अभिनति के स्त्रोत - sources of bias

अभिनति के स्त्रोत - sources of bias


प्रतिदर्श अनुसंधानों में अभिनति के स्त्रोतों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाटा जा सकता है-


(1) प्रतिदर्श का दोषपूर्ण चयन दोषपूर्ण प्रतिदर्श के चयन के मुख्यतः तीन स्त्रोत है- प्रथम सविचार प्रतिचयन में इकाइया अनुसंधानकर्ता स्वेच्छा से चुनता है अतः निदर्श पर उसकी व्यक्तिगत धारणाओं का पूरा प्रभाव पड़ जाता है। द्वितीय- देव प्रतिचयन में चेतन मानव अभिनति की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है, परन्तु एक पूर्णत दैविक निदर्श का चयन अत्यन्त कठिन है। मानव कारकों से उसमें अवचेतन अभिनति हो सकती है, क्योंकि देव प्रतिचयन में मनुष्य एक अपूर्ण और असतोपजनक साधन है।


तृतीय निदर्श इकाइया का प्रतिस्थापन भी दीपपूर्ण चयन का स्वरुप है। कभी-कभी किसी कारणवश देव रूप से चुनी गई प्रतिदर्श इकाई के स्थान पर कोई दूसरी इकाई स्थापित हो जाती है

जिसमे अभिनति उत्पन्न हो सकती है जैसे कॉलगेट टूथपेस्ट के सर्वे में कुछ ऐसे व्यक्तियों को शामिल कर लिया जाता है जो कॉलगेट के स्थान पर क्लोजअप टूथपेस्ट का प्रयोग करते हैं। यहाति ऐसे व्यक्तियों से सूचना प्राप्त हो सकती है किन्तु परिणाम पूर्णतया यादृच्छिक नही होंगे वरन उसमें प्रतिस्थापन के कारण अभिनति हो जायेगी। 


(2) दोषपूर्ण सूचना संकलन समेकों के संकलन में जो त्रुटिया रह जाती है उससे संगणना और प्रतिदर्श दोनों प्रकार के सर्वेक्षण प्रभावित होते हैं। परन्तु आकार अपेक्षाकृत छोटा होने के कारण इन त्रुटियों का प्रतिदर्श अनुसंधानों का प्रतिदर्श अनुसंधानों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। प्रतिदर्श अन्वेषण द्वारा समक संकलन में अभिनति बहुधा निम्न कारणों से उत्पन्न होती है- 


(i) अपूर्ण अन्वेषणों तथा उत्तरों की अप्राप्ति जैसे डाक द्वारा अनुसूचियां भेजने पर अधिकांश तो वापिस आती ही नहीं है और जो आती है ये अपूर्ण होती है।


(ii) दोषपूर्ण प्रश्नावली भी प्रतिचयन में अभिनति का एक कारण है।


(iii) अन्वेषक की पूर्ण धारणाए प्रतिदर्श अनुसंधान को अभिनतिपूर्ण बना देती है।


(iv) कभी-कभी अन्वेषक का सावधानी के बावजूद सूचना देने वाले व्यक्ति भी पक्षपातपूर्ण समक देते हैं, जैसे व्यापारियों द्वारा अपनी आय सामान्यत कम ही बताई जाती है।


4. दोषपूर्ण विश्लेषण व निर्वाचन दोषपूर्ण विश्लेषण व निर्वाचन के कारण भी प्रतिचयन अनुसंधानों में अभिनति का समावेश हो जाता है,

जैसे समानतर माध्य के स्थान पर भारित माध्य का प्रयोग, अन्वेषक की पूर्व धारणाएं अभिरुचिया व मनोवृत्तिया ।


इस प्रकार निदर्श अनुसंधान में अभिनति का अंश होने पर उससे पूर्णतया निष्पक्ष परिणाम नहीं निकाले जा सकते हैं। अतः अभिनति के विभिन्न स्त्रोतों को दूर करना परमावश्यक है। इस हेतु-


(i) निदर्श का चयन पूर्णतः यादृच्छिक रूप में किया जाना चाहिए. अर्थात यंत्रों या दैविक अंको की सहायता से इस प्रकार प्रतिदर्श इकाइयों का चुनाव करना चाहिए कि समग्र की प्रत्येक इकाई के प्रतिदर्श में शामिल होने के बराबर संभावित हो। 


(ii) चयन प्रक्रिया में मानव कारकों के समावेश से अभिनति हो जाती है।

अत अभिनति रहित चुनाव के लिए प्रतिदर्श को मानव कारकों से मुक्त रखना चाहिए।


(iii) एक बार चुने हुए निदर्श की इकाइयों में कोई प्रतिस्थापन या परिवर्तन नहीं करना चाहिए।


(iv) निदर्श को किसी इकाई को यथासंभव कभी नहीं छोड़ना चाहिए।


(v) अन्वेषक पूर्णतया निष्पक्ष, योग्य व अनुभवी होने चाहिए


(vi) प्रश्नावली सरल, संक्षिप्त व स्पष्ट होनी चाहिए।


(vii) विश्लेषण व निर्वाचन की उपयुक्त विधि अपनायी जानी चाहिए। इस प्रकार उपर्युक्त सावधानिया होने पर अभिनति के स्त्रोत नियंत्रित किये जा सकते हैं और प्रतिदर्श- चयन, सर्वेक्षण व निवचन की क्रियाओं में अभिनति को दूर किया जा सकता है।