विनिमय दरों में निर्बाध उतार-चढ़ाव - Uninterrupted fluctuations in exchange rates
विनिमय दरों में निर्बाध उतार-चढ़ाव - Uninterrupted fluctuations in exchange rates
द्वितीय महायुद्ध के पूर्व तक प्राय सभी विचारकों का यह विश्वास था कि विदेशी विनिमय दरें स्थिर रहनी चाहिए। विनिमय दरों के स्थायित्व के अनेक लाभ बताये जाते थे, जैसे विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन, व्यापार की गति बढ़ने के कारण औद्योगिक उन्नति कीमतों तथा मजदूरी दरों में स्थायित्व पूजी निर्माण को प्रोत्साहन, अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह, विनिमय व्यवस्था में सुविधा इत्यादि। परंतु समस्या यह है कि विनिमय दरों में स्थायित्व कैसे लाया जाये? प्रायः व्यापार संतुलन विकसित देशों के पक्ष में रहता है तथा विकासशील देशों में विपक्ष में यदि विकसित देश विकासशील देशों को नियमित रूप से ऋण दे तथा उन देशों में पूंजी का निवेश करे तो सम्भवतः कुछ समय तक विनिमय दरों को स्थिर बनाये रखा जा सकता है परंतु विकास के प्रयासों के परिणामस्वरूप विकासशील देशों में मुद्रा की कय शक्ति गिरना अवश्यम्भावी है जिसका विनिमय दरो पर भी प्रभाव पड़ता है
विदेशी ऋणों की व्याज और भुगतान की किस्तों का भार उन्हें विनिमय दर गिराने को बाध्य कर देता है अत व्यावहारिक दृष्टि से विनिमय दरों को सदा एक विशेष बिन्दू पर स्थिर रखना सम्भव नहीं होता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई ऐसी व्यवस्था अपना ली जाये जिसमें विनिमय दर को परिस्थितियों के अनुसार निरन्तर बदलते रहने की छूट दे दी जाये परिवर्तनशील विनिमय दरें देश की अर्थ व्यवस्था के लिए सर्वथा घातक होती है।
पूर्णतया स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में जहां विदेशी विनिमय के कय विकय पर कोई प्रतिबंध नहीं होते, विनिमय दर निर्वाध रूप से घटती बढ़ती रहती है परन्तु विनिमय दरों की निरन्तर अस्थिरता राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रकार की गम्भीर समस्याएं उत्पन्न कर सकती है।
स्वर्णमान के अंतर्गत तो विनिमय दरों की स्थिरता को इतना अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता था कि इसे बनाये रखने के लिए आन्तरिक स्थिरता का भी परित्याग कर दिया जाता था। साम्य दर का विवेचन करते हुए हम बता चुके है कि यद्यपि साम्य दर विनिमय दरों में स्थिरता की घोतक है किन्तु विनिमय दरों का पूर्णत स्थिर रहना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछनीय वस्तुत देश के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए विनिमय दरों में लोच का होना अनिवार्य है, परन्तु अत्यधिक अस्थिर विनिमय दर अर्थव्यवस्था के लिए अनेक प्रकार से हानिकारक होती है विनिमय दरों के बेरोकटोक उतार-चढ़ाव से उत्पन्न होने वाले निम्नलिखित दुष्परिणाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
(i) विनिमय दरों में तेजी से परिवर्तन होने पर आन्तरिक आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है विनिमय दरों में परिवर्तन निर्यात व आयात मूल्यों में परिवर्तन लाते है
आयात-निर्यात में अस्थिरता के परिणामस्वरूप देश में आन्तरिक उत्पादन स्तर व्यापार कीमतें, लागते इत्यादि सनी आर्थिक तत्व अस्थिर रहेंगे। उत्पत्ति के साधन भी सदा एक उद्योग की ओर गतिमान रहेगे।
(ii) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। विदेशी व्यापार मे जोखिम बढ़ जाता है विदेशी व्यापार से सम्बन्धित उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रम विभाजन व आर्थिक क्षेत्र में विशिष्टीकरण की प्रवृत्तियाँ क्षीण होने लगती है।
(iii) पूजी के आंतकपूर्ण बहिर्गमन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है जिससे देश की मुद्रा के बाहा मूल्य में गिरावट की आशंका होती है
उस देश की पूंज की बाहर जाने की प्रवृत्ति होती है। जिस देश से पूजी बाहर जाती है उसकी मुद्रा की पूर्ति और विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है जिसके परिणामस्वरूप उस देश की मुद्रा का बाहा मूल्य गिरता ही जाता है।
(iv) तरलता पसन्दगी में असाधारण तीव्रता आती है। विनिमय दरों की अस्थिरता के कारण लोग अपने साधनों को अधिकतम तरल रूप में रखना चाहते हैं
ताकि एक मुद्रा के मूल्य में गिरावट होने पर उसे अविलम्ब अधिक मूल्य वाली मुद्रा में बदला जा सके। यह प्रवृत्ति पूंजी के विशेष रूप से सर्वण में सचय को प्रोत्साहन देती है। जिससे साख संकुचन ऊंची ब्याज दरें निवेश में कमी तथा बेरोजगारी में वृद्धि जैसे दुष्परिणाम उत्पन्न होते हैं।
(v) दीर्घकालीन विदेशी निवेशों में बाधा उत्पन्न होती है। यद्यपि विदेशी ऋण प्रायः ऋणदाता की मुद्रा में ही व्यक्त होते है जिसमें ऋणी देश की मुद्रा मूल्य में परिवर्तन होने पर ऋणदाता देश द्वारा दिए गए मूलधन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, तथापि विनिमय दरों में अस्थिरता अनेक प्रकार की कठिनाइयां उत्पन्न कर सकती है। ऋणदाता देश के लिए ब्याज तथा लाभ की रकम निश्चित रहती है और ऋणी देश के लिए उसकी मुद्रा के मूल्य में गिरावट उस पर विदेशी ऋण का भार बढ़ा देती है।
(vi) अस्थिर विनिमय दरें अन्ततः नियंत्रणकारी उपायों को बढ़ावा देती है जब किसी देश की मुद्रा का बाहा मूल्य गिरता है तो यह देश नियंत्रणकारी उपायों का सहारा लेने के लिए बाध्य हो जाता है।
इससे अन्य देश भी प्रतिकार की भावना से इन उपायों को अपनाने लगते है। इस प्रकार विनिमय दरों में परिवर्तन की स्वतंत्रता अन्ततः विनिमय नियन्त्रण में बदल सकती है।
उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विनिमय दरों में निर्बाध उतार-चढ़ाव न तो राष्ट्रीय आर्थिक विकास तथा स्थिरता की दृष्टि से उपयुक्त होते है और न ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार व आर्थिक सहयोग में विस्तार की दृष्टि से यही कारण है कि वर्तमान युग में विनिमय दरों के सम्बन्ध में प्रबन्धित लोच की नीति अधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक मानी जाती है।
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