सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन का उद्भव एवं विकास - Origin and development of holistic quality management

सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन का उद्भव एवं विकास - Origin and development of holistic quality management


सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के उद्भव एवं विकास को चार चरणों के अंतर्गत समझा जा सकता है। यह चार चरण इस प्रकार हैं:


1. गुणवत्ता निरीक्षण / जांच (Quality Inspection)


2. गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control)


3. गुणवत्ता आश्वासन (Quality Assurance)


4. सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन (Total Quality Management)


गुणवत्ता सदैव से ही, जहाँ तक हम स्मृति कार्य करती है, विद्यमान रही है। हांलाकि इसके विकास के प्रथम चरण को 1990 से देखा जा सकता है जब फोर्ड कंपनी ने अपनी नई 'टी' (T) मॉडल कार को उत्पाद के रूप में बाजार में उतारा था। इस उत्पाद की परियोजना मानकों से तुलना एवं परीक्षण के लिए कंपनी ने निरीक्षक दलों की नियुक्ति शुरू की । यह निरीक्षण एवं जांच कार्य, उत्पादन एवं वितरण आदि के साथ-साथ प्रत्येक स्तर पर प्रयुक्त हुआ। इस कार्य का उद्देश्य निरीक्षकों द्वारा चिह्नित खराब गुणवत्ता वाले उत्पादों को स्वीकार्य गुणवत्ता वाले उत्पादों से अलग करना तथा फिर उन्हें नष्ट करना या फिर उन पर पुनः कार्य कर निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों के रूप में बेचना था।


बाद की औद्योगिक प्रगति के साथ ही सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के द्वितीय चरण का प्रारम्भ हुआ तथा गुणवत्ता को संचालित कौशलों, लिखित विनिर्देशों, मापन तथा मानकीकरण के माध्यम से नियंत्रित किया गया।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उत्पादन एवं विनिर्माण प्रणाली और जटिल हो गई तथा गुणवत्ता को श्रमिकों द्वारा स्वयं के बजाय निरीक्षण के द्वारा सत्यापित किया जाने लगा। निरीक्षण के द्वारा सांखिकीय गुणवत्ता नियंत्रण अर्थात अच्छे उत्पादों को खराब उत्पादों से अलग करने का उत्पादन उपरान्त प्रयास तब जा कर विकसित हुआ । नियंत्रण चार्ट (control chart ) के विकास तथा शेवहार्ट एवं डॉज-रोमिंग (Shewhart & Dodge-Roming ) द्वारा 1924-1931 में प्रस्तावित स्वीकार्य प्रतिदर्श विधियों (acceptance sampling methods) ने इस सदी को पूर्व की निरीक्षण सदी की तुलना में और अधिक समृद्ध बनाया। इस चरण में शेवहार्ट ने यह विचार प्रस्तुत किया कि दो प्रकार की प्रक्रिया भिन्नताओं को अलग करने तथा उनमें विभेदन करने में गुणवत्ता नियंत्रण सहायक हो सकता है; प्रथमतः, यादृच्छिक कारणों से उत्पन्न होने वाली भिन्नताएँ तथा द्वितीयतः चिह्नित अथवा विशिष्ट कारणों से उत्पन्न होने वाली भिन्नताएँ।

उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि विशिष्ट कारणों से उत्पन्न होने वाली भिन्नताओं को अलग करने से किसी प्रक्रिया को पूर्वानुमेय ढंग से कार्यरत बनाया जा सकता है। आगे उन्होंने ऐसे प्रक्रिया नियंत्रण के निरीक्षण के लिए तथा प्रतिकूलता अथवा विषमता के प्रमाणों को कम करने के लिए एक नियंत्रण चार्ट का अभिकल्पन किया। इस विकास के तृतीय चरण अर्थात् गुणवत्ता आश्वासन में पिछले सभी चरण सम्मिलित हैं, जो इस तथ्य का पर्याप्त विश्वास दिलाते हैं कि उत्पाद/ सेवाएँ, उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को पूर्ण करेंगे एवं उन्हें संतुष्ट रखेंगे। अन्य गतिविधियाँ जैसे की विस्तृत गुणवत्ता नियमावली, गुणवत्ता की लागत का उपयोग, प्रक्रिया नियंत्रण का विकास तथा गुणवत्ता प्रणाली के अंकेक्षण का विकास भी सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की गुणवत्ता नियंत्रण से गुणवत्ता आश्वासन की सदी के लिए हुआ है।

इस चरण में संसूचन गतिविधियों के निम्नस्तरीय गुणवत्ता से बचाव की दिशा में परिवर्तन पर प्रमुख बल दिया गया।


इस विकास के चतुर्थ चरण, अर्थात् सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन में व्यावसायिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में गुणवत्ता प्रबंधन के सिद्धांतों तथा अवधारणाओं की समझ तथा उनके क्रियान्वन को सम्मिलित किया गया। सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की मांग है कि गुणवत्ता प्रबंधन के सिद्धांत, संगठन के प्रत्येक स्तर, प्रत्येक चरण तथा प्रत्येक विभाग में प्रयुक्त होने चाहिए। सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन दर्शन के विचार को परिष्कृत गुणवत्ता प्रबंधन तकनीकों के अनुप्रयोग के माध्यम से भी समृद्ध करने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की प्रक्रिया में संगठन के आंतरिक मुद्दों से परे जाकर आपूर्तिकर्ताओं आदि के साथ संगठन के संबंधों को प्रगाढ़ करने का भी प्रयास करना चाहिए।