अवयस्क साझेदार - minor partner

अवयस्क साझेदार - minor partner


भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 30 (1) के अंतर्गत अवयस्क की स्थिति निम्न शब्दों में स्पष्ट की गई है- '- कोई व्यक्ति जो संबंधित राजनियम के अनुसार अवयस्क है, किसी भी फर्म में साझेदार नहीं बन सकता है, किन्तु वह समस्त साझेदारों की सहमति से साझेदारी के लोभों में सम्मिलित किया जा सकता है।" अवयस्क साझेदार के अधिकार ( अवयस्कता की स्थिति में)


i. प्रवेश पाना एक अवयस्क फर्म के सभी साझेदारों की सहमति से फर्म में प्रवेश पाने का अधिकारी है। यदि सभी साझेदार उसे फर्म में प्रवेश देने के एिल सहमत से जाते हैं तो भी उसे यह अधिकार है कि वह साझेदारी फर्म में सम्मिलित होना स्वीकार करे अथवा न करे। 


ii. लाभो में हिस्सा प्राप्त करना एक अवयस्क फर्म के केवल लाभों में से पूर्व निश्चित हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार है। 


lll. संपत्ति में से हिस्सा प्राप्त करना एक अवयस्क साझेदार संपत्ति में से उतना हिस्सा प्राप्त करने का अधिकारी है जितना अनुबंधन के अनुसार पहले निश्चित किया गया हो।


iv. लेख-पुस्तकों को देखना, निरीक्षण करना एवं प्रतिलिपि लेना अवयस्क फर्म की लेख पुस्तकोंको देखने निरीक्षण करने एवं उनकी प्रतिलिपि लेने का अधिकारी है, परन्तु यह अधिकार गोपनीय पुस्तकों के संबंधन में प्राप्त नहीं है।


V. अन्य साझेदारों पर वाद प्रस्तुत करना एक अवयस्क फर्म से अपना संबंधन विच्छेद करने पर फर्म व अन्य साझेदारोंके विरूद्ध फर्म के लाभों एवं संपत्ति में से अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए वाद प्रस्तुत करने का अधिकारी है।


vi. फर्म से अलग होना एक अवयस्क साझेदार फर्म से कभी भी अलग हो सकता है और फर्म में अपनी संपत्ति एवं लाभों में हिस्से के लिए फर्म एवं साझेदारों के विरूद्ध वाद प्रस्तुत कर सकता है। 


vii. हानियों में भागिता नहीं एक अवयस्क साझेदार केवल लाभों में हिस्सा पाने का अधिकारी है, हानियों में नहीं। 


viii. वयस्क होने पर अधिकार- ऐसे अवयस्क साझेदार के वयस्क होने से अथवा इस बात की जानकारी होने से कि उसे साझेदारी के लाभों में शामिल किया जा चुका था, इसमें से जो भी तिथि बाद में पड़े उसके छ: महीने के भीतर ही किसी भी समय इस बात की सार्वजनिक सूचना देना आवश्यक है कि उसने साझेदार बनना अथवा न बनना निश्चित कर लिया है।