माँग पूर्वानुमान की विधियाँ - Methods of Demand Forecasting

माँग पूर्वानुमान की विधियाँ - Methods of Demand Forecasting


माँग पूर्वानुमान की अनेक विधियाँ उपलब्ध है, परन्तु इनमें से कोई विधि ऐसी नही है जिसको दोशमुक्त कहा जा सके। माँग पूर्वानुमान के लिए आधुनिक एवं परम्परागत दोनों प्रकार की विधियों का ही उपयोग किया जता है आधुनिक विधियाँ गणितात्मक एवं जटिल हैं जबकि परम्परागत विधियाँ भूतकालीन अनुभवों एवं अनुमानों को अधिक महत्व प्रदान करती हैं। प्रायः माँग पूर्वानुमानो के लिए निम्न विधियों का उपयोग किया जाता है:


(1) अनुभव के अनुसार अनुमान (Experience-Based Estimates) - प्राय: प्रबन्धकों को लम्बे समय तक एक कार्य को करते हुए इतना अनुभव हो जाता है कि वहा माँग में परिवर्तन लाने वाले तत्वों को निकट से जानने लगता है। अतः वह व्यक्ति अपने अनुभव के अनुसार यह अनुमान लगा लेते हैं कि उस वस्तु की भावी माँग क्या होगी। अनेक बार यह कहा जाता है

कि एक मुंशी व्यवस्थित पूर्वानुमान लगाने की अपेक्षा अच्छा पूर्वानुमान लगा लेता है। इसका कारण यह है कि व्यावहारिक बातों का ज्ञान एक मुंशी को अधिक होता है।


(2) लोगों की सामूहिक राय मालूम करके (To know the collective opinion of the people ) - इस विधि के अन्तर्गत विक्रयकर्ता अपने-अपने क्षेत्र की बिक्री के पूर्वानुमान लगाते हैं एवं इसको अपने क्षेत्रीय प्रबन्धक के पास भेजते है। इन पूर्वानुमानों का औचित्य यह होता है कि विक्रयकर्ता ग्राहकों के अधिक से अधिक निकट सम्पर्क में होते है, इसलिए इनको बाजार का सबसे अच्छा ज्ञान होता है। समस्त विक्रयकताओं से प्राप्त अनुमानों का पुनः निरीक्षण करके अनेक सुझावों को ध्यान में रखकर कुछ विशिष्ट तत्वों के सन्दर्भ मे देखा जाता है। जैसे वस्तु की किस्म, विज्ञापन, वस्तु का प्रस्तावित मूल्य आदि। इन विशेष तत्वों को ध्यान में रखकर पूर्वानुमानों को अन्तिम रूप दिया जता है। इन पूर्वानुमानों में समस्त विक्रयकर्ताओं,क्षेत्रीय प्रबन्धकों, विक्रय प्रबन्धकों, उत्पादन प्रबन्धकों तथा अन्य उच्च अधिकारियों की सामूहिक राय से पूर्वानुमान लगाये जाते हैं।


इस विधि के निम्न गुण-दोष हैं.


गुण- (i) यह विधि सस्ती है।


(ii) पूर्वानुमान वास्तविकता के अधिक निकट होते हैं।


(iii) यह विधि नवीन वस्तुओं के लिए भी ठीक है।


दोश - (i) यह विधि दीर्घकालीन पूर्वानुमानों के लिए उपयुक्त नहीं है।


(ii) यह विधि पूर्णतया व्यक्तिपरक (नइरमबजप अम) है। इसलिए सम्भव है कि विक्रयकर्ता अपने व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए पूर्वानुमान कम या अधिक कर सकते हैं।


(iii) अनेक विक्रयकर्ता आर्थिक परिवर्तनों से अपरिचित होते हैं इसलिए गलत अनुमान लगाते हैं।


( 3 ) खरीदने वालों के दृश्टिकोण का सर्वेक्षण (Buyers" opinion survey method)- यह विधि अल्पकालीन पूर्वानुमान लगाने की सर्वश्रेष्ठविधि मानी जाती है। इस विधि के अन्तर्गत केक्रेताओं से सम्पर्क करके यह मालूम किया जाता है कि भविष्य में वह अमुक वस्तु की कितनी मात्रा कय करेंगे। समस्त क्रेताओं की मॉंग मात्रा का योग ही माँग का पूर्वानुमान है खरीदने वालों का सर्वेक्षण दो प्रकार से किया जा सकता है। प्रथम, समस्त केताओं से सम्पर्क करके तथा द्वितीय नमूने के तौर पर सर्वेक्षण करके । अतः सदैव प्रतिचयन विधि


(Random samling) से पूर्वानुमान लगाया जाता है। इस विधि के अन्तर्गत प्रतिचयन अथवा नमूने की त्रुटि (Sampling error) रहने का भय रहता है। इस विधि के अग्रलिखित गुण तथा दोष है:


गुण- (i) यह विधि अल्पकालीन पूर्वानुमानों के लिए अधिक उपयोगी हैं। (ii) यदि क्रेताओं की संख्या कम हो तो यह विधि अधिक उपयुक्त रहती है। 


छोश- (i) दीर्घकालीन पूर्वानुमानों के लिए यह विधि अधिक उपयुक्त नहीं हैं 


(ii) यदि संगणना सर्वेक्षण किया जावे तो उसमें अधिक समय शक्ति तथा धन की आवश्यकता पड़ती है।


(iii) यदि देव प्रतिचयन विधि (Random sampling) का उपयोग किया गया है तो इसमें प्रतिचयन त्रुटि (Samling error) रहती है।