विदेशी बाजार में प्रवेश की व्यूहरचनाएं - Strategies for entering the foreign market

विदेशी बाजार में प्रवेश की व्यूहरचनाएं - Strategies for entering the foreign market


विदेशी बाजार में प्रवेश की प्यूहरचना निर्धारित करना एक बहुत ही रचनात्मक निर्णय है। विदेशी बाजार में प्रवेश संबंधी प्यूहरचना का चयन बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि इसके दीर्घकालीन प्रभाव होते है एक बार प्यूहरचना का चयन करने के बाद इसे सरलता से बदला नहीं जा सकता भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक इकाई का विकास बहुत सीमा तक व्यूहरचना के चयन पर निर्भर करता है। विदेशी बाजार में प्रवेश के तीन मुख्य माध्यम है-व्यापार माध्यम, निवेश माध्यम व अनुबंधीय प्रवेश माध्यम व्यापार माध्यम में व्यावसायिक इकाई विदेशी बाजारों में अपने उत्पाद निर्यात करती है। निवेश माध्यम में मूल कंपनी विदेशों में सहायक कपनिया स्थापित करती है अनुबंधीय माध्यम में मेजबान देश की व्यावसायिक इकाइयों से तकनीकी सहयोग समझौते किए जाते हैं। इनमें मूल कंपनी अपनी नवाचारी टेक्नोलॉजी मेजबान देश की व्यावसायिक इकाई को उपलब्ध करवाती है।

इन तीन मुख्य रणनीतियों के अलावा विदेशी बाजार में प्रवेश की अन्य रणनीतिया भी है। उचित रणनीति को का चयन विभिन्न घटकों पर निर्भर करता है; जैसे संसाधनों की उपलब्धता, जोखिम स्तर, टैरिफ व गैर-टैरिफ बचाएं परिवहन लागत अधोसंरचना सुविधाएं प्रबंध का दृष्टिकोण, विदेशी निवेश का अंतप्रवाह / बाहरी प्रवाह आदि वैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय को बहुत बढ़ावा दिया है। वैश्वीकरण में एक देश की अर्थव्यवस्था को विश्व के अन्य देशा की अर्थव्यवस्था के साथ स्वतंत्र व्यापार, पूजी व श्रम के स्वतंत्र प्रवाह द्वारा जोड़ा जाता है।


वैश्वीकरण में घरेलू अर्थव्यवस्था को विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के लिए खोल दिया जाता है आयात पर लगे प्रतिबंधों को कम किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापर को बढ़ाया दिया जाता है।

अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश कर सकती है जो पहले विदेशी कंपनियों के लिए वर्जित या प्रतिबंधित थे। वैश्वीकरण का यह मानना है कि घरेलू अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इससे विश्व की उच्चस्तरीय तकनीक, विशिष्ट ज्ञान उत्पादों व सेवाओं आदि का घरेलू अर्थव्यवस्था में अंतरप्रवाह बढ़ेगा विकसित देशों की पूजी व टेक्नोलॉजी विश्व क विकासशील देशों जैसे चीन, भारत आदि में निवेश की जाएगी। विभिन्न कंपनिया वैश्वीरण की भिन्न-भिन्न रणनीतिया अपनाकर अपने व्यवसाय को वैश्विक स्तर पर फैलाती है। कुछ कंपनियां अलग-अलग देशों में प्रवेश की भिन्न-भिन्न रणनीतियां अपनाती है विदेशी बाजार में प्रवेश की मुख्य रणनीतियां निम्नलिखित है:


(क) निर्यात करना


निर्यात द्वारा व्यवसाय को वैश्विक स्तर पर फैलाना वैश्वीकरण की एक पुरानी रणनीति है।

