दूसरी औद्योगिक नीति, 1956- Second Industrial Policy, 1956
दूसरी औद्योगिक नीति, 1956 - Second Industrial Policy, 1956
इस नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थी
(i) उद्योगों का वर्गीकरण इस नीति के अनुसार उद्योगों को तीन भागों में बांटा गया अनुसूची (अ) सार्वजनिक क्षेत्र- इस वर्ग में 17 उद्योग शामिल किए गए जिनके विकास का दायित्व एकमात्र सरकार पर था। इस वर्ग में शामिल किए गए 17 उद्योग इस प्रकार थे अस्त्र-शस्त्र, अणु शक्ति, लोहा व इस्पात, लोहे व इस्पात के पिंडों की ढलाई व तैयारी, भारी मशीनरी, बिजली के यंत्र, कोयला उद्योग, खनिज तेल, जिप्सम तथा सोने की खाने, तांबा, सीसा व जस्त की खाने वायु परिवहन, रेल परिवहन, जलयान, विद्युत निर्माण, एयरक्राप्ट निर्माण, टेलीफोन तार व बेतार यंत्र।
अनुसूची (ब) निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र इस क्षेत्र में 12 उद्योग शामिल थे। इन लोगों का स्वामित्व अधिकाधिक सरकार के हाथों में होना था तथा नई इकाइयों को लगाने में पहल सरकार की थी। इसके साथ-साथ निजी उद्यम को भी इस क्षेत्र में विकास के अवसर दिए जाने थे। इस भाग में रखे गए उद्योग इस प्रकार थे - अन्य खनिज, एल्युमीनियम व अन्य अलौह धातुएं, मशीनी औजार, लौह मिश्रित धातुएं, रसायन उद्योग, औषधियां, उर्वरक, कृत्रिम रबर रासायनिक घोल, सड़क परिवहन, समुद्री परिवहन इत्यादि । अनुसूची (स) निजी क्षेत्र - शेष सभी उद्योग इस श्रेणी में रखे गए जिनके विकास व स्थापना का कार्य निजी क्षेत्र पर छोड़ दिया गया।
(ii) लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास- इस नीति में लघु एवं कुटीर उद्योगों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
यह स्पष्ट किया गया कि सरकार इन उद्योगों का विकास करने के लिए बड़े उद्योगों के उत्पादन की सीमा निर्धारित करेगी, विभेदात्मक कर प्रणाली अपनाकर कुटीर व लघु उद्योगों को प्रत्यक्ष सहायता देगी।
(iii) विदेशी पूंजी- इस नीति में भी विदेशी पूंजी का स्वागत किया गया। इस नीति में यह स्पष्ट किया गया कि सरकार देशी व विदेशी पूंजी में कोई भेद-भाव नहीं करेगी। राष्ट्रीय हित में विदेशी पूंजी का राष्ट्रीकरण करने पर उचित मुआवजा दिया जाएगा।
(iv) श्रमिकों के लिए उचित सुविधाएं इस नीति में उद्योगों में लगे श्रमिकों व अन्य कर्मचारियों को विशेष सुविधाएं देने की व्यवस्था की गई। औद्योगिक शांति की स्थापना पर बल दिया गया। श्रमिकों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए तथा उनकी काम करने की दशाओं में सुधार लाने पर भी विशेष जोर दिया गया।
(v) संतुलित क्षेत्रीय विकास- इस नीति में यह स्पष्ट किया जो क्षेत्र औद्योगिक रूप से पिछड़े हैं, उनका पर्याप्त औद्योगिक विकास किया जाएगा।
(vi) निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में सहयोग:- इस नीति में स्पष्ट किया कि उद्योगों का वर्गीकरण पूर्णतः जटिल नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर विभाजन में परिवर्तन किया जा सकता है।
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