व्यापार नीति आयात प्रतिस्थापन - trade policy import substitution
व्यापार नीति आयात प्रतिस्थापन - trade policy import substitution
प्रथम सात पंचवर्षीय योजनाओं में व्यापार की विशेषता अंतर्मुखी थी। तकनीकी रूप से इस नीति को आयात प्रतिस्थापन कहा जाता है। इस नीति का उद्देश्य घरेलू आवश्यकतों की पूर्ति के लिए आयात के बदले घरेलू उत्पादन से पूरा करना है। उदाहरण के लिए किसी भी वस्तु को बाहर से आयात करने की बजाए उन्हें भारत में निर्मित करने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाए। सरकार ने इस उद्देश्य के लिए ऐसी नीति बनाई, ताकि विदेशी प्रतिस्थापन से घरेलू उद्योगों की रक्षा हो। आयात संरक्षण दो प्रकार से होता है- प्रशुल्क तथा कोटा प्रशुल्क आयात करने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है जिससे आयात होने वाली वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो जाती है। इससे उपभोक्ता इन वस्तुओं का प्रयोग करने के लिए हतोत्साहित होता है। कोटे में वस्तुओं की मात्रा सीमित होती है जिन्हें एक विशेष मात्रा में ही आयात किया जा सकता है।
प्रशुल्क तथा कोटे से आयात कम मात्रा में होता है तथा विदशी फर्मों से देश की फर्मों की रक्षा होती है तथा लोगों को स्वदेशी का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
संरक्षण की नीति इस बात पर आशय है कि विकासशील देशों के उद्योग अधिक विकसित देशों के उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा करने के लायक नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में ऐसा माना जाता है कि यदि घरेलू उद्योगों का संरक्षण किया जाता है तो समय के साथ वे प्रतिस्पर्धा करना भी सीख लेगें। हमारे योजनाकारों को भी यह आशंका थी कि यदि आयातों पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो विलासिता की वस्तुओं के आयात पर विदेशी मुद्रा खर्च होने की संभावना बढ़ जाएगी। 1980 के दशक के मध्य तक निर्यात संवर्धन पर कोई गंभीर विचार नहीं किया गया था।
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