अनुसंधान की प्रक्रिया - research process

अनुसंधान की प्रक्रिया - research process


इन सभी चरणों को एक-एक करके समझते हैं - 


1. स्थिति विश्लेषण


ब्राऊन के अनुसार कोई भी अनुसंधानकर्ता जब अनुसंधान की कार्यवाही प्रारम्भ करता है तो सर्वप्रथम उसकी स्थिति के संबंध में जानकारी प्राप्त की जाती है, जिसका वह अनुसंधान करने जा रहा है। अनुसंधानकर्ता को कंपनी के वातावरण के संबंध में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। स्थिति विश्लेषण के संबध में अनुसंधानकर्ता निम्न बातों को जान सकता है-


(i) कम्पनी के उत्पादन के संबंध में जानकारी।


(ii) वितरण के सातों के संबंध में जानकारी।


(iii) विज्ञापन एवं विक्रय संवर्द्धन के संबंध में जानकारी।


(iv) कंपनी के विक्रय संगठन के संबंध में जानकारी।


(v) कंपनी की मूल्य नीति आदि के संबंध में जानकारी।


2. अनौपचारिक अनुसंधान


स्थिति विश्लेषण के बाद अनुसंधानकर्ता अनौपचारिक अनुसंधान करता है. अर्थात यह उपभोक्ताओं, पूर्तिकर्ताओं, फुटकर व्यापारियों, थोक व्यापारियों तथा संस्था के प्रमुख अधिकारियों से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करता है। इन व्यक्तियों से सम्पर्क स्थापित करके अनुसंधानकर्ता समस्या के मूल कारण का पता लगा सकता है।

अनुसंधानकर्ता को इस प्रकार के साक्षात्कार की एक संक्षिप्त रिपोर्ट लिख लेनी चाहिए, ताकि नविष्य में निर्णय लेने में सहायता प्राप्त की जा सके।


3. औपचारिक या अंतिम अनुसंधान


ब्राऊन के अनुसार, औपचारिक या अंतिम अनुसंधान सम्पूर्ण विपणन अनुसंधान का अंतिम हृदय है. अर्थात विपणन अनुसंधान के चरणों में यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इसमें निम्न कार्य किये जाते हैं


(i) अन्वेषण के उद्देश्यों का निर्धारण विपणन अनुसंधान की तकनीक में सर्वप्रथम स्थिति विश्लेषण किया जाता है, तत्पश्चात समस्या का अनौपचारिक अन्वेषण किया जाता है। इन दोनों की सहायता से समस्या के अनुमानित समाधानों का खोज की जाती है अर्थात अनुसंधान क्यों किया जा रहा है. इस बात का पता लग जाता है।


(ii) प्रदत्त सामग्री के प्रकार एवं स्रोतों का निर्धारण


प्रदत्त सामग्री के प्रकार- प्रदत्त सामग्री दो प्रकार की हो सकती है-


प्राथमिक तथा गौण - जिन समकों का मूल समस्या से प्रत्यक्ष संबंध होता है वे प्राथमिक समंक कहलाते है तथा जो प्रमुख समंकों में सहायक होते हैं, उन्हें गौण समक कहा जाता है। ब्राऊन के अनुसार, इस प्रकार के समक चार प्रकार के हो सकते है-


(क) सर्वे सर्व तीन प्रकार के हो सकते हैं। प्रथम तथ्य संबंधी सर्वे जैसे पानी का आर ओ बेचने वाले यह जानना चाहते है कि किसी क्षेत्र में कितने नए चर हैं पिछले साल कितने थे आदि। द्वितीय राय संबंधी सर्व जैसे उपभोक्ताओं के एक समूह विशेष के पास चार विज्ञापन प्रतियां भेजी जाती है. तथा उन प्रतियों के संबंध में उनकी राय मांगी जाती है। यह राय संबंधी सर्वे होता है। तृतिय इच्छा सबंधी सर्वे,

जैसे क्लोज अप टूथपेस्टन का प्रयोग दांतो को चमकाने तथा सांस के लिए किया जाता है अर्थात एक दंत मंजन का प्रयोग करने के उद्देश्य अलग-अलग हो सकते है अतः उनके संबंध में समक एकत्रित किये जाते है कि उपभोक्ता किस इच्छा से किसी वस्तु विशेष का प्रयोग करता है। 


(ख) निरीक्षण सर्वे निरीक्षण सवे में स्टोर अंकेक्षण किया जाता है अर्थात अनुसंधानकर्ता स्टोर में जाकर बैठ जाता है, और उपभोक्ताओं की प्रक्रियाओं को देखता रहता है तथा संक्षेप में तत्काल ही उसे लिखता रहता है।


