अनुसंधान डिजाइन प्रक्रिया , सूचना का मूल्य निर्दिष्ट करना - research design process, assigning value to information
अनुसंधान डिजाइन प्रक्रिया , सूचना का मूल्य निर्दिष्ट करना - research design process, assigning value to information
अनुसंधान प्ररचना प्रक्रिया का यह द्वितीय चरण है जिसमे आवश्यक सूचनाओं का मूल्य निर्धारित किया जाता है। अनुसंधानकर्ता को यहां उसे अधिकतम धनराशि को निर्धारित करना होता है, जो कि अनुसंधान परियोजना पर व्यय की जा सकती है। यदि अनुसंधानकर्ता ऐसा नहीं करता, तो पर्याप्त समय और धन अनुधान प्ररचना को उत्पन्न करने में समर्पित किया जा सकता है जो कि अनुमति योग्य नहीं होगा या ऐसी सूचनाएं उत्पन्न करेगा, जिसकी लागत उसके मूल्य से अधिक होगी। इसके लिए बजट नियमों का अनुसंधान प्रयोग किया जा सकता है या प्रत्याशित मूल्य विचारधारा को अपनाया जा सकता है।
3. समंक संकलन पद्धति का चयन अनुसंधान प्ररचना प्रक्रिया का यह तृतीय चरण है जिसमें समंक संकलन पद्धति का चयन किया जाता है विपणन
अनुसंधान में तीन आधारभूत समक संकलन विधिया हैं-
(i) गौण समक
(ii) सर्वे समक
(iii) प्रयोगात्मक समक
गौण समंक चालू समस्या के समाधान के अतिरिक्त उद्देश्यों से संकलित किये जाते हैं। ऐसे समको के निम्न दो स्रोत हो सकते हैं-
क. आंतरिक गौण समक- जोकि संगठन में ही उत्पन्न होते है जैसे विक्रयकर्ता प्रतिवेदन विक्रय बीजक एवं लेखाकन रिकॉर्डस्। ख. बाह्य गौण समक - जोकि सगठन के बाहर उत्पन्न किये जाते हैं, जैसे राजकीय प्रतिवेदन,
व्यापार पार्षद समक, सिण्डीकेट सेवाओं द्वारा संकलित समक सर्वे एवं प्रयोगात्मक समंक प्राथमिक समंक हैं जो समस्या को तुरंत समाधान करने से संबंधित होते हैं। सर्वेक्षण अनुसंधान उत्तरदाताओं से प्रत्यक्ष रूप से सूचनाओं का व्यवस्थित संकलन है। ऐसा निम्न तरीकों द्वारा किया जा सकता है-
(अ) टेलिफोन साक्षात्कार - उत्तरदाताओं से टेलिफोन के द्वारा सूचनाएं एकत्रित की जा सकती हैं।
(ब) डाक साक्षात्कार डाक अथवा ई-मेल के द्वारा उत्तरदाताओं से सूचनाएं एकत्रित की जा सकती है।
(स) व्यक्तिगत साक्षात्कार - ऐसी विधि में अनुसंधानकर्ता एवं उत्तरदाता आमने-सामने होते हैं और वह उसी समय साक्षात्कार द्वारा सूचनाएं एकत्रित करता है।
इसके लिए घर-घर साक्षात्कार लिया जा सकता है या केन्द्रिय स्थान साक्षात्कार को अपनाया जा सकता है। प्रयोगात्मक अनुसंधान में कुछ चल मूल्यों के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए नियन्त्रित स्थितियों में सावधानीपूर्वक छोटे स्तर पर प्रयोग किया जाता है।
इसके लिए निम्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है-
(अ) प्रयोगात्मक परीक्षण जिसमें स्वतंत्र चलों का एक कृत्रिम स्थिति में हस्तकौशल किया जाता है
(i) प्रयोगशाला परीक्षण जिसमें केवल एक स्वतन्त्र चल के प्रभाव पर विचार किया जाता है।
(ii) सांख्यिकीय प्ररचना जिसमें एक से अधिक स्वतन्त्र चलों के प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सकता है।
(ब) फील्ड परीक्षण जिसमें स्वतन्त्र चलों का प्राकृतिक स्थिति में हस्तकौशल किया जाता है। इसमें दो प्ररचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है।
(i) आधारभूत प्ररचना - जिसमें केवल एक स्वतन्त्र चल के प्रभाव पर विचार किया जाता है।
