संगठन के विकास की दर , श्रम बाजार की प्रकृति - rate of growth of organization, nature of labor market
संगठन के विकास की दर , श्रम बाजार की प्रकृति - rate of growth of organization, nature of labor market
विकास स्वयं प्रबंधक नीतियों प्रतिस्पर्धा, देश की अर्थव्यवस्था आदि अनेक कारणों से प्रभावित होता है। संगठन के उत्पादन और विक्रय में वृद्धि द्वारा स्वतः ही कर्मचारी की माँग में वृद्धि नहीं हो पाती है। तकनीकी विकास के संदर्भ में मानव संसाधनों की आवश्यकता का अनुमान लगाते समय तकनीकी विकास की गति का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
श्रम बाजार की प्रकृति
श्रम बाजार एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें से नियोक्ता कर्मचारियों की भर्ती करने तथा इच्छुक व्यक्ति रोजगार की खोज करके उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं यह माँग तथा पूर्ति संबंधी तत्वों का मिलन स्थल है। सामान्यतः किसी भी संगठन के लिए एक निर्धारित श्रम क्षेत्र से ही पूर्ति होती है।
अपने श्रम - क्षेत्र का ज्ञान संगठन की श्रम की संभावित पूर्ति का अनुमान लगाने में सहायक होता है। साथ ही संगठन को इस बात का पता लगाने में भी सुविधा होती है। सभी कर्मचारियों की भर्ती से पूर्व यह जान लिया जाता है कि उसके श्रम के क्षेत्र से किस प्रकार के कर्मचारियों को प्राप्त किया जा सकता है उस क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करने के लिए इच्छुक लोग रोजगार की खोज किस तरह करते हैं और उनकी उस रोजगार से क्या उम्मीदें हैं?
कोई संगठन श्रम क्षेत्र की संपूर्ण उपलब्ध कार्य संसाधन में रुचि नहीं रखता, उसकी रुचि केवल यह मालूम करने में होती है कि किस प्रकार का कौशल उपलब्ध है संगठन की पारिश्रमिक आदि की व्यवस्था को देखते हुए कितने व्यक्तियों को संगठन की ओर आकर्षित किया जाना संभव होगा और संभावित प्रार्थियों का संगठन के प्रति दृष्टिकोण क्या है?
मतलब किसी विशेष संगठन के लिए कर्मचारियों की पूर्ति निम्न तीन बिंदुओं पर निर्भर करती है :
(1) श्रम बाजार में श्रम संसाधन की उपलब्धि
(2) संगठन तथा कार्य का आकर्षण
(3) संगठन की आवश्यकतानुसार विशिष्ट कौशल की माँग एवं उपलब्धि
मानव संसाधन नियोजन का उपरोक्त तीन बिंदुओं से घनिष्ट संबंध है । परिमाणात्मक एवं गुणात्मक मानव संसाधनों की उपलब्धि क्रय बाजार की प्रकृति पर निर्भर करती है। मानव संसाधनों की भावी आवश्यकताओं की पूर्ति का नियोजन इसको ध्यान में रखकर किया जाना आवश्यक है। साथ ही कर्मचारियों के प्रशिक्षण एवं विकास से संबंधी योजनाएँ भी श्रम पूर्ति की दशा को ध्यान में रखकर निश्चित की जानी चाहिए।
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