सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधान- प्रमुख विचारक - Total Quality Management - Key Thinker
सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधान- प्रमुख विचारक - Total Quality Management - Key Thinker
सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन की क्रान्ति को समझने के लिए इससे सम्बंधित कुछ प्रमुख विचारकों के गुणवत्ता दर्शन को समझना आवश्यक है जिन्होंने इस क्रान्ति को दिशा प्रदान की। वर्तमान में गुणवत्ता के प्रति हमारे ज्ञान और समझ को विकसित करने में इनके दर्शन एवं शिक्षा का महत्वपूर्ण एवं प्रमुख योगदान रहा है।
1. वाल्टर ए. शेवहार्ट वाल्टर ए. शेवहार्ट 1920 से 1930 के दशक में अमेरिका के बेल लेबोरेटरी में एक सांख्यिकीविद थे। वाल्टर ने यादृच्छिकता का अध्ययन किया तथा पाया की विचलनशीलता अथवा अस्थिरता प्रायः सभी उत्पादन प्रक्रियाओं में सामान रूप से पाई जाती है। उन्होंने गुणवत्ता नियंत्रण चार्ट का विकास किया जिसका प्रयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि किसी प्रक्रिया में अस्थिरता या असमानता, यादुच्छ है अथवा अयोग्य श्रमिक तथा अनुपयुक्त एवं त्रुटीपूर्ण संयंत्र जैसे अन्य विशिष्ट एवं आवंटनयोग्य कारणों से है। वाल्टर के कार्यों को आधुनिक सांख्यिकीय प्रक्रिया नियंत्रण की नींव माना जाता है।
2. डब्ल्यू एडवर्ड्स डेमिंग इनको गुणवत्ता नियंत्रण के जनक के नाम से जाना जाता है। डेमिंग 1940 के दशक में न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय में सांख्यिकी के प्रोफेसर थे। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात इन्होंने अनेक जापानी संगठनों की गुणवत्ता सुधारने में सहायता की। जापान में उनको इतना अधिक सम्मान मिला की 1951 में उनके नाम से वार्षिक 'डेमिंग पुरस्कार" की घोषणा की गई जो उन संगठनों को दिया जाता है जो गुणवत्ता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हैं। लगभग तीस वर्षों के बाद अमेरिकी व्यवसायों ने गुणवत्ता पर डेमिंग के दर्शन को अपनाया। डेमिंग के गुणवत्ता दर्शन के अनेक तत्त्व गुणवत्ता की परंपरागत अवधारणा से भिन्न हैं। इनमें से प्रथम, वह भूमिका है जो प्रबंधन को संगठन के गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों के सन्दर्भ में निभानी चाहिए ऐतिहासिक रूप से निम्न गुणवत्ता का कारण श्रमिकों की अक्षमता, अकर्मण्यता तथा आलस को माना जाता था। डेमिंग के अनुसार, वास्तविकता में गुणवत्ता संबंधी अधिकतर समस्याएँ सिर्फ 15 प्रतिशत श्रमिकों के कारण होती हैं।
जबकि शेष 85 प्रतिशत समस्याओं का कारण प्रक्रियाएं, तंत्र / प्रणालियाँ आदी होते हैं जिसमें प्रभावहीन प्रबंधन भी सम्मिलित है। डेमिंग के अनुसार यह प्रबंधन का कार्य है की वह तंत्र संबंधी समस्याओं को सुधारे तथा एक ऐसे संगठनात्मक पर्यावरण का निर्माण करे जो गुणवत्ता को प्रोत्साहित करे तथा कर्मचारियों को अपनी क्षमताओं को पूर्ण रूप से पहचानने एवं विकसित करने में सहायक हो।
डेमिंग ने अपने दर्शन में 14 प्रमुख गुणवत्ता संबंधी बिन्दुओं का उल्लेख किया है जो इस प्रकार हैं:
> उत्पाद एवं सेवाओं में गुणवत्ता सुधार के उद्देश्य पर सदैव ध्यान देते रहना। गुणवत्ता के लिए प्रतियोगिता में बने रहना तथा कर्मचारियों को रोज़गार के अवसर प्रदान करने का लक्ष्य बनाये रखना।
> गुणवत्ता के लिए नवाचार एवं नवीन दर्शन को ग्रहण करना ।
> गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए सामूहिक निरिक्षण की पद्धति पर निर्भरता समाप्त करना
> कीमतों के आधार पर व्यावसायिक सौदों को समाप्त करना।
> उत्पाद एवं सेवाओं को प्रदान करने की प्रक्रिया तथा प्रणाली में निरंतर सुधार करते हुए गुणवत्ता एवं उत्पादकता के माध्यम से लागतों को निरंतर कम करना।
> कार्यरत स्टाफ के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करना।
> प्रभावशाली नेतृत्व को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करना।
> कर्मचारियों में भय की भावना को समाप्त करना, जिससे की वह संगठन के हित में प्रक्रियाओं में आवश्यक सुधार के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से कार्य कर सकें।
> अन्तर्विभागीय विवादों एवं बाधाओं को समाप्त करना।Znbvc
> सांख्यिकीय नियतांश (कोटा) निश्चित करने वाले कार्य मानकों को समाप्त करना
>उन बाधाओं को समाप्त करना जिनसे कर्मचारियों को अपनी कार्यकुशलता पर गर्व करने के अधिकार का हनन होता है।
> संगठन में शिक्षा एवं आत्मसुधार हेतु कार्यक्रमों का आयोजन करना एवं प्रावधान रखना।
> संगठन के प्रत्येक कर्मचारी को प्रक्रियाओं आदि के सन्दर्भ में आवश्यकतानुसार रूपांतरण का अधिकार देकर सशक्त बनाना।
3. डॉ जोसफ जुरान- डेमिंग के बाद गुणवत्ता प्रबंधन के क्षेत्र को जिस नाम ने सर्वाधिक प्रभावित किया है,
वह है डॉ. जोसफ जुराना जुरान ने प्रथमतया वेस्टर्न इलेक्ट्रिक कंपनी के 'गुणवत्ता कार्यक्रम' में कार्य किया। उन्हें 1951 में उनकी पुस्तक 'गुणवत्ता नियंत्रण हस्तपुस्तिका के प्रकाशन के बाद ख्याति प्राप्त हुई। 1954 में वह गुणवत्ता पर कक्षाएं लेने तथा उत्पादनकर्ताओं के साथ कार्य करने के लिए जापान गए। जहाँ डेमिंग ने गुणवत्ता के लिए संगठनात्मक रूपांतरण पर बल दिया, वहीं जुरान का मानना था कि गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए इतने नाटकीय एवं व्यापक परिवर्तनों की आवश्यकता नहीं है बल्कि गुणवत्ता को संगठन में ही अंतर्निहीत होना चाहिए अर्थात् गुणवत्ता को संगठन का अविभाज्य अवयव बनाने की आवश्यकता है।
जुरान के कुछ महत्वपूर्ण योगदानों में उनका गुणवत्ता की परिभाषा तथा उसकी लागत पर ध्यान केन्द्रित करना है।
जुरान ने गुणवत्ता को उपयोग के लिए उपयुक्त' के रूप परिभाषित किया न की सिर्फ मानकों के अनुरूप के रूप में उपयोग के लिए उपयुक्त की अवधारणा उत्पाद के तकनीकी पक्षों की बजाय, उपभोक्ताओं के उत्पाद का उपयोग करने के मंतव्यों की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। जुरान का एक प्रमुख योगदान *गुणवत्ता की लागत' के संप्रत्यय का विकास करना भी है जिसके माध्यम से गुणवत्ता का मापन सिर्फ व्यक्तिगत मूल्यांकन के आधार पर नहीं बल्कि मौद्रिक प्रमापों के आधार पर भी किया जा सकता है।
