विभेदात्मक एकाधिकार की आवश्यक शर्ते - Necessary Conditions for Determination Monopoly

विभेदात्मक एकाधिकार की आवश्यक शर्ते - Necessary Conditions for Determination Monopoly


विभेदात्मक एकाधिकार एकाधिकार का ही एक व्यापक स्वरूप है। इसके लिए निम्न आवश्यक शर्तें हैं:


(1 ) एकाधिकार स्थिति (Monopoly Position) - मूल्य - विभेद के लिए आवश्यक है कि वस्तु की विक्रेता एक ही हो और उसकी स्थिति एक एकाधिकारी की होनी चाहिए।


( 2 ) पृथक बाजार (Separete Market ) - विभेदात्मक एकाधिकारी के लिए आवश्यक है कि वस्तु की बिक्री वाले बाजार अलग-अलग होने चाहिए तथा उनमें किसी तरह का कोई सम्पर्क नहीं होना चाहिए जिससे कि क्रेता सस्ते मूल्य वाले बाजार से कय की गई वस्तु को महँगे मूल्य वाले बाजार में न बेच सके। बाजारों की पृथकता निम्न रूपों में देखी जा सकती हैं.


(प) उपभोकाओं की रूचियों तथा अधिमानों में अन्तर - जब क्रेता किसी ऊँची कीमत वाली वस्तु को श्रेष्ठवस्तु समझने लगते हैं तथा उन्हें वस्तु की कीमत की पूर्ण जानकारी भी नहीं होती है तो मूल्य विभेद सम्भव होता है। कई बार वस्तु के मूल्य में अन्तर बहुत कम होता है और उपभोक्ता इस अन्तर पर कोई ध्यान नहीं देता ।


(ii) वस्तु तथा सेवा की प्रकृति में अन्तर वस्तु या सेवा की प्रकृति ऐसी हो कि इसका हस्तान्तरण सम्भव नहीं हो तो मूल्य विभेद सम्भव होता है। उदाहरणार्थ, डॉक्टर एवं वकील की सेवा का हस्तान्तरण नहीं किया जा सकता है।


(iii) उपभोक्ता की क्रय शक्ति में अन्तर कय शक्ति में अन्तर के कारण भी मूल्य - विभेद सम्भव होता है। धनी व्यक्ति से ऊँची तथा निर्धन वर्ग से नीची फीस डॉक्टर द्वारा वसूल करना इसी का एक उदाहरण है।


(iv) उपभोक्ता की अज्ञानता जब उपभोक्ता किसी विक्रेता की एक ही सेवा का विभिन्न तरह के प्रयोगों में लाते हैं तब भी एकाधिकारी मूल्य विभेद कर सकता है उदाहरणार्थ भारतीय रेल की सेवाएँ विभिन्न वस्तुओं के परिवहन के लिए प्रयुक्त होती है तो भारतीय रेल विभाग विभिन्न वस्तुओं के लिए किराये की अलग-अलग दर लेती है। उदारहणार्थ कोयला की दूलाई दर सोने की ढुलाई दर से बहुत कम होती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति सोने को कोयले में परिवर्तित नहीं कर सकता है, अतः मूल्य विभेद सम्भव है।


(v) भौगोलिक दूरी तथा प्रशुल्क दीवारें - भौगोलिक दूरी और प्रशुल्क प्रतिबन्धों (Geographical distances & Tariff wall) के कारण भी बाजार पृथक हो जाते हैं और एकाधिकारी द्वारा मूल्य-विभेद की नीति अपना ली जाती है।


(vi) कानूनी स्वीकृति - सरकारी नियमन के कारण भी एकाधिकारी एक ही वस्तु को अलग-अलग मूल्यो पर बेचता है जिससे मूल्य विभेद होता है। उदाहरणार्थ, राज्य विद्युत मण्डल द्वारा बिजली का प्रति इकाई मूल्य कृषि, उद्योग तथा घरेलू उपयोग के लिए अलग-अलग वसूल की जाती हैं।


(vii) आदेश पर विक्रय-आदेश पर विक्रय (Sale on ofders) के अन्तर्गत एक विक्रेता क्रेता से अलग कीमत वसूल करता है जिससे मूल्य विभेद होता है।


( 3 ) माँग की लोच में भिन्नता (Defference in Elasticity of Demand ) - मूल्य विभेद की नीति के लिए यह आवश्यक है कि वस्तु की माँग की लोच दोनों बाजारों में अलग-अलग हो। जिस बाजार में वस्तु की माँग की लोच बेलोचदार या कम लोचदार है वहाँ एकाधिकारी वस्तु की ऊँची कीमत वसूल करता है तथा जिस बाजार में वस्तू की माँग की लोच अधिक लोचदार है वहाँ वस्तु की कम कीमत वसूल की जाती है। ऐसी नीति का पालन करने पर ही एकाधिकारी अपने लाभ को अधिकतम कर सकता हैं।