विक्रय एवं बिक्री का ठहराव - sale and arrangement of sale

विक्रय एवं बिक्री का ठहराव - sale and arrangement of sale


वस्तु विक्रय अधिनियम, 1930 की आधारभूत परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं :


क्रेता : क्रेता से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो माल खरीदता है अथवा खरीदने के लिए सहमत होता है।

(धारा 1 (1))


विक्रेता :- विक्रेता से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो माल बेचता है अथवा बेचने के लिए सहमत होता है।

(धारा 2 (13))


सुपुर्दगी :- सुपुर्दगी से तात्पर्य उस व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को स्वेच्छापूर्वक माल के अधिकार का हस्तान्तरण करने से है।

(धारा 2 (2))


सुपुर्दगी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।


1. वास्तविक सुपुर्दगी


2. रचनात्मक सुपुर्दगी


1. वास्तविक सुपुर्दगी :- जब विक्रेता क्रेता की वास्तविक रूप से माल सुपूर्द कर देता है तो यह वास्तविक सुपुर्दगी कहलाता है। 


2. रचनात्मक सुपूर्दगी :- जब विक्रेता क्रेता की वास्तविक रूप से माल सुपुर्द न कर,

कोई अधिकार पत्र क्रेता को दे देता है तो ऐसी सुपुर्दगी को रचनात्मक सुपुर्दगी कहते हैं। 


सुपुर्दगी योग्य स्थिति :- माल उस समय सुपुर्दगी योग्य स्थिति में कहा जाता है जब कि वह ऐसी स्थिति में हो कि अनुबंध के अधीन क्रेता उसकी सुपुर्दगी लेने के लिए बाध्य हो ।

(धारा 2 (3))


माल :- माल से आशय प्रत्येक प्रकार की चल सम्पत्ति से है जैसे स्कंध, अंग, खड़ी फसले, घास एवं अन्य वस्तुएँ जो भूमि में लगी हो या भूमि के रूप में हो या जिन्हें विक्रय से पहले या विक्रय अनुबंध के अंतर्गत भूमि से अलग कर अनुबंध किया गया हो।