विक्रय पूर्वानुमान की विधियां - sales forecasting methods

विक्रय पूर्वानुमान की विधियां - sales forecasting methods


अनुसंधानकर्ता मुख्यत निम्न आधारों पर विक्रय पूर्वानमान लगाता है


(i) लोग क्या कहते हैं?


(ii) लोग क्या करते है?


(iii) लोगों ने क्या किया है?


प्रथम स्थिति में क्रेताओं या उनके निकटतम व्यक्तियों की राय के आधार पर पूर्वानुमान लगाया जाता है जबकि द्वितीय स्थिति में बाजार परीक्षण का सहारा लिया है। तृतीय स्थिति में गणितीय एवं सांख्यिकीय आधारों पर पूर्वानुमान लगाया जाता है।


आर. एस. डावर ने विक्रय पूर्वानमान की निम्न विधियां बतायी है


1 अधिशासी राय पद्धति


2 विक्रय बल संयुक्त राय पद्धति


3. प्रयोगकर्ता अनुमान पद्धति


4 साख्यिकाय पद्धति


लक, टेलर, वाल्स तथा रुबिन के अनुसार, विक्रय पूर्वानमान की निम्न दो विधिया है


1. राय पद्धतियां


• अधिशासी राय की जूरी


• ग्रॉस रुट दृष्टिकोण


• क्रयण इरादों का सर्वे


2. सांख्यिकाय पद्धतिया


• प्रवृत्ति एवं चक्र विश्लेषण


• सह संबंध पद्धतियां


• अदाय प्रदाय विश्लेषण:


सार रूप में विक्रय पूर्वानुमान की प्रमुख विधियां निम्नलिखित है


(i) कार्यवाहक समीक्षा


(ii) सेविवर्ग सम्मिश्रण


(iii) प्रयोक्ताओं की पूर्याशा


(iv) बाजार परीक्षण विधि


(v) विशेषज्ञों की सम्मति


(vi) साख्यिकीय एवं परिमाणात्मक रीति


(i) कार्यवाहक समीक्षा


इस विधि में शीर्ष कार्यवाहकों की सम्मतियों और विचारों को एकत्र करके उनका औसत निकाला जाता है या किसी अन्य प्रकार मुल्यांकित किया जाता है एक कंपनी के विभिन्न विभागों से संबंधित कार्यवाहकों का सम्मतियां अनुभवों का व्यापक भंडार होते हैं- उदाहरण के लिए, एक संस्था में चार प्रमुख अधिकारी है (उत्पाद, वित्त, विपणन अनुसंधान एवं विक्रय पूर्वानुमान) तथा चारों के अनुमान अगले 6 माह की बिक्री के संबंध में निम्न प्रकार हैं (लाख रुपयों में)


उत्पादन प्रबंधक     5.00


वित्त प्रबंधक          3.00


विपणन अनुसंधान   8.00


विक्रय प्रबंधक        4.50


योग                     20.50


औसत 2050 / 4 या 5 12 लाख रुपये (पूर्वानमान)


विक्रय पूर्वानुमान की इस विधि के निम्न लाभ है 1. पूर्वानुमान शीघ्रता


2. विशेषज्ञों के दृष्टिकोण का लाभ उठाया जा सकता है।


3. पर्याप्त समयको के अभाव में पूर्वानुमान की यही विधि उचित होती है।


4. पूर्वानुमाना हेतु साख्यिकीय जुटाने की आवश्यकता नही होती है


इस विधि के निम्न दोष है


1. पूर्वानमान व्यक्तिगत राय पर आधारित होता है, अतः पूर्णत: सही नहीं होता


2 अधिकारियों का महत्वपूर्ण समय नष्ट होता है


3. पूर्वानमान के लिए किसी विशेष अधिशासी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है


4. वस्तु समयान्तर एवं बाजार के आधार पर विज्ञापन करने में कठिनाई होती है।


(ii) विक्रय बल या सेविवर्ग सम्मिश्रण इस विधि में विक्रय कर्मचारियों के विचार मालूम किये जाते है इसके कई रुपान्तर संभव है

भावी विक्रय की - पूर्वाशाओं के बारे मे विक्रय कर्मचारियों के मिले-जुले विचार व्यक्तिगत विक्रयकर्ता द्वारा प्रस्तुत किये गये भावी विक्रय के अनुभवों की क्रमश कार्यवाही स्तरों पर सावधानी से जांच करके ज्ञात किये जा सकते हैं। इसके लिए एक अन्य विधि यह भी हो सकती है कि विक्रय पूर्वानुमान तैयार करने में केवल कंपनी के कार्यवाहकों के विशिष्ट ज्ञान पर ही निर्भर रहा जाये। संक्षेप में इसमें पूर्वानुमान हेतु विक्रय संगठन के विभिन्न अंगों की राय को आधार माना जाता है।


लक टेलर, वाल्स तथा रुबिन ने इसे 'ग्रास रुट एप्रोच' की संज्ञा दी है जिसमें सूचनाएं उन व्यक्तियों से ली जाती हैं जिन्हें वास्तव में विक्रय परिणाम देना है।


इस विधि के प्रमुख लाभ निम्न प्रकार है-


1. बाजार के निकट संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों के विशिष्ट ज्ञान का प्रयोग किया जाता है


2 निदर्श की विशालता के कारण पूर्वानुमान अधिक स्थाई होता है.


