राजकीय सहकारी बैंक - state co-operative bank

राजकीय सहकारी बैंक - state co-operative bank


प्रत्येक राज्य में एक प्रमुख सहकारी बैंक होता है जो राज्य के केंद्रीय बैंकों को रुपया उधार देता है और उनका निरीक्षण करता है। इन बैंकों की स्थापना की सिफारिश मैक्लगन कमेटी ने 1915 में की थी, इनकी स्थापना सबसे पहले चेन्नई और महाराष्ट्र में हुई। अब प्रत्येक राज्य में एक राजकीय सहकारी बैंक है। इन बैंकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है।


(क) सदस्यता - भारत में राजकीय बैंकों की सदस्यता दो प्रकार की है। कुछ राज्यों, जैसे-पंजाब, हरियाणा, बंगाल और कर्नाटक में केवल सहकारी समितिया ही इन बैंकों की सदस्य बन सकती है परंतु कुछ राज्यों, जैसे-महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार और असम में सहकारी समितियों के साथ-साथ व्यक्ति भी इन बैंकों के सदस्य बन सकते है, परंतु अब नये व्यक्तियों को सदस्य बनाना बंद कर दिया गया है।


(ख) प्रबंध - इन बैंकों का संचालन करने के लिए सदस्य सहकारी समितियों के प्रतिनिधियों तथा व्यक्तियों की एक साधारण सभा होती है। इसके सदस्य अपने में से कुछ सदस्यों को डायरेक्टर चुन लेते है। ये बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ही राज्य सहकारी बैंक का संचालन करते हैं। कुछ राज्यों में सरकार भी अपने अधिकारियों को इन बोर्डों का डायरेक्टर नामजद कर देती है। 


(ग) कार्य - राज्य सहकारी बैंकों के मुख्य कार्य निम्नलिखित है


(i) ये बैंक अपने राज्य के केंद्रीय सहकारी बैंकों के कार्य संचालन पर नियंत्रण रखते हैं।


(ii) सहकारी आंदोलन के लिए धन की व्यवस्था करते हैं। 


(iii) सहकारी आंदोलन और राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में संबंध जोड़ते है ।


(iv) राज्य के विभिन्न केंद्रीय बैंकों के कार्यों में संतुलन रखते हैं। 


(v) राज्य सहकारी आंदोलन को राष्ट्रीय सहकारी आंदोलन से जोड़ते है।


(vi) ये एक बैंक के अन्य कार्य भी करते हैं। 


(घ) धन के साधन - इन बैंकों को पूँजी मुख्य रूप से चार साधनों से प्राप्त होती है।


(i) शेयर पूंजी इन बैंकों का सदस्य बनने के लिए कम से कम एक शेयर खरीदना आवश्यक है।

इन बैंको के शेयर काफी ऊँचे मूल्य के होते है। ये बैंक केंद्रीय बैंक को जो कर्जा देते हैं वह उनके शेयरों पर निर्भर करता है। इसमे फलस्वरूप इनके अधिक शेयर बिक जाते हैं। सरकार भी इनके शेयर खरीद लेती है।


(ii) सुरक्षित कोष- ये बैक अपने लाभ का कुछ प्रतिशत भाग एक सुरक्षित कोष में जमा करते रहते हैं जिससे कि कठिनाई के समय में वे उनका प्रयोग कर सके। 


(iii) जमा:- इन बैंकों में सदस्य और गैर सदस्य दोनों ही अपना रुपया करवा सकते हैं। ये बैंक इन जमाओं पर ब्याज भी देते हैं।


(iv) ऋण:- इन बैंकों की वित्त व्यवस्था का सबसे मुख्य साधन कर्जा है।

ये बैंक रिजर्व बैंक, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक से ऋण प्राप्त करते हैं। राज्य सरकारों की गारंटी पर इन्हें स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया तथा दूसरी संस्थाओं से भी रुपया उधार मिल जाता है। इन बैंकों की कार्यशील पूँजी का लगभग 50 प्रतिशत भाग केवल पूंजी से ही पूरा होता है। 


(ड) ऋण देना- ये बैंक केंद्रीय बैंक, प्राथमिक समितियों तथा व्यक्तिगत सदस्यों और सभी प्रकार के सहकारी सगठनों को कर्जे देते है। ये रिजर्व बैंक के पास भी धन जमा करते है और सरकारी प्रतिभूतियों में धन लगाते है। अब ये बैंक केंद्रीय भूमि विकास के ऋण पत्र भी खरीदने लग गए है


(च) केंद्रीय बैंकों से साथ संबंध ये बैंक राज्य के केंद्रीय बैंकों की नीतियों और उनके कार्यों पर नियंत्रण रखते है। केंद्रीय बैंक के कार्यों में समन्वय भी करते हैं। ये केंद्रीय बैंकों को पुनर्मितिकाटा तथा ओवर ड्राफ्ट की सुविधाएं भी देते है।


(छ) रिजर्व बैंक के साथ संबंध राज्य सहकारी बैंक किसी राज्य के सहकारी आदोलन और रिजर्व बैंक के बीच एक कड़ी का काम करते है। रिजर्व बैंक इन्हें बैंक दर से भी कम ब्याज पर रुपया उधार देता है। ये उनकी प्रतिभूतियों के आधार पर ऋण देता है। मध्यकालीन ऋण देने के लिए रिजर्व बैंक ने राष्ट्रीय कृषि साख कोष की स्थापना की थी। अब यह कार्य राष्ट्रीय कृषि एवं विकास बैंक करता है।


(ज) प्रगति - मार्च 2007 के अंत में 31 राज्य सहकारी बैंक थे। इनकी जमाराशि रु. 48,560 करोड़ थी। इन्होनें रु 47,354 करोड़ के ॠण दिये। इनके रु 47,354 करोड़ के ऋण बकाया है। इनकी कुल परिसंपतियाँ / दायित्व रु. 85,576 करोड़, कुल आय रु. 5,242 करोड़, कुल व्यय रु 4,967 करोड़ तथा प्रचालन लाभ रु. 777 करोड़ और शुद्ध लाभ रु 275 करोड़ था ।