प्रतिदर्श तथा गैर प्रतिदर्श विभ्रम - Sample and non-sampling confusion
प्रतिदर्श तथा गैर प्रतिदर्श विभ्रम - Sample and non-sampling confusion
प्रतिदर्श सिद्धान्त का उद्देश्य निदर्श प्रतिदर्शन के आधार पर समय के प्राचल के संबंध में अनुमान लगाना होता है। न्यादर्श के विभिन्न साख्यिकीय माप तथा माध्य प्रमाण विचलन सह संबंध आदि प्रतिदर्शज कहलाते है जबकि समग्र के यही साख्यिकी माप प्राचल कहलाते है। प्रतिदर्श सिद्धान्त में निदर्श का चुनाव इस विश्वास पर होता है कि निदर्श, समग्र का प्रतिनिधित्व करता है और निदर्श के विभिन्न सांख्यिकी मापसे समग्र के विभिन्न मापों का अनुमान लगाया जा सकता है। अत प्राचल के अनुमान के लिए निदर्श विधि का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से किया जाना चाहिए, लेकिन कोई भी निदर्श समग्र का कितना ही प्रतिनिधित्व क्यों न करता हो, फिर भी निदर्श के विभिन्न सांख्यिकी मापों तथा समग्र के सांख्यिकी मायों में असमानता होना स्वाभाविक है। इस प्रकार निदर्श व समग्र के विभिन्न साख्यिकी मापों में पाये जाने वाले अंतर को दो भागों में बाटा जा सकता है-
(1) प्रतिदर्श विभ्रम एवं
(2) गैर- प्रतिदर्श विभ्रम ।
(i) प्रतिदर्श विभ्रम निदर्श व समग्र के साख्यिकी मापों में निदर्शन प्रक्रिया के कारण जो अंतर उत्पन्न होता है, उसे निदर्शन विभ्रम कहते हैं ये विभ्रम दैव कारक या अवसर कारक के कारण उत्पन्न होते हैं जिसके कारण समग्र वे निदर्श के मापों असमानता पायी जाती है अतः देव कारकों या अवसर कारकों के परिणामस्वरुप प्राचल व प्रतिदर्श में उत्पन्न हुए अंतर को निदर्शन विभ्रन कहते है शत प्रतिशत अध्ययन के स्थान पर समग्र के एक नाग के अध्ययन के कारण निदर्शन विनम्र उत्पन्न होता है।
सगणना विधि में निदर्शन विभ्रम नही हो सकता। निदर्शन विभ्रम जितना कम होगा, निदर्श समग्र के उतना ही निकट होगा।
निदर्शन विभ्रम की गणना विभिन्न सार्थकता स्तरों के अनुसार प्रमाप विभ्रम निदर्शन विभ्रम की सहायता से की जाती है और यह निश्चित सीमाओं के भीतर होता है। निदर्शन विभ्रम का ज्ञान अनुसंधानकर्ता को श्रेष्ठ निदर्शन तकनीक के चयन में सक्षम बनाता है। इसकी सहायता से समय के साख्यिकीय मापों तथा उसी समय में से लिए गये अन्य निदशों के मापों के अनुमान लगाये जा सकते है।
(ii) गैर- प्रतिदर्श विश्वम गैर निदर्शन विभ्रम व्यक्तिगत पक्षपात, त्रुटिपूर्ण आगणन किया, गलत प्रश्नावली एवं त्रुटिपूर्ण सर्वेक्षण रिपोर्ट के कारण उत्पन्न होता है।
अतः प्राचल व प्रतिदर्शज में अंतर देव कारक के अतिरिक्त यदि किसी अन्य कारण से उत्पन्न होता है तो यह गैर-निदर्शन विभ्रम कहलाता है। अन्य शब्दों में, गैर-निदर्शन विभ्रम मानक कारक के कारण उत्पन्न होता है तथा सभी प्रकार के अनुसंधान रीतियों में उजागर होता है। अनुसंधानकर्ता तथा सूचनाकर्ता के मध्य की अनुसंधान क्रिया में कहीं भी पूछताछ, आगणन गलत प्रश्नावली, पक्षपात या मिथ्या झुकाव आदि के कारण गए निदर्शन विश्वम उत्पन्न होता है इनकी एक विशेषता यह होती है कि यह एक ही दिशा में बढ़ते हैं तथा संचयी प्रकृति के होते हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि प्रतिदर्श विभ्रम निश्चित सीमाओ के भीतर रहता है लेकिन यदि प्राचल तथा प्रतिदर्श का अंतर निश्चित सीमाओ से अधिक होता है तो उस आधिक्य को गैर-निदर्शन विभ्रम माना जाता है।
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