विद्यमानता के अनुसार साझेदारों के प्रकार - Types of Partners by Existence

विद्यमानता के अनुसार साझेदारों के प्रकार - Types of Partners by Existence


विद्यमानता के अनुसार प्रत्येक साझेदार के समान अधिकार तथा दायित्व होते हैं, किन्तु व्यवहार में इस प्रकार की स्थिति बहुत कम देखने का मिलती है। प्रत्येक मनुष्य की योग्यता, अनुभव तथा उपयोगिता अलग-अलग होती है। साझेदारी संस्था में कार्य का विभाजन साझेदारों की योग्यता, अनुबंध तथा उपयोगिता के अनुसार र होने के कारण उनके अधिकारों कर्तव्यों तथा दायित्वों में विभिन्नता का आना स्वाभाविक ही है। सामान्य रूप से साझेदारों के प्रकार निम्नलिखित होते है:


1. सामान्य या सक्रिय साझेदार यह वह व्यक्ति होता है जो साझेदारी के समस्त कार्यों में पूर्ण रूप से भाग लेता है। यह व्यवसाय के प्रबंधन एवं संचालन में सक्रिय भाग लेता है तथा अपने कार्यों से फर्म को बांध सकता है।


2. सीमित सोझेदार यह वह व्यक्ति होता है जिसका दायित्व सीमित होता है।

यह दायित्व उसके द्वारा व्यवसाय में लगाई गई पूँजी तक ही सीमित होती हैं। ऐसी साझेदारी में कम से कम एक समान्य साझेदार होना परम आवश्यक होता है। सीमित साझेदार संस्था के एजेन्ट के रूप में कार्य नहीं करते हैं क्योंकिवे व्यापार के संचालन में सक्रिय भाग नहीं ले सकते।


3. निष्क्रिय साझेदार यह वह व्यक्ति होता है जो व्यापार में पूँजी लगाता है, लाभ-हानि में भागी होता है, परन्तु व्यापार के प्रबंधन एवं संचालन में कोई सक्रिय भाग नहीं लेता। इस संबंधन में यह महत्वपूर्ण है कि निष्क्रिय साझेदार भी अन्य पक्षों के प्रति अपने तथा अपने साथियों के कार्य के लिए उत्तरदायी होगा।


4. नाममात्र का साझेदार - यह वह व्यक्ति होता है जो साझेदारी के व्यवसाय में न तो कोई पूँजी लगाता है और न कोई काम ही करता है, परन्तु अपने नाम और साख का फर्म को प्रत्येक करने देता है। ऐसा व्यक्ति भी अन्य पक्षों के प्रति साझेदार की तरह उत्तरदायी होगा।


5. अवयस्क साझेदार - कोई भी व्यक्ति जिसकी आयु 18 वर्ष से कम हो अथवा कोर्ट ऑफ वार्ड्स अधिनियम के अनुसार यदि किसी का संरक्षक न्यायालय द्वारा नियुक्त किया जाता है तो उसकी उम्र 21 वर्ष से कम होने पर वह अवयस्क कहलाता है। साझेदारी अधिनियमके अनुसार एक अवयस्क को पूर्ण रूप से साझेदार नहीं बनाया जा सकता है परन्तु सभी साझेदारों की सहमति से उसको व्यवसाय के लाभ में सम्मिलित किया जा सकता है।


6. केवल लाभ में भागीदार ऐसा साझेदार जो अन्य साझेदारों की स्वीकृति से फर्म के लिए थोड़ी पूँजी देते हैं और केवल लाभों में सम्मिलित होते है, हानि में नहीं केवल लाभ में भागीदार साझेदार कहलाते है।


7. आगुन्तुक साझेदार ऐसा साझेदार जो अन्य साझेदारों की सहमति से स्थायी रूप से साझेदारी में प्रवेश करता है, उसे आगन्तुक साझेदार कहते है। वह व्यक्ति साधारणतथा पुराने साझेदारों को उनकी बनायी हुई प्रतिष्ठा तथा पुरानी सेवाओं के लिए प्रब्याजि के रूप में धनराशि देता है और समझौते के अनुसार पूँजी लगाता है, एवं लाभ-हानि में हिस्सेदार होता है।


8. बाहर जानेवाला साझेदार सक्रिय अथवा निष्क्रिय दोनों ही प्रकार के साझेदार जिस समय व्यापार से अपने संबंधोंका विच्छेदन करके चला जाता है तो उसे बाहर जानेवाला साझेदार कहा जाता है। भावी दायित्वों से मुक्त होने के लिए उसको अपने अलग होने की उचित सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ती है।