लागत अवधारणा का प्रबन्धकीय निर्णयों में उपयोग - Uses of Cost Concepts in Managerial Decisions

लागत अवधारणा का प्रबन्धकीय निर्णयों में उपयोग - Uses of Cost Concepts in Managerial Decisions


आधुनिक युग में लागत अवधारणा का प्रबन्धकीय निर्णय में बहुत अधिक महत्व है। प्रबन्धकीय निर्णय में लागत अवधारणा निम्न प्रकार उपयोगी सिद्ध होती है


(1) फर्म की आय का सही आंकलन करने के लिए विक्रय तथा लागत का अन्तर ही लाभ अथवा हानि होता है, अतः सही लागत आंकलन फर्म की आय ज्ञात करने के लिए बहुत जरूरी है। कुल लागत तथा कुल आय का अन्तर जितना अधिक होगा लाभ की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी। जिन संस्थाओं की लागत अधिक होती है तथा आय अन्य संस्थाओं जितनी ही होती है, उन संस्थाओं का लाभ कम होता है। अतः संस्था के कर भुगतान, लाभांश वितरण तथा बोनस से सम्बन्धित निर्णय लागत अवधारणा की सहायता से ही सम्भव है। इसी तरह से पूँजी गत व्यय (Capital Expenditure) से सम्बन्धित व्ययों का विश्लेषण करके यह ज्ञात किया जा सकता है कि उस खर्चे के कितने भाग को लाभ-हानि खाते से चार्ज किया जाये। संस्था के प्रबन्धक लाभ की राशि को कम करने के लिए ह्रास की अधिक राशि चार्ज कर सकते हैं

अथवा लाभ की राशि को बढ़ाने के लिए ह्रास की राशि कम चार्ज की जा सकती है। अतः ह्रास की कितनी राशि वास्तव में लाभा हानि खाते से चार्ज की जाये इसके लिए लागतों का सही विश्लेषण एवं निर्धारण आवश्यक है जो केवल लागत अवधारणाओं द्वारा ही सम्भव है।


(2) मूल्य निर्धारण के लिए व्यावसायिक फर्म के संचालन के लिए तथा उसके उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए फर्म द्वारा निर्मित की जाने वाली वस्तुओं अथवा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के सम्बन्ध में नीतियाँ बनाना तथा उनके मूल्य निर्धारित करना आधुनिक प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण कार्य है। विद्यमान दशाओं एवं पिरिस्थितियों में किसी वस्तु या सेवा का मूल्य क्या हो यह तय करना कठिन समस्या है। क्योंकि फर्म अपने पास उपलब्ध साधनों से किसी वस्तु का निर्माण अथवा उत्पादन तो अधिकतम मात्रा में कर सकती है परन्तु वह उस वस्तु का प्रति इकाई विक्रय मूल्य न तो इतना ऊँचा रख सकती है कि वस्तु का विक्रय ही नहीं हो सके और न ही उसे इतना नीचा रख सकती है कि उससे उस वस्तु की कुल लागत की पूर्ति ही नहीं हो सके। व्यावहारिक दृष्टि से फर्म के व्यवसाय में बने रहने के लिए यह आवश्यक है

कि उसके द्वारा उत्पादित अथवा निर्मित वस्तु के विक्रय से इतना आगम अवश्य प्राप्त हो जिससे उस वस्तु की कुल लागत के साथ-साथ सामान्य लाभ की भी पूर्ति हो सके। मूल्य कम से कम इतना जरूर होना चाहिए जिससे उस वस्तु की कुल लागत तथा एक निश्चित सामान्य लाभ की भी पूर्ति हो सके। यद्यपि मूल्यों एवं लागतों के मध्य किसी दृढ अन्तर्सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, फिर भी मूल्य निर्धारण की प्रत्येक स्थिति में लागत आधार बिन्दु होती है। यही कारण है कि प्रत्येक वस्तु या सेवा के मूल्य निर्धारण के लिए सर्वप्रथम उचित ढंग से उसकी लागत ज्ञात करने पर विशेष बल दिया जाता है, क्योंकि वस्तु की लागत वस्तु के मूल्य तथा मूल्य निर्धारण नीति एवं निर्णय एवं इन दोनों को ही प्रभावित करते हैं। दीर्घकाल में स्थिर लागतें परिवर्तनशील लागतें हो जाती है, अतः मूल्यों की प्रवृत्ति कुल लागत सामान्य लाभ के बराबर होने की रहती है। दीर्घकाल में ही व्यवसाय के विकास के लिये उत्पादों की किस्मों, निर्माण विधियों, संयन्त्र क्षमता तथा विपणन एवं वितरण के तरीको में अन्तर अथवा परिवर्तन किया जाता है। अपने व्यवसाय का विकास करने पर कोई फर्म अपने क्षेत्र में अपना उत्पादन कार्य उस समय तक ही जारी रख सकती है जब तक कि उसके उत्पादों के निर्धारित मूल्य से कुल लागत और विनियोजित पूँजी पर उचित प्रत्याय की पूर्ति होती रहती है। दुसरे शब्दों में, दीर्घकाल में व्यवसाय को जारी रखने के लिए मूल्य का कुल लागत सामान्य लाभ के बराबर और उसके विकास के लिए मूल्य का कुल लागत + अधिलाभ के बराबर होना आवश्यक है। इसके लिए औसत उत्पादन लागत को मूल्य