(ग) प्रयोगात्मक सर्वे इसमें विपणन के परिणाम की जांच की जाती है जैस विज्ञापन से बिक्री में ज्यादा वृद्धि होगी या मुफ्त नमूनों का वितरण करके। इसके लिए दो समान क्षेत्र हो लिए जाते है।

एक में विज्ञापन तथा दूसरे में मुफ्त नमूनों का वितरण किया जाता है फिर देखा जाता है कि किस क्षेत्र में बिक्री अधिक हुई है। 


(घ) मिश्रित सर्वे इसमें उपरोक्त विधियों में से दो या अधिक को एक साथ मिलाकर अनुसंधान कार्य किया जाता है।


(iii) प्रदत्त सामग्री का स्रोत प्रदत्त सामग्री के स्रोतों को दो भागो में बाटा जा सकता है


(अ) प्रमुख स्रोत प्रमुख स्रोत ये हैं जिनका अनुसंधान से प्रत्यक्ष संबंध होता है, जैसे- उपभोक्ता, वितरक, एजेंट प्रतिस्पर्धा तथा प्रबंधक अन्य शब्दों में प्रमुख समंकों का पता बाजार से या कंपनी के आंतरिक अभिलेखों से लगाया जा सकता है। प्राथमिक समक प्राप्त करने के लिए अनुसंधानकर्ता स्वयं जाकर जानकारी प्राप्त कर सकता है या डाक द्वारा प्रश्नावलिया भरवा सकता है या टेलीफोन से पूछताछ कर सकता है।


(ब) गौणा स्रोत ये प्रमुख स्रोतों में सहायक होते है, जैसे पत्रिकाएं, जर्नल्स, समाचार-पत्र, कंपनी संगठन, चैम्बर ऑफ कामर्स आदि। इसके अतिरिक्त सरकारी प्रकाशन भी समय-समय पर होते हैं। इन सब साधनों से प्राप्त की गयी सूचनाएं सहायक / गौण स्रोत कहलाते हैं । 


(iv) समक एकत्रित करने के लिए फार्म तैयार करना समक एकत्रित करने के लिए जो फार्म बनाया जाता है वह अलग-अलग तरीकों से समंक एकत्रित करने हेतु भिन्न-भिन्न होता है। फॉर्म में प्रश्न छोटे-छोटे तथा समझने योग्य होने चाहिए।


(v) निदर्शन का नियोजन निदर्शन से आशय यह है कि फील्ड वर्क के दौरान कितने प्रकार के अन्वेषण किये जायेंगे, इस बात का नियोजन करना।


निदर्शन का चुनाव करते समय तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए-


(अ) निदर्शन पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए। उदाहरणार्थ, औषधी बनाने वाले यह जानना चाहते है कि डॉक्टर उनकी औषधी विशेष किसको बताते हैं या नहीं। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में लोगों से संपर्क करना चाहिए व उनसे प्रश्न पूछने चाहिए।


(ब) निदर्शन प्रतिनिधि होना चाहिए अर्थात समक उसी क्षेत्र से लेने चाहिए जिस क्षेत्र के डॉक्टर के बारे में राय जानना चाहते हैं। 


(स) निदर्शन के चुनाव में तीसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि ज्यादा महंगा नहीं होना चाहिए जैसे औषधी की बिक्री के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए दस हजार लोगों से संपर्क स्थापित किया जाता है, तो ऐसी स्थिति में इसकी लागत इतनी अधिक हो सकती है जितनी कि वस्तु की बिक्री भी न हो सकती हो।


(vi) जांच के लिए अनुसंधान उपरोक्त सब बातें जांचने के बाद जो कुछ सामग्री हमारे पास है, उसमें से कुछ सामग्री लेकर उसकी जांच कर लेनी चाहिए। इससे यह फायदा होता है कि यदि प्रश्नावली में कुछ प्रश्न लिखने से रह जाते हैं या उनमें सुधार की आवश्यकता होती है, तो सुधार या संशोधन आसानी से किया जा सकता है। साथ ही जांच से सर्वे पर होने वाले व्यय तथा समय का भी पता लग जाता है।


4. विपणन समको का संकलन


समक तीन प्रकार से एकत्रित किये जा सकते हैं-


(अ) सर्वेक्षण समक ये समक दो प्रकार से एकत्रित किये जा सकते है। प्रथम व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करके द्वितीय प्रश्न पूछकर समक एकत्रित किये जाते हैं। इसके अलावा पत्र व्यवहार द्वारा भी समक एकत्रित किये जा सकते हैं। 


