गया है। अब केवल 5 उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग की अनिवार्यता है। एम. आर. टी. पी. अधिनियम का भी समाप्त कर दिया गया है।
(ञ) निजीकरण
नए आर्थिक सुधारों के अंतर्गत सरकार ने निजीकरण को बढ़ावा दिया है अब निजी क्षेत्र की इकाईया उन उद्योगों में भी अपनी इकाईया स्थापित कर सकती है।
सार्वजनिक क्षेत्र के आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से कम करके 2 कर दिया गया है। बहुत से उद्योग जो पहले लघु औद्योगिक इकाईयों के लिए आरक्षित थे, अब बड़ी औद्योगिक इकाईयों के लिए खोल दिए गए है। बढ़ते निजीकरण से विदेशी निवेशकों को लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेश के अवसर बढ़ गए है।
(ट) विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड की स्थापना
विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड की स्थापना की गई है। यह बोर्ड विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए भारत में व विदेशों में सम्मेलनों का आयोजन करता है।
(ठ) भारतीय कंपनियों को विदेशी बाजारों से कोष एकत्रित करने की अनुमतिः
भारतीय कंपनियों को विदेशी पूंजी बाजारों में वैश्विक जमा प्राप्तिया, अमेरिकन जमा प्राप्तियां, विदेशी मुद्रा परिवर्तनशील बॉण्ड आदि जारी करने की अनुमति दी गई है। इससे भारतीय कंपनियों की पूजी लागत कम हो गई है, क्योंकि विदेशी बाजारों में कोप कम लागत पर उपलब्ध होते हैं।
(ड) वित्तीय क्षेत्र में सुधार:
वित्तीय क्षेत्रों में विभिन सुधार किए गए है, जैसे- बैंकिंग क्षेत्र, बीमा क्षेत्र, मुद्रा बाजार पूंजी बाजार आदि को सुदृढ, उदार, स्वस्थ व सुरक्षित बनाने के लिए कई कदम उठाए गए है। वित्तीय बाजार में वित्तीय घोटालों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न नियमन प्राधिकरणों को सुदृढ़ किया गया है जैसे-सेबी, भारतीय रिजर्व बैंक, बीमा नियमन व विकास प्राधिकरण आदि को सुदृढ़ किया गया है। इससे घरेलू व विदेशी पूंजी प्रवाह में वृद्धि हुई है।
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