जुरान को गुणवत्ता त्रय' / 'गुणवत्ता ट्राइलॉजी (quality trilogy) के संप्रत्यय के विकास के लिए भी लोकप्रियता मिली। इस गुणवत्ता ट्राइलॉजी' के प्रथम चरण गुणवत्ता नियोजन' है जो संगठनों का उनके उपभोक्ताओं, उत्पाद की आवश्यकताओं तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्यों को पहचानने के लिए आवश्यक है। प्रक्रियाओं को इस प्रकार से अपनाया जाए की गुणवत्ता मानकों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके।
'गुणवत्ता ट्राइलॉजी' के द्वितीय चरण अर्थात् गुणवत्ता नियंत्रण में सांख्यिकीय नियंत्रण तकनीकों के नियमित प्रयोग पर बल दिया गया है जिससे गुणवत्ता मानकों से विचलन की पहचान तथा गुणवत्ता मानकों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके। गुणवत्ता ट्राइलॉजी का तृतीय चरण 'गुणवत्ता सुधार' है। जुरान के अनुसार गुणवत्ता सुधार निरंतर होना चाहिये तथा साथ ही साथ निर्णायक होना चाहिए। डेमिंग के साथ जुरान ने भी निरंतर सुधार को क्रियान्वित करने के लिए कर्मचारियों को सही विधियों के सन्दर्भ में नियमित रूप से प्रशिक्षित करने पर बल दिया।
4. आमंड वी. फीगेनबाम- एक अन्य गुणवत्ता विचारक जिन्होंने 'सम्पूर्ण गुणवत्ता नियंत्रण' की अवधारणा का सूत्रपात किया। 1961 में आई इनकी पुस्तक सम्पूर्ण गुणवत्ता नियंत्रण' (Total Quality Control) में इन्होंने अपने गुणवत्ता सिद्धांतों को 40 चरणों में प्रस्तुत किया है। फीगेनबाम ने गुणवत्ता को सम्पूर्ण संगठन के दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने एक ऐसे कार्य पर्यावरण को प्रोत्साहित किया जहाँ गुणवत्ता विकास पूरे संगठन में एकीकृत हो,
जहाँ प्रबंधन एवं कर्मचारी गुणवत्ता को सुधारने के लिए पूरी तरह से समर्पित हों तथा लोग एक दुसरे की सफलता से प्रेरणा एवं सीख लेते हों। इस दर्शन को जापानी संगठनों द्वारा अपनाया गया तथा 'संगठन- व्याप्त गुणवत्ता नियंत्रण (company-wide quality control) का नाम दिया गया।
5. फिलिप बी. क्रॉसबी- सम्पूर्ण गुणवत्ता प्रबंधन के क्षेत्र में एक अन्य प्रसिद्ध नाम क्रॉसबी का है। गुणवत्ता के क्षेत्र में उन्होंने कई वर्षों तक कार्य किया। पहले उन्होंने मार्टिन मैर्रियेटी में तथा बाद में 1970 के दशक के दौरान आई.टी.टी. में गुणवत्ता के लिए उपाध्यक्ष पद पर कार्य किया। उन्होंने प्रथम बार में ही सही कार्य करो' (do it right the first time ) जैसी उक्ति तथा शून्य विसंगति (zero defects) जैसे मन्त्रों का विकास किया जो इस तर्क पर आधारित हैं की किसी भी प्रकार एवं मात्रा की विसंगति/ त्रुटी स्वीकार्य नहीं है।
उन्होंने इस विचार का खंडन किया कि संचालन अथवा उत्पादन प्रक्रिया में थोड़ी बहुत विसंगतियां/ त्रुटियाँ सामान्य हैं क्योंकि कोई भी प्रणाली, तंत्र अथवा कर्मचारी परिपूर्ण नहीं है। बल्कि उन्होंने विसंगतियों से बचाव के प्रावधानों तथा विचार पर बल दिया। अपने विचारों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने 'गुणवत्ता स्वतन्त्र है' (Quality is Free) नामक एक पुस्तक लिखी जिसका प्रकाशन 1979 में हुआ। क्रॉसबी को, ‘गुणवत्ता स्वतन्त्र है' की उक्ति के लिए तथा गुणवत्ता की कई प्रकार की लागतों कि ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए, बहुत