(ii) सांख्यिकीय प्ररचना जिसमे दो या अधिक स्वतन्त्र चलों के प्रभाव का मूल्यांकन किया जाता है।
एक अनुसंधानकर्ता अन्य के साथ इनमें से किसी एक को आवश्यक रूप से नहीं चुनता है। उदाहरण लिए एक नये उत्पाद प्रस्तुतिकरण के बारे में निर्णय हेतु समक सकलन ने अनुसंधानकर्ता-
(i) सूचनाओं के लिए उसी प्रकार के उत्पाद हेतु विगत में प्रस्तुत की गयी सूचनाओं का कंपनी रिकार्ड ने परीक्षण कर सकता है। (गौण समंक)
(ii) उत्पाद श्रेणी के बारे में चालू उपभोक्ता दृष्टिकोण का निश्चित करने हेतु संक्षिप्त साक्षात्कारों की एक श्रृंखला आयोजित कर सकता है। (सर्व समक)
(iii) एक नियन्त्रित स्टोर परीक्षण का आयोजन कर सकता है जिसमें विभिन्न पैकेज परचनाओं के प्रभाव को मापा जा सकता है (प्रयोगात्मक समक)
सामान्यत: व्यावसायिक संस्थाएं समक संकलन की उपरोक्त सभी पद्धतियों का प्रयोग करती है।
टल एवं हॉकिन्स का मत है कि समक चयन पद्धति का चयन अनुसंधान प्ररचना के आधारभूत पहलुओं में से एक है। यद्यपि इस प्ररचना प्रक्रिया में सृजनात्मक तथा निर्णय महत्त्वपूर्ण भूमिका निमाते हैं,
फिर भी निर्णय मुख्यत सूचना आवश्यकताओं तथा उसके मूल्य द्वारा होता है। अधिकाश अनुसंधानकर्ताओं ने सूचना आवश्यकता के प्रकार पर आधारित निम्न तीन सामान्य श्रेणियों पर विचार करना उपयोगी पाया है। ये तीन श्रेणियां है-
(i) अन्वेषणात्मक
(ii) वर्णनात्मक
(iii) आकस्मिक
(i) अन्वेषणात्मक अनुसंधान यह अनुसंधान समस्या की सामान्य पद्धति और उससे संबंधित चलों को खोजने से संबंधित है। अन्वेषणात्मक अनुसंधान में अत्याधिक मात्रा में लोचशीलता पायी जाती है।
(ii) वर्णनात्मक अनुसंधान वर्णनात्मक अनुसंधान समस्या प्रतिरुप में चलों के शुद्ध वर्णन पर प्रकाश डालती है। उपभोक्ता रुपरेखा, बाजार सम्भाव्यता अध्ययन, उत्पाद प्रयोग अध्ययन, दृष्टिकोण या प्रकृति सर्वे विक्रय विश्लेषण, माध्यम अनुसंधान और कीमत सर्वे वर्णनात्मक अनुसंधान के उदाहरण हैं।
(iii) आकस्मिक अनुसंधान आकस्मिक अनुसंधान अध्ययन में समस्या प्रतिरुप में दो या अधिक चलों के मध्य क्रियात्मक संबंधों की प्रकृति को निर्दिष्ट करने का प्रयास किया जाता है जिसमें विज्ञापन के कारण विक्रय या मनोवृत्ति (प्रवृत्ति) होती है। इस अनुसंधान का मूल आधार यह है कि कुल चलों का अन्य चलों के मूल्य पर प्रभाव पड़ता है।
सार रूप में समक संकलन पद्धति सूचना आवश्यकता के प्रकार द्वारा प्रभावित होती है। साथ ही सूचना का मूल्य भी प्ररचना स्वतन्त्रता को सीमित करता है।
4. माप तकनीकों का चयन करना यह अनुसंधान प्ररचना का चतुर्थ चरण है जिसमे समक पद्धति निर्धारित करने के बाद माप तकनीकों या उपकरण का चयन किया जाता है विपणन अनुसंधान में निम्न चार आधारभूत माप तकनीकों का प्रयोग किया जाता है
(i) प्रश्नावली
(ii) दृष्टिकोण पैमाना
(iii) अवलोकन तथा
(iv) गहन साक्षात्कार एवं प्रोजेक्टिव तकनीक
प्रश्नावली उत्तरदाता से प्रत्यक्ष रूप में सूचनाएं पूछने का एक औपचारिक उपकरण है जिसमें उसके व्यवहार, विशेषताएं, ज्ञान स्तर प्रवृत्ति आदि बातें पूछी जाती हैं।
मनोवृत्ति पैमाना एक उद्देश्य से संबंधित विश्वासों और भावनाओं के स्वप्रतिवेदना की छिपी बातों को निकालने का एक औपचारिक उपकरण है।
मनोवृत्ति पैमाने हेतु निम्न विधियों का प्रयोग किया जाता है-
(i) तीव्रता अंकन पैमाना जिसके द्वारा व्यक्तियों के विचारों, मनोभावों आदि की तीव्रता का माप किया जाता है।
(ii) संयुक्त पैमाना जिसमें दो उत्पादों के बारे में एक साथ पूछा जाता है कि उपभोक्ता इनमें से किसको अधिक पसंद करता है।
(iii) बहु-आयामी पैमाना
(iv) संयुक्त विश्लेषण एक उत्पाद के विभिन्न गुणों का एक व्यक्तिगत उल्लेख में मुल्य ज्ञात करने हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। अवलोकन उपभोक्ता के व्यवहार का प्रत्यक्ष परीक्षण है या व्यवहारों के परिणामों का प्रत्यक्ष परीक्षण है। टल व डॉकिन्स का मत है कि माप तकनीक का चयन मुख्यत सूचना आवश्यताओं और सूचना के मूल्य द्वारा प्रभावित होता है।
5. निदर्श का चयन करना यह अनुसंधान प्ररचना प्रक्रिया का पंचम चरण है। प्रायः अधिकांश विपणन अध्ययनों में समय के स्थान पर समस्या से संबंधित कुल जनसंख्या के एक निदर्श या उप-समूह को सम्मिलित किया जाता है। निदर्शन प्रक्रिया अनुसंधान प्ररचना का अन्य अवस्थाओं या चरणों क साथ अन्तक्रिया करता है। उदाहरण के लिए अधिकाश साख्यिकीय तकनीकों में सम्भाव्यता या प्राथमिकता निदर्शन तकनीक का प्रयोग किया जाता है। निदर्शन में प्राथमिक रूप से निम्न बातों पर विचार करना होता है -
(1) जनसंख्या जोकि आवश्यक सूचना उपलब्ध कर सकते हैं।
(ii) निदर्श फेंग- जनसंख्या सदस्यों की एक सूची का विकास
(iii) निदर्शन इकाई निदर्श लेने के आधार को निर्धारित करना
(iv) निदर्शन पद्धति यह निश्चित करन कि निदर्श का चयन कैसे किया जायेगा।
• प्रायिकता
• अप्रायिकता
(v) निदर्श आकार यह निश्चित करना कि निदर्श में कितने व्यक्ति सम्मिलित किये जाने है।
(vi) निदर्श योजना- निदर्श सदस्यों के चयन एवं संपर्क हेतु पद्धति का विकास करना।
6. विश्लेषण पद्धतियों का चयन करना समक विश्लेषण के बाद ही उपयोगी होते हैं। समक विश्लेषण में लिपिबद्ध या अंकित अवलोकन श्रृंखलाओं को वर्णनात्मक विवरणों में परिवर्तित किया जाता है। विश्लेषण का प्रकार निदर्शन प्रक्रिया, माप यंत्र तथा समक संकलन की पद्धति की प्रकृति पर निर्भर करता है।
7 समय एवं वित्तिय आवश्यकताओं का अनुमान करना एक बार अनुसंधान प्ररचना खोज कर ली जाती है तो अनुसंधानकर्ता को चाहिए कि वह संसाधन आवश्यकताओं का अनुमान करे इन आवश्यकताओं को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है-
(a) समय तथा
(b) वित
समय उस समय अवधि से संबंधित है जो परियोजना के पूर्ण होने में आवश्यक रूप से लगेगा वित्तीय आवश्यकता जन शक्ति कम्प्यूटर समय तथा सामग्री आवश्यकताओं का मौद्रिक प्रतिनिधित्व है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि समय तथा वित्त आवश्यकताएं एक दूसरे पर निर्भर नहीं हैं। समय और वित्तीय आवश्यकताओं के अनुमान के लिए पर्ट तकनीक का प्रयोग किया जा सकता है।
8 अनुसंधान प्रस्ताव तैयार करना यह अनुसंधान प्ररचना प्रक्रिया का अंतिम चरण है जो अनुसंधानकर्ता को अनुसंधान परियोजना के मार्गदर्शन, संचालन एवं नियन्त्रण हेतु एक रूपरेखा उपलब्ध कराता है। रूपरेखा को अनुसंधान प्रस्ताव के रूप में लिखा जाता है। अनुसंधान प्रस्ताव यह निश्चित करने में मदद करता है कि निर्णय लेने वाला तथा अनुसंधानकर्ता आधारभूत संबंध समस्या, सूचना आवश्यकता दृष्टिकोण पर अभी भी सहमत है।
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