प्रति व्यापार के प्रकार- per business type
प्रति व्यापार के प्रकार- per business type
• वस्तु विनिमय - यह प्रति व्यापार का सबसे सरल प्रारूप है। इसमें दो देशों के मध्य बिना नकद भुगतान के उत्पाद / सेवाओं का प्रत्यक्ष विनिमय होता है। यह एक ही समय में या एक निश्चित समय अवधि के अंदर दो अलग-अलग समय पर हो सकता है। कई बार एक देश को ऐसे उत्पाद भी आयात करने पड़ते है, जिनका आयातक देश के लिए विशेष महत्व नहीं होता। इसके अलावा, यदि इन दो विनिमय व्यवहारों में समय अंतराल अधिक है तो निर्यातक देश को हानि होती है क्योंकि इसे निर्यात के बदले प्रतिफल कुछ समय के बाद मिलेगा अर्थात निर्यातक देश आयातक देश को कुछ समय के लिए वित्तीय सहायता दे रहा है।
• प्रति कय- इसमें व्यावसायिक इकाई यह समझौता करती है कि यह जिस देश में अपना उत्पाद बेचेगी, उससे कुछ विशेष उत्पाद खरीदेगी। मान लो. एक अमेरिकन कंपनी भारत में अपना उत्पाद बेचती है।
भारत इस कंपनी को अमेरिकन डॉलर के रूप में भुगतान करता था, परंतु अमेरिकन कंपनी इस भुगतान को नकद लेने के स्थान पर यह समझौता करती है कि यह निर्धारित समय में भारत से टेक्सटाईल खरीदेगी। इन दोनों व्यवहारों में मुद्रा का लेन-देन केवल लेखा पुस्तकों में ही होता है वास्तव में मुद्रा का आदान-प्रदान नहीं होता।
• ऑफ सेट - ऑफ सेट समझौते में उत्पाद निर्यात करने वाली इकाई इस बात पर सहमति करती हैं कि उत्पाद का निर्यात मूल्य नकद में न लेकर।
यह इसके बदले में निर्यात मूल्य के बराबर निर्धारित समय में कोई उत्पाद आयात करेगी ऑफ सेट समझौता प्रति कय समझौता ही है अंतर केवल इतना है कि प्रति कय में विशेष उत्पाद ही आयात किया जाता है,
जबकि ऑफ सेट में उतने ही मूल्य का कोई अन्य उत्पाद भी आयात किया जा सकता है। अतः यह समझौता प्रति कय समझौते की तुलना में अधिक लोचशील है।
• प्रतिफल:- इस समझौते को कय वापसी समझौता भी कहते है। इस समझौते में एक देश की व्यावसायिक इकाई अन्य देश में फैक्टरी स्थापित करने के लिए पूँजी या टेक्नोलॉजी या दोना प्रदान करती है। इसके बदले में यह उस फैक्टरी के उत्पादन का एक निर्धारित प्रतिशत एक निश्चित समय अवधि में प्रतिफल के रूप में लेती है।
• स्विच ट्रेडिंग:- यह एक तरह का प्रति कय समझौता है। इसमें निर्यातक को निर्यात के प्रतिफल के रूप में कुछ प्रति कय केडिट मिलते है। इसे निर्यातकर्ता किसी तृतीय पार्टी को हस्तांतरित कर सकता है। अर्थात् यदि निर्यातकर्ता स्वयं उत्पाद कय नहीं करना चाहता तो कडिट का यह अधिकार वह किसी अन्य तृतीय पार्टी को या ट्रेडिंग हाउस को बेच सकता है
जैसे माना भारत डेनमार्क को सॉफ्टवेयर निर्यात करता है तथा इसके प्रतिफल के रूप में इसे कुछ प्रति कय कॅडिट मिलते हैं। इससे भारत एक निर्धारित मूल्य के डेनमार्क उत्पाद एक निर्धारित समय में कय कर सकता है। अब यदि भारत को डेनमार्क से उत्पाद आयात करने की आवश्यकता नहीं है तो भारत इस क्रेडिट को किसी ट्रेडिंग हाउस को बेच सकता है जो डेनमार्क से उत्पाद खरीदना चाहता है। प्राय ट्रेडिंग हाउस से कैडिट कम कीमत पर खरीदते है।
• चुकता लेन-देन समझौता - इस समझौते में निर्यातक व आयातक दोनों देशों के कद्रीय बैंकों में चुकता लेन-देन खाता खोलते है। निर्यात व आयात बिना मुद्रा के आदान-प्रदान से होता है निर्यातक को आयातक से सीधे कोई भुगतान नहीं मिलता बल्कि उसे अपने देश के केंद्रीय बैंक से अपनी घरेलू मुद्रा में भुगतान प्राप्त होता है।