प्रसिद्धि मिली। इन गुणवत्ता लागतों में व्यर्थ श्रम, रद्दी, खराब संयंत्र, बिक्री में कमी, कार्य पुनरावृत्ति के साथ साथ संगठनात्मक लागतें भी है जिन्हें परिमाणित करना कठिन होता है। क्रॉसबी के अनुसार गुणवत्ता को सुधारने के लिए खर्च करने से अधिक महत्वपूर्ण इन विभिन्न लागतों से बचना है। अतः गुणवत्ता स्वतंत्र है। डेमिंग तथा जुरान की तरह क्रॉसबी ने भी गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों में प्रबंधन की भूमिका एवं सांख्यिकीय नियंत्रण उपकरणों के उपयोग से गुणवत्ता के निरीक्षण एवं मापन पर बल दिया है।
6. काओरो इशिकावा - काओगे इशिकावा को गुणवत्ता उपकरणों जैसे, कार्य-कारण आरेख जिसे फिशबोन आरेख तथा इशिकावा आरेख के नाम से भी जाना जाता है, के विकास के विकास के लिए जाना जाता है। इन उपकरणों को गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए उपयोग में लाया जाता है। इशिकावा प्रथम गुणवत्ता विचारक थे जिन्होंने आंतरिक उपभोक्ता के महत्त्व की ओर ध्यान आकृष्ट किया। वह सिर्फ उत्पादों तथा सेवाओं पर ध्यान देने की बजाय सम्पूर्ण संगठात्मक गुणवत्ता नियंत्रण पर बल देने वाले भी पहले व्यक्ति थे।
इशिकावा का मानना था की संगठन में सभी को एक साझा दृष्टि एवं लक्ष्य के आधार पर संगठित होने की आवश्यकता है। उनके अनुसार गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए संगठन के प्रत्येक स्तर पर पहल होनी चाहिए तथा सभी कर्मचारियों को इसमें सम्मिलित होना चाहिए। इशिकावा को 'गुणवत्ता चक्र के विकास के लिए बहुत प्रसिद्धि मिली,
जो सामान कार्य क्षेत्र से सम्बंधित स्वयंसेवी कर्मचारियों का एक छोटा समूह होता है जो अपने क्षेत्र की गुणवत्ता सम्बन्धी समस्याओं पर नियमित अवधि में एक बैठक के माध्यम से चर्चा करता है तथा उनके समाधान का प्रयास करता है।
7. डॉ. गेनिची टागुची - डॉ. गेनिची टागुची, जो कि एक जापानी गुणवत्ता विशेषज्ञ हैं, को उत्पाद प्रारूप के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए जाना जाता है। उनका आकलन है कि लगभग 80 प्रतिशत दोषयुक्त उत्पादों का कारण उनका निम्नस्तरीय / खराब उत्पाद प्रारूप है। टागुची के अनुसार संगठनों को उत्पाद के प्रारूप निर्माण चरण में ही अपने गुणवत्ता सुधार के प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए क्योंकि इस चरण में उत्पाद में परिवर्तन करना अपेक्षाकृत कम खर्चीला एवं आसान है बजाय उत्पादन प्रक्रिया के आरम्भ होने के दौरान टागुची को उत्पाद प्रारूप में ‘प्रयोग के प्रारूप' (design of experiment) के संप्रत्यय के अनुप्रयोग के लिए जाना जाता है। यह विधि एक अभियांत्रिकी उपागम है जो की एक सुदृढ़ प्रारूप निर्माण एवं विकास पर आधारित है, एक ऐसा प्रारूप जिसका परिणाम विभिन्न परिस्थितियों में कार्य करने वाले उत्पाद बनाना है। टागुची का यह गुणवत्ता दर्शन इस तर्क पर आधारित है की पर्यावरणीय परिस्थितियों का नियंत्रण करने की अपेक्षा ऐसे उत्पादों का निर्माण करना अधिक आसान है जो इन विभिन्न परिस्थितियों में भी कार्य कर सकें।
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