3. विक्रय कोटा विकसित करने में यह विधि शक्ति को अधिक आत्मविश्वास उपलब्ध कराती है 4. पूर्वानुमान की जिम्मेवारी उन लोगों को सौंपी जाती है जो परिणाम प्राप्त करने से संबंधित है।


इस विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित है. -


1. विक्रयकर्ता को पूर्वानुमान लगाने वालों की सज्ञा नहीं दी जा सकती है क्योंकि वे अत्याधिक निराशावादी या आशावादी हो सकते है


2. दीर्घकालीन पूर्वानुमान नहीं लगाये जा सकते है


3. विक्रेताओं के विक्रय समय में कमी होती है


4. यह विधि अधिक समय लेने वाली है।


(iii) प्रयोक्ताओं की पूर्वाशा


यह विधि कुछ ऐसे उद्योगों में कार्यरत निर्माताओं के लिए, जहां पूर्वानुमान के आधार के लिए प्रयोग में आने वाले आंकड़ों का अभाव होता है, बहुत उपयोगी होती हैं। इसमें उत्पाद के प्रयोगताओं द्वारा की जाने वाली मात्राओं के पूर्वानुमान किये जाते हैं। तत्पश्चात इन प्रत्युत्तरों को मिलाकर उत्पाद के लिए कुछ मांग का अनुमान लगाया जाता है। इससे फिर उस मांग का अनुमान तैयार किया जाता है जोकि पूर्वानुमान लगाने वाली कंपनी पूरा कर सकती है।


इस विधि के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है


1. प्रयोगकताओं की प्रमुख सूचनाओं पर आधारित होती हैं.


2 अन्य विधियो के अनुपयुक्त होने की दशा में भी यही पूर्वानुमान में उपयुक्त होती है जैसे नया औद्योगिकी उत्पाद जहा भूतकाल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता है।


3. गलत सूचना प्रप्ति की संभावना बहुत कम रहती है इस विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित है


1 असीमित उपभोक्ताओं की दशा में इसका प्रयोग संभव नही होता।


2 यह प्रत्याशाओं पर आधारित है जो परिवर्तित भी हो सकती है।


3. दीर्घकालीन विक्रय पूर्वानुमान के लिए अनुपयुक्त है।


(iv) बाजार परीक्षण विधि


इस विधि का प्रयोग उन दशाओं में किया जाता है जहां क्रेता अपने क्रय मात्रा के संबंध को सुनिश्चित योजना नहीं बनाते या अपने इरादों को कार्यान्वित करने में अनियमित होते हैं,

या स्वयं विशेषज्ञ अच्छे अनुसंधानकर्ता नहीं होते हैं। ऐसी दशा में क्रेताओं के समावित व्यवहार की एक अधिक प्रत्यक्ष बाजार परीक्षा होना अवांछनीय होते है ऐसी परीक्षा नये उत्पाद के विक्रय या एक नयी वितरण वाहिक या क्षेत्र में किसी स्थापित उत्पाद के संभावित विक्रय का पूर्वानुमान लगाने के लिए आवश्यक होता है।


(v) विशेषज्ञों की सम्मति केताओं, कंपनी के विक्रेताओं व कार्यवाहकों के अतिरिक्त अन्य जानकार लोगों (जैसे- वितरको या बाहा विशेषज्ञों) की सम्मति का प्रयोग पूर्वानुमान लगाने में किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, ऑटोमोबाइल कंपनिया विक्रय संबंधी अनुमान सीधे अपने वितरीको से मागती है। 


(vi) साख्यिकीय एवं परिणात्मक ढंग व्यक्तिगत सूचनाओं पर आधारित विधियों के स्थान पर सांख्यिकीय आकड़ो पर आधारित विधियों का प्रयोग शुद्धता की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण होता है

सांख्यिकीय विश्लेषण की विधियों को निम्न दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।


(अ) प्रवृत्ति प्रक्षेपण विधि (ब) आर्थिक संकेतक विधि


(अ) प्रवृत्ति प्रक्षेपण विधि - सामान्यतः इस विधि का प्रयोग ऐसे उत्पादों के पूर्वानुमान लगाने के लिए किया जाता है जिनके भूतकालीन आकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं। इस विधि में उत्पाद की मांग तथा समय सारणी का विश्लेषण किया जा सकता है। अर्थात सर्वप्रथम मांग तथा समय की एक काल श्रेणी प्राप्त कर ली जाती है और पुन इस काल श्रेणी का न्यूनतम वर्ग विधि के आधार पर आगामी वर्षों के लिए विक्रय के उपनति मूल्य ज्ञात कर लिया जाता है। इन प्रवृत्ति मूल्यों को ग्राफ पर खींच कर विक्रय का वृद्धि या कमी की प्रवृत्ति शात कर ली जाती है।


(ब) आर्थिक संकेतन विधि साधारणतया कुछ उपभोक्ता वस्तुओं की माग आर्थिक कारणों पर निर्भर करती है, जैसे-पेट्रोल की मांग परिवहनों की पंजीकरण संख्या पर रेडियो-पखो आदि की मांग जनसंख्या वृद्धि पर आदि। यद्यपि आज के परिवर्तनशील युग में इन आर्थिक संकेतों का ठीक प्रकार से अनुमान लगाना कि कौन सा सकेतक किस सीमा तक प्रभावित करता है. कठिन है परन्तु साधारण परिस्थितियों में भूतकाल गणना के स्थान पर इन सकता पर आधारित अनुमान उचित होते हैं किसी उत्पाद की मांग को किसी आर्थिक संकेतक के साथ संबंधित करके न्यूमनतम वर्ग विधि के आधार पर प्रतिगमन समीकरण की सहायता से विक्रय पूर्वानुमान लगाये जा सकते हैं।