दूसरी तरफ, आयातक आयात के लिए भुगतान निर्यातक को सीधे न करके अपने देश के केंद्रीय बैंक को अपने देश की मुद्रा में करता है। दोनों देशों के केंद्रीय बैंक चुकता लेन-देन गृह के रूप में कार्य करते हैं।
(ख) अनुबंधीय प्रवेश प्रारूप
अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश का यह प्रारूप अमूर्त संपत्तियों, जैसे- पेटेन्ट टेक्नोलॉजी, प्रबंधकीय विशेषज्ञता, कॉपीराइट आदि के निवेश के लिए किया जाता है। जब मूल देश कंपनी ने अनुसंधान व नवाचार से कोई नयी टेक्नोलॉजी या अन्य अमूर्त संपत्ति विकसित की है, तो यह कंपनी अपनी इसी टेक्नोलॉजी या अमूर्त संपति के अनुसंधान संबंधी व्यय पूरे करने के लिए तथा इस पर लाभ अर्जित करने के लिए इस टेक्नोलॉजी को विदेश में बेच सकती है।
इस प्रवेश प्रारूप को तकनीकी सहयोग भी कहते हैं जो कंपनी टेक्नोलॉजी प्रदान करती है, वह इसके प्रतिफल के रूप में एकमुश्त राशि प्राप्त करती है। या नियमित रूप से विक्रय पर रॉयल्टी प्राप्त करती है। यह समझौता एक निश्चित समय अवधि के लिए व किसी निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र के लिए ही होता हैं। यह प्रारूप तब अपनाया जाता है जब विदेशी कंपनी मेजबान देश में अधिक पूंजी निवेश नही करना चाहती। इस प्रारूप में केवल तकनीकी कौशल ही निवेश किया जाता है परंतु इसमे टेक्नोलॉजी रहस्यो को गुप्त नहीं रखा जा सकता। मेजबान देश में टेक्नोलॉजी का दुरूपयोग संभव है तकनीकी सहयोग के विभिन्न प्रारूप- लाइसेंसिंग, फचाइजिंग, प्रबंधकीय अनुबंध, टर्नकी परियोजनाए आदि है।
(i) लाइसेंसिंग व फ्रेंचाइजिंग लाइसेंसिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई को अपनी बौद्धिक संपदा जैसे- पेटेन्ट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट आदि को प्रयोग करने का अधिकार किसी अन्य देश की व्यावसायिक इकाई को प्रदान करती है
लाइसेंस प्राप्त करने वाली व्यावसायिक इकाई लाइसेंस धारक व्यावसायिक इकाई को एक निश्चित समय अवधि के लिए रॉयल्टी या फीस देती है। अधिकतर देशों में रॉयल्टी की यह दर विकय के 5 से 8 प्रतिशत के मध्य होती है। लाइसेंसिंग समझौते से लाइसेंस धारक अपनी बौद्धिक संपदा का अधिकतम प्रयोग करके लाभ कमा सकता है फ्रेंचाइजिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई किसी दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई को विधिवत ढंग से व्यवसाय करने का अधिकार प्रदान करती है। इसमें फंचाइजिंग फ्रेंचाइजर के बांड से उत्पाद सेवाएं बेच सकता है कई बार फ्रेंचाइजर कुछ मुख्य उपकरण व कलपुर्जे फ्रेंचाइजी को उपलब्ध करवाता है. कुछ दशाओं में फ्रेंचाइजर दूसरे देश में डीलरों की नियुक्ति करता है उदाहरण के लिए साफ्ट ड्रिंक निर्माता, जैसे-पेप्सी, कोका कोला अपने उत्पाद को सिरप दूसरे देशों में फ्रेंचाइजी को उपलब्ध करवाते हैं फ्रेंचाइजर इकाई का अपना बोटलिंग प्लांट होता है जहां वे इस सिरप से स्वयं सॉफ्ट ड्रिंक बनाकर बोतलों में पैक करके फ्रेंचाइजर के बाड नाम से इसे बेचते है।
(ii) प्रबंधकीय समझौता इस समझौते के अंतर्गत विदेशी कंपनी किसी अन्य देश में अपनी प्रबंधकीय एजेंसियाँ स्थापित करती है। इन प्रबंधकीय एजेंसियों की सहायता से यह अन्य देशों की व्यावसायिक इकाइयों में बिना अपनी पूंजी निवेश किए. इन्हें प्रबंधित करती हैं अर्थात् इस समझौते में केवल प्रबंधकीय जानकारी ही उपलब्ध करवाई जाती है। इसे सेवा के बदले विदेशी कंपनी घरेलू कंपनी से लाभ का कुछ प्रतिशत या एकमुश्त राशि फीस के रूप में लेती है।