प्रारंभ में घरेलू कंपनी केवल एक ही देश को अपने उत्पाद निर्यात करती है। फिर धीरे-धीरे यह अपने उत्पाद अन्य देशों को निर्यात करके अपने व्यवसाय को कई देशों में फैला कर वैश्विक स्तर की व्यावसायिक इकाई बन जाती है। यदि घरेलू कंपनी की उत्पादन क्षमता पूर्ण रूप से घरेलू अर्थव्यवस्था में प्रयोग नही हो पाती, तथा उसकी उत्पादन लागत अन्य देशों की व्यावसायिक इकाइयों की तुलना में कम है तो वह अपनी अप्रयुक्त क्षमता का पूर्ण लाभ उठाने के लिए उसका निर्यात करना शुरू कर देती है।


(ख) लाइसेंसिंग व फ्रेंचाइजिंगः:


लाइसेंसिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई अपनी बौद्धिक संपदा जैसे, पेटेंट, कॉपीराइट आदि को प्रयोग करने का अधिकार किसी अन्य देश की व्यावसायिक इकाई को प्रदान करती है।

लाइसेंस प्राप्त करने वाली व्यावसायिक इकाई, लाइसेंस धारक व्यावसायिक इकाई को एक निश्चित समय अवधि के लिए रॉयल्टी या फीस देती है फ्रेंचाइजिंग के अंतर्गत एक देश की व्यावसायिक इकाई किसी दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई को विधिवत ढंग से व्यवसाय करने का अधिकार प्रदान करती है। इसमें फ्रेंचाइजी फ्रेंचाइजर के ब्रांड नाम से उत्पाद व सेवाएं बेच सकता है कई बार फ्रेंचाइजर कुछ उपकरण व कलपुर्जे फचाइजी को उपलब्ध करवाता है।


(ग) उत्पादन समझौता:


इस रणनीति में विश्व स्तर पर विपणन का कार्य करने वाली कंपनी किसी कंपनी के साथ उत्पाद को बनवाने का समझौता करती है तथा उस उत्पाद के विपणन का दायित्व स्वयं लेती है।

अर्थात उत्पाद का निर्माण तो घरेलू इकाई करती है परंतु उत्पाद के विपणन कार्य का दायित्य विदेशी कंपनी लेती हैं। इस रणनीति से विदेशी कंपनी अन्य देशों मे बिना अपनी निर्माणी इकाई स्थापित किए अपने व्यवसाय को अन्य देशों में फैला सकती है। यदि किसी देश में इसका व्यवसाय अधिक नहीं चलता है तो विदेशी कंपनी बड़ी सरलता से उस देश में अपना व्यवसाय बंद कर सकती है क्योंकि वहां उसकी कोई अपनी निर्माणी इकाई नहीं हैं।


(घ) संयुक्त उपक्रम:


विदेशी बाजार में प्रवेश होने के लिए यह रणनीति बहुत प्रचलित है। संयुक्त उपक्रम में विदेशी साझेदार के साथ मिलकर व्यावसायिक इकाई स्थापित करता है।

इस संयुक्त उपक्रम का स्वामित्व व प्रबंधकीय अधिकार दोनों के पास होता है। घरेलू इकाई को घरेलू दशाओं के बारे में जैसे उपभोक्ताओं की रूचि आय स्तर फैशन, पसंद, प्राथमिकता आदि के बारे में ज्ञान होता है उसके पास व्यवसाय को चलाने के लिए आधारभूत सुविधाए जसे- निर्माणी इकाई वितरण नेटवर्क, सेवा केंद्र आदि होते हैं। यदि विदेशी साझेदार विकसित देश में होता है, तो उसके पास उच्च स्तरीय टेक्नोलॉजी व तकनीकी विशेषज्ञ होते हैं। घरेलू इकाई अपनी निर्माण इकाई, अपना वितरण नेटवर्क उपलब्ध करवाती है तथा स्थानीय श्रम उपलब्ध करवाती है। संयुक्त उपक्रम का लाभ विदेशी साझेदार व घरेलू इकाई आपस में निर्धारित अनुपात में बाटते हैं।