(ब) निरीक्षण समक इन समकों को एकत्रित करने के लिए दुकान या स्टोर में उपस्थिति आवश्यक है। इसमें अनुसंधानकर्ता किसी ऐसे जाता है जहां पर ग्राहक उसको न देख सके तथा वह ग्राहकों की प्रवृत्तियों का निरीक्षण कर सके।


(स) प्रयोगात्मक समक इसमें बाजार के परिणामों की जांच प्रयोगों द्वारा की जाती है।


5 सरलीकरण एवं विश्लेषण


समक एकत्रित करने के बाद उनकी सारणिया बनायी जाती है तथा उनका विश्लेषण किया जाता है। सरलीकरण एवं विश्लेषण में निम्न चार कार्य करने (अ) सम्पादन इसका आशय यह है कि प्रश्नावली में उत्तर गलत है तो उनको विश्लेषण में शामिल नहीं करना चाहिए। उदाहराणार्थ, प्रश्नावली के होते हैं


प्रश्नों में प्रथम दो प्रश्न निम्न प्रकार से पूछे गये-


(i) आपने इस माह इस वस्तु का कितना उत्पादन किया?


(ii) कुल उत्पादन में से कितना माल बेच दिया?


यदि प्रश्नावली भरने वाला उपरोक्त प्रश्नों में से क्रमश: 100 व 105 लिख देता है तो वह सूचना गलत होगी और इसको विश्वोपण में शामिल नहीं किया जायेगा।


(ब) समंकों की जांच समक एकत्रित करने के बाद उनकी प्रसाप त्रुटि निकाल लेनी चाहिए। यदि गलतियां अधिक है, तो उसका उत्तर सही नही होगा अतः प्रश्नावलिया छोड़ देनी चाहिए।


(स) साख्यिकीय निष्कर्ष यदि आवश्यक हो तो सूचनाओं या समंको का माध्य या सह-संबंध शांत कर लेना चाहिए।


(द) विश्लेषण उपर्युक्त सभी कार्य कर होने के बाद समक तथा सूचनाओं का विश्लेषण किया जाता है।


6. अर्थ- निर्वाचन


विश्लेषण का कार्य पूरा हो जाने के बाद उसका निर्वाचन ( व्याख्या) किया जाता है। अधिकांश निर्वाचन आगमन तर्कों द्वारा किया जाता है। उदाहरणर्थ लिबर्टी के जूते दिल्ली उत्तरप्रदेश तथा हरियाणा में ज्यादा प्रचलित है तथा महाराष्ट्र में इनकी माग बहुत कम है। अतः यह ज्ञात करना कि महाराष्ट्र में लिबर्टी के जूतों का प्रचलन कम क्यों हैं, अर्थ-निर्वाचन कहलाता है।


7 प्रतिवेदन तैयार करना


समकों के विश्लेषण एवं निर्वचन के बाद अनुसंधानकर्ता द्वारा प्रतिवेदन तैयार किया जाता है। प्रतिवेदन दो प्रकार का होता है, प्रथम, तकनीकी प्रतिवेदन यह प्रतिवेदन उन लोगों के लिए होता है जो अनुसंधान कला को जानते है। द्वितीय सामान्य प्रतिवेदन यह प्रतिवेदन उन व्यक्तियों द्वारा तैयार किया जाता है, जो अनुसंधान कला को नही जानते है प्रतिवेदन में शीर्षक अनुसंधान का क्षेत्र, निष्कपों का संक्षिप्त विवरण, अध्ययन विधि सीमाए सुझाव तथा संदर्भ सूची का उल्लेख होता है।


8. अनुवर्तन


जब प्रतिवेदन तैयार हो जाता है तो उसको लागू करने का काम किया जाता है। यह विपणन अनुसंधान प्रक्रिया का अंतिम एवं महत्वपूर्ण चरण है। यद्यपि प्रतिवेदन अनुसंधानकर्ता द्वारा तैयार किया जाता है,

परन्तु उसे लागू करने का काम संचालक मण्डल को करना होता है। ब्राऊन के मतानुसार अनुसंधानकर्ता का महत्वपूर्ण कार्य यह होता है कि कंपनी के संचालक मण्डल को प्रतिवेदन के निष्कर्ष लागू करने के लिए तैयार करें। इस संबंध में ब्राऊन का यह सुझाव है कि जहां तक हो सके अनुसंधानकर्ता को उच्चाधिकारियों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए ताकि प्रतिवेदन को लागू किया जा सके।


ब्राऊन का यह भी सुझाय है कि प्रतिवेदन की सिफारिशों को पहले छोटे क्षेत्र में लागू करके देख लेना चाहिए। प्रतिवेदन के आधार पर सम्पूर्ण क्षेत्र या पूरे देश में एक साथ कार्य करने से कभी कभी असफलता का मुंह भी देखना पड़ता है।