(iii) टर्नकी परियोजनाएं- इस समझौते में एक देश की व्यावसायिक इकाई किसी दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई के लिए पूर्ण प्लाट का निर्माण करने का समझौता करती है। जो व्यावसायिक इकाई प्लाट का निर्माण करती है, उसे लाइसेंसर कहते है जिस व्यावसायिक इकाई को पूर्ण निर्मित प्लाट मिलना है
उसे लाइसेंसधारी कहते है जब परियोजना की प्रारंभिक अवस्था, कार्यात्मक अवस्था की तुलना में अधिक जटिल होती है तो ऐसी परिस्थिति में टनकी परियोजना समझौते किए जाते है। इस समझौते में लाइसेसर के पास प्लाट निर्माण संबंधी तकनीक कौशल, ज्ञान तथा अनुभव होता है। इस सेवा के लिए लाइसेंसर या तो एकमुश्त राशि के रूप में या कुल परियोजना लागत का निर्धारित प्रतिशत प्रतिफल के रूप में लेता है जब नयी परियोजना को शुरू करने के लिए लाइसेंसधारी के पास अनुभव व मुख्य तकनीक की कमी होती है तो यह समझौता लाइसेंसधारी के लिए भी लाभकारी होता है। इस परियोजना से लाइसेंसधारी विश्वस्तरीय आधुनिक डिजाइनों का लाभ उठा सकता है लेकिन तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण लाइसेंसधारी की भविष्य में भी लाइसेंसर पर निर्भरता बनी रहती है।
(ग) निवेश प्रारूप
इस प्रारूप में मेजबान देश में पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी या आंशिक स्वामित्व वाली सहायक कंपनी स्थापित की जाती है। यह मेजबान देश में विद्यमान कंपनी के साथ विलयन या अधिग्रहण द्वारा भी स्थापित की जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय में प्रवेश की इस विधि का चयन तब किया जाता है जब मूल कंपनी के पास विशाल मात्रा में निवेश योग्य पूँजी है, प्रबंधकीय विशिष्टिता है, जोखिम वहन क्षमता है। मेजबान देश में व्यावसायिक वातावरण अनुकूल है. बाजार आकार बहुत विशाल है, भौतिक अधो संरचना सुविकसित है. सरकार का विदेशी पूँजी के अंतप्रवाह के प्रति दृष्टिकोण अनुकूल है. सांस्कृतिक वातावरण अच्छा है, उत्पादन के घटक पर्याप्त मात्रा में व कम लागत पर उपलब्ध है। निवेश प्रारूप के मुख्य प्रकार निम्नलिखित है-
(i) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का तात्पर्य विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनिया बनाने और उनका प्रबंध करने से हैं।
इसके अंतर्गत प्रबंध करने के उद्देश्य से अंशों को खरीद कर ली गई कंपनी भी शामिल है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की मुख्य विशेषता मेजबान देश में कंपनियों को अपने प्रबंध में लेना या मेजबान देश में प्रबंध के उद्देश्य से पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनियां बनाना है।
इस तरह के निवेश में उद्यम का पूरा जोखिम विदेशी निवेशक ही उठाता है और विदेशी निवेशक ही उद्यम के पूरे लाभ या हानि के लिये जिम्मेदार होता है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का एक अन्य रूप विदेशी सहयोग है। विदेशी सहयोग में विदेशी और घरेलू उद्यमी मिलकर संयुक्त उद्यम स्थापित करते हैं। यह विदेशी सहयोग वित्तीय सहयोग या तकनीकी सहयोग हो सकता है।
विदेशी प्रत्यक्ष निवेश समानान्तर या लंबवत दिशा में हो सकता है समानान्तर विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में मूल कंपनी उसी के जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनी विदेश में स्थापित करती है, जैसे-यदि बहुराष्ट्रीय कंपनी मूल देश में ऑटोमोबाइल बनाती है तथा अब यह विदेश में भी ऑटोमोबाइल बनाने के लिए सहायक कंपनी स्थापित करती है
लबयत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में मूल कंपनी विदेश में आगतों या कल-पुर्जी / उपकरणों के पूतिकर्ता से सहयोग समझौता करती है। ऐसे सहयोग समझौते को पीछे की दशा में लंबवत सहयोग समझौता कहते है। आगे की ओर लंबवत प्रत्यक्ष विदेशी सहयोग में मूल कंपनी विदेश में विपणन इकाइयों के साथ सहयोग समझौता करती है। इसमें उत्पादन कियाए तो मूल देश में ही की जाती है परंतु विपणन कार्य मेजबान देश में स्थित विपणन इकाई द्वारा किए जाते हैं।
(ii) विलयन एवं अधिग्रहण प्रवेश के इस प्रारूप में विदेशी कंपनी अन्य देश में विद्यमान व्यावसायिक इकाई के साथ विलयन या अधिग्रहण का समझौता करती है। यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भिन्न है क्योंकि उसमें मेजबान देश में एक नयी कंपनी की स्थापना की जाती है जबकि विलयन व अधिग्रहण में मूल कंपनी मेजबान देश में पहले से स्थापित व्यावसायिक इकाई के साथ गठबंधन का समझौता करती है।
विलयन या अधिग्रहण समानान्तर, लंबवत या सम्मिश्र / पिंड हो सकता है समानान्तर विलयन में एक जैसे व्यावसायिक कियाएं करने वाली एक जैसे उत्पाद बनाने वाली व्यावसायिक इकाइया आपस में विलयन करती है; जैसे ऑटोमोबाइल बनाने वाली एक इकाई अन्य ऑटोमोबाइल निर्माणी इकाई से मिलकर विलयन समझौता करती है समानान्तर विलयन से उत्पादन के बड़े पैमाने दर बचते प्राप्त होती है, टेक्नोलॉजी व प्रबंध कौशल का बेहतर उपयोग हो पाता है आगतों को अधिक मात्रा में इकट्टा कय करने पर उन पर छूट मिल जाती है। इससे उत्पादन लागत में कमी आती है। लंबवत विलयन व अधिग्रहण में व्यावसायिक इकाई आगतो व कलपुर्जो के पूर्तिकर्ताओं से या विपणन हो जाती है तथा विपणन कियाओं पर इकाई से विलयन करती है ऐसे विलयन से आगतों व कलपुर्जों में अनिश्चिता समाप्त हो जाती है तथा विपणन कियाओं पर भी बेहतर नियंत्रण रहता है। काग्लोबेट / सम्मिश्र विलयन में विभिन्न तरह के उत्पाद बनाने वाली इकाइयों आपस में विलयन कर लेती है। इससे ये इकाइयाँ विविधकरण द्वारा व्यावसायिक जोखिम को कम करती है। इससे विश्व में इस व्यावसायिक इकाई की छवि में सुधार आता है (विलयन व अधिग्रहण, एकीकरण में रूप या संविलयन में हो सकता है।
एकीकरण का आशय दो या दो से अधिक कंपनियाँ, जो कि एक जैसे व्यवसाय में लगी हुई हो, के द्वारा आपस में मिलकर एक नई कंपनी बनाना है। यह नई कंपनी एकीकरण में शामिल होने वाली सब कंपनियों के व्यवसाय का कय कर लेती है। एकीकरण की दो विशेषताएं हैं-
• विद्यमान कंपनियों का समापन तथा
• विद्यमान कंपनियों के व्यवसाय का कय करने के लिए एक नई कपनी की स्थापना। इस प्रकार एकीकरण में विद्यमान कंपनियां विक्रेता होती है तथा नई कंपनी कंता होती है। उदाहरण के लिए ए लिमिटेड तथा बी लिमिटेड दो कंपनिया सिले सिलाए वस्त्र का व्यापार करती है।
यदि ये दोनों कंपनियां आपस में मिलकर एक होना चाहें तो इन दोनों का समापन हो जाएगा और इन्हें कय करने के लिए एक नई सी लिमिटेड बना ली जाएगी।
संविलयन का आशय किसी सुदृढ़ विद्यमान कंपनी के द्वारा किसी अन्य कंपनी के व्यवसाय को कय करने से है।
वार्तालाप में शामिल हों