(ङ) प्रबंधकीय समझौता:


इस समझौते के अंतर्गत विदेशी कंपनी किसी अन्य देश में अपनी प्रबंधकीय एजेंसिया स्थापित करती है।

इन प्रबंधकीय एजेंसियों की सहायता से यह अन्य देश में अपनी व्यावसायिक इकाइयों में बिना अपनी पूंजी निवेश किए इन्हें प्रबंधित करती है अर्थात इस समझौते में केवल प्रबंधकीय जानकारी ही उपलब्ध करवाई जाती है। इस सेवा के बदले विदेशी कंपनी से लाभ का कुछ प्रतिशत या एकमुश्त राशि फीस के रूप में लेती है।


(च) पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनिया:


कुछ विदेशी कंपनिया अन्य देशों में अपने पूर्ण स्वामित्व वाली निर्माणी इकाइयां स्थापित करती है। इन सहायक कंपनियों की पूर्ण पूजी विदेशी कंपनी के पास ही होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनिया वैश्वीकरण की इस रणनीति को तब अपनाती है,

जब वे निर्माण कियाओं व विपणन कियाओं पर अपना संपूर्ण नियंत्रण रखना चाहती है। यह रणनीति वैश्वीकरण की अन्य रणनीतियों से इस प्रकार भिन्न है कि इसमें निर्माणी इकाई भी विदेशी कंपनी द्वारा ही लगाई जाती है। तथा सहायक कंपनी की सारी पूंजी व नियंत्रण बहुराष्ट्रीय कंपनी के पास ही होता है जैसे- एल जी इलेक्ट्रॉनिक्स ने भारत में एल जी इण्डिया के नाम से संपूर्ण स्वामित्व वाली अपनी निर्माणी इकाई सहायक कंपनी में रूप में स्थापित की है। इस सहायक कंपनी की संपूर्ण कियाए व विपणन कियाएं भारत में ही की जाती है। मूल कंपनी के ब्रांड नाम से ही सहायक कंपनी अपने उत्पाद बेचती है। 


(छ) संग्रहण समझौते


वैश्वीकरण की इस रणनीति में विदेशी साझेदार मूल उपकरण व पुर्जे उपलब्ध करवाता है, परंतु इनका संग्रहण दूसरे देश में किया जाता है। प्रायः विकसित देश की व्यावसायिक इकाई मूल उपकरण उपलब्ध करवाती है,

जबकि इनका संग्रहण विकासशील देश में किया जाता है। इस प्रकार इस समझौते से विकासशील देश की सस्ती श्रम लागत का लाभ मिल जाता है। विकासशील देश में इस संग्रहित उत्पाद को विकसित देश के ब्रांड नाम से ही बेचा जाता हैं ।


(ज) अन्य देशों में विलयन व अधिग्रहण:


ऐसे विलयन व अधिग्रहण विभिन्न देशों की व्यावसायिक इकाइयों के बीच होते है विलयन के अंतर्गत प्राय एक स्तर के व्यवसाय में सलग्न व्यावसायिक इकाइया, आपसी प्रतिस्पर्धा को रोकने हेतु व दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक सुदृढ़ता के लिए मिलकर एक ही इकाई में परिवर्तित हो जाती है। विलयन के बाद वे बड़े स्तर की बचतों के लाभ उठाती है। विदेशी अधिग्रहण के अतर्गत प्राय: एक देश की बड़ी व्यावसायिक इकाई अन्य देश की किसी व्यावसायिक इकाई का अधिग्रहण करती है।

