साझेदारों के आपसी संबंध - relationship between partners

साझेदारों के आपसी संबंध - relationship between partners


साझेदारों के आपसी संबंध समझौते द्वारा तय किये जाते हैं। यह समझौते लिखित अथवा मौखिक हो सकता है, किन्तु हर दशा में यह भारतीय अनुबंधन अधिनियम की धारा 23 के अनुसार होना चाहिए। यदि साझेदारों के बीच कोई स्पष्ट समझौता न हो तो उनके कर्तव्य, अधिकार, दायित्व तथा झगड़े आदि साझेदारी अधिनियम की धारएँ 9-17 के अंतर्गत दिए हुए नियमों के अनुसार तय किये जायेंगे। वे नियम निम्नलिखित हैं:


i. कारोबार के संचालन में भाग लेने का अधिकार -


ii. अपने कर्तव्यों को श्रमपूर्वक करना प्रत्येक साझेदार को कारोबार के संचालन में अपने कर्तव्यों को श्रमपूर्वक करना चाहिए। 


iii. सम्मति प्रकट करने का अधिकार कारोबारसे संबंधित किसी साधारण विषय पर मतभेद होने की दशा में फैसला साझेदारों के बहुतमतसे तय किया जा सकता है और फैसला तय होने से पहले प्रत्येक साझेदार का यह अधिकार होता है कि वह अपनी सम्मति प्रकट कर सके। 


iv. बाहियों का निरीक्षण करने का अधिकार प्रत्येक साझेदार को फर्म की बहियों तक पहुँचने तथा उसके निरीक्षणणा करने एवं उसका प्रतिलिपि लेने का अधिकार है।


V. बिना पारिश्रमिक के कार्य किसी भी साझेदार को कारोबार के संचालन में भाग लेने के लिए पारिश्रमिक पाने का अधिकार नहीं है। 


vi. लाभ-हानि का समान विभाजन साझेदारों के बीच व्यवसाय के संचालन से होनेवाले लाभ एवं हानि का विभाजन समान अनुपात में किया जाता है।


vii. पूँजी पर ब्याज नहीं किसी भी साझेदार को पूँजी पर ब्याज पाने का अधिकार नहीं होता है। यदि साझेदारी संलेख में पूँजी पर ब्याज पाने का समझौता हुआ हो तो यह ब्याज केवल फर्म के लाभों में से दिया जा सकता है।


viii. अग्रिम धन पर ब्याज यदि कोई साझेदार कारोबार के कार्य में अपनी पूँजी से अतिरिक्त धन लगाता है तो वह इस अतिरिक्त धन पर ब्याज पाने का अधिकारी होता है। 


ix क्षतिपूर्ति कराने का अधिकार यदि किसी साझेदार को फर्म के उचित संचालनमें तथा फर्म को किसी अकस्मात संकट से बचाने के लिए कुछ भुगतान करना पड़ा हो अथवा उसने स्वीकार किया हो, तो फर्म उसकी क्षतिपूर्ति के लिए उत्तरदायी है। कुछ दायित्व


X. जानबूझकर की गई लापरवाही के लिए क्षतिपूर्ति का दायित्व - यदि कोई साझेदार जानबूझकर कोई लापरवाही करता है जिसके फलस्वरूप फर्म को कोई हानि उठानी पड़ती है, तो वह साझेदार ऐसी हानि की क्षतिपूर्ति करने के लिए बाध्य है।


xi. फर्म की संपत्ति निम्नलिखित संपत्ति को फर्म की संपत्ति समझा जाता है:


• ऐसी सभी संपत्ति जो व्यापार के प्रारंभ में प्राप्त की गई थी।


• फर्म के धन से प्राप्त की गई संपत्ति


• करोबार की ख्याति ।


इनके अतिरिक्त निम्नलिखित भी सामझौते के अभाव में लागू होने वाले नियम है:


xii. फर्म की संपत्ति का उपयोग।


xiii. निजी लाभ के प्रति हिसाब देना ।


xiv. प्रतिस्पर्धात्मक कारोबार से प्राप्त लाभ का हिसब देना ।


XV. फर्म की बनावट में परिवर्तन होन पर।


xvi. निश्चित अवधि के समाप्त होने पर भी कारोबार चालू रखने की दशा में।


xvii. अतिरिक्त कार्य करने की दशा में।


xviii. किसी साझेदार की मृत्यु हो जाने पर


xix. एक-दूसरे के प्रति न्यायोचित व्यवहार तथा वफादारी।