साझेदारी संलेख अथवा साझेदारी के आपसी संबंध - partnership deed or mutual relations of partnership
साझेदारी संलेख अथवा साझेदारी के आपसी संबंध - partnership deed or mutual relations of partnership
साझेदारी संलेख से आशय ऐसे दस्तावेज से है जिसमें साझेदारों के परस्पर के अधिकारों एवं कर्तव्यों का स्पष्ट रूप में उल्लेख होता है। ऐसी दशा में उनके अधिकार एवं कर्तव्य ऐसे समझौते द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। जगत मित्ता यहगल बनाम कैलाश चन्द्र सहगल के विवाद में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया था कि साझेदारों के अधिकार एवं कर्तव्य उनके द्वारा किये गए संलेख के द्वारा निर्धारित होते है। यिद साझेदारी संलेख में उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों का उल्लेख न हो, तो इसके अभाव में लागू होने वाले कानून लागू होते हैं।
साझेदारी अनुबंधपर आधारित होती है, इसलिए साझेदारों के अधिकार, कर्तव्य एवं दायित्व उनके परस्पर के अनुबंध पर निर्भर रहते हैं। यह लिखित अथवा मौखिकहो सकता है। परन्तु मौखिक समझौते को आपस में मतभेद होने पर सिद्ध करना मुश्किल होता है। शुरू में जब साझेदारी की स्थापना होती है तब साझेदारों में ऊँची भावनाएं होती हैं। समय बीतने पर वह प्रेम एवं अच्छी भावनाएं धीर-धीर लोप होने लगती है। इसलिए यह वाछनीय है कि व्यापार प्रारंभ करने से पहले एक लिखित समझौता कर लिया जाय। इसमें वे समस्त शर्ते व नियम लिखे रहने चाहिए जो व्यवसाय को सफलतापूर्वक चलाने के लिए साझेदार निश्चित करते हैं। इस पर सभी साझेदारों के हस्ताक्षर होने के साथ-साथ मुद्रांक लगाना अत्यंत आवश्यक है।
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