अधिग्रहण के बाद छोटी कंपनी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है तथा वह अवशोषक कंपनी में समा जाती है, जैसे भारत की टाटा स्टील कंपनी ने यूरोप की कोरस स्टील कंपनी का अधिग्रहण किया। इसी तरह भारती एयरटेल ने अफ्रीका में जेन्ज टेलीकॉम ऑपरेशन्स का अधिग्रहण किया। इस प्रकार विदेशों में विलयन व अधिग्रहण द्वारा अन्य देशों में स्थापित व्यावसायिक इकाइयों की निर्माणी इकाइयों व विपणन आधार पर तुरंत पहुंच बन जाती है तथा विदेशी प्रतिस्पर्धा में भी कमी आती है।


(झ) तीसरा देश रूट


वैश्वीकरण की इस रणनीति का प्रयोग दो देशों के मध्य मैत्रिक संबंधों का लाभ उठाने के लिए किया जाता है। इस रणनीति में एक देश दूसरे देश में प्रत्यक्ष निवेश न करके पहले तीसरे देश में निवेश करता है.

तदोपरांत यह निवेश लक्षित देश में किया जाता है ऐसा लक्षित देश व दूसरे देश के मध्य मैत्रिक संबंधों के कारण निवेश पर उपलब्ध रियायतों व छूटों का लाभ उठाने के लिए अन्य देश, जैसे- जापान, इंग्लैंड, यू एस. ए. आदि भारत में सीधा निवेश न करके पहले मॉरिशस में निवेश करते हैं, तदोपरांत मॉरिशस से भारत में निवेश किया जाता है। इससे मॉरिशस से आए निवेश पर उपलब्ध करों में रियायतों का लाभ अन्य देशों को मिल जाता है। वैश्वीकरण की इस रणनीति को उस दशा में भी अपनाया जाता है, जब मूल निवेशक देश व लक्षित देश के मध्य राजनैतिक या व्यापारिक संबंध अच्छे नहीं है जैसे माना देश अ और ब के मध्य संबंध अच्छे नहीं है। परंतु देश अ का निवेशक देश व में या देश ब का निवेशक देश अ में निवेश करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में तीसरे देश के रूट से लक्षित देश में निवेश किया जाता है।


1. व्यूहरचनात्मक गठबंधन


यह गठबंधन दो व्यावसायिक इकाइयों के मध्य किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है,

जैसे- नवाचारी टेक्नोलॉजी के विकास के लिए साझी अनुसंधान व विकास इकाई स्थापित करना, साझे प्रशिक्षण कार्यक्रम द्वारा दोनों व्यावसायिक इकाइयों के कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना, दोनों व्यावसायिक इकाइयों के ग्राहकों को विकय उपरांत सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए साझा उपभोक्ता सेवा केंद्र स्थापित करना आदि। कई बार विदेशी बाजार में प्रवेश लेने के लिए व्यूहरचनात्मक गठबंधन किया जाता है। इसमें एक देश की व्यावसायिक इकाई अन्य देश की व्यावसायिक इकाई से यह गठबंधन करती है कि वह उसके बाजार क्षेत्र में प्रवेश करेगी। प्रवेश के इस माध्यम में दोनो व्यावसायिक इकाइयां अपने अस्तित्व को बनाए रखती है तथा एक-दूसरे की क्रियाओं में कोई दखलअंदाजी नहीं करती न ही स्वामित्व में कोई हस्तांतरण होता है। इस माध्यम में मेजबान देश में कोई सहायक कंपनी स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती। इस गठबंधन को रद्द करना बहुत ही सरल होता है क्योंकि इसमें न तो नयी विदेशी सहायक कंपनी की स्थापना की जाती है और न ही स्वामित्व का हस्तांतरण किया जाता है। यह गठबंधन किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है जिससे दोनो साझेदारों को लाभ होता है।


2 टर्नकी परियोजनाएं:


इस समझौते में एक देश की व्यावसायिक इकाई किसी दूसरे देश की व्यावसायिक इकाई के लिए पूर्ण प्लाट का निर्माण करने का समझौता करती है जो व्यावसायिक इकाई प्लाट का निर्माण करती है उसे लाइसेंसर कहते हैं तथा जिस व्यावसायिक इकाई को पूर्ण निर्मित प्लॉट मिलना है, उसे लाइसेंसधारी कहते है। जब परियोजना की प्रारंभिक अवस्था, कार्यात्मक अवस्था की तुलना में अधिक जटिल होती है, तो ऐसी परिस्थिति में टर्नकी परियोजना समझौते किए जाते है। इन समझौतों में लाइसेंसर के पास प्लांट निर्माण संबंधी तकनीकी कौशल, ज्ञान तथा अनुभव होता है। इस सेवा के लिए लाइसेंसर या तो एकमुश्त राशि के रूप या कुल परियोजना लागत का निर्धारित प्रतिशत अपनी सेवा के लिए प्रतिफल के रूप में लेता है।

परियोजना को शुरू करने के लिए यदि लाइसेंसधारी के पास अनुभव य मुख्य तकनीक की कमी होती है तो यह समझौता लाइसेंसधारी के लिए लाभकारी होता है। इस परियोजना से लाइसेंसधारी विश्वस्तरीय आधुनिक डिजाइनों का लाभ उठा सकता है। लेकिन तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण लाइसेंसधारी की भविष्य में भी लाइसेंसर पर निर्भरता बनी रहती है भविष्य में यदि प्लाट में कोई तकनीकी खराबी आती है या प्लाट के किसी कल-पुर्जे / उपकरण का प्रतिस्थापित करना पड़ता है, तो इसके लिए लाइसेंसधारी को लाइसेंसर पर ही निर्भर रहना पड़ता है।


3. प्रति-व्यापार


कुछ व्यावसायिक इकाइया दूसरे देश की व्यावसायिक इकाइयों के साथ एक दूसरे के बाजारों में प्रवेश पाने के लिए प्रति व्यापार समझौते करती है। प्रति व्यापार ऐसा अनुब्ध है जिसमें निर्यात करने के लिए उसी मूल्य का आयात करना होता है जब यह समझौता दो राष्ट्रों के बीच होता है तब एक देश,

दूसरे से इस शर्त पर आयात करता है कि दूसरा देश भी पहले देश से बराबर मूल्य की वस्तुओं का आयात करे। आजकल विभिन्न व्यावसायिक इकाइयों के बीच भी प्रति व्यापार समझौते किये जाते हैं। इसके अंतर्गत एक व्यावसायिक इकाई दूसरी व्यावसायिक इकाई से इस शर्त पर आयात करती है कि दूसरी व्यावसायिक इकाई भी पहली व्यावसायिक इकाई से निर्धारित समय में बराबर मूल्य के वस्तुओं का आयात करेगी। इस तरह के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता नहीं पड़ती और देश के भुगतान शेष पर कोई भार नहीं पड़ता। यह एक तरह का वस्तु विनिमय है। प्राचीन काल में विभिन्न देशों के बीच इसी तरह का व्यापार होता था, क्योंकि इसमें मुद्रा की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। समय के साथ मुद्रा का विकास हुआ और मुदा को विभिन्न व्यवहारों के विनिमय में स्वीकार किया जाने लगा मुद्रा के विकास से प्रति व्यापार में और भी लोचशीलता आ गई। अब दो देशों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में वस्तुओं का विनिमय एक ही समय पर होना अनिवार्य नहीं रहा। इससे प्रति व्यापार का विकास हुआ। अब एक देश आयात करते समय दूसरे देश पर एक निश्चित अवधि में उतने ही मूल्य की वस्तुओं को आयात करने की शर्त लगाता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रति व्यापार आज भी प्रचलित है बहुत से देश आपस में प्रति व्यापार समझौते करके अंतरराष्ट्रीय व्यापार करते है अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रति व्यापार उन दशाओं में बहुत उपयोगी है जब देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा न हो प्रति व्यापार विभिन्न देशों में प्रायः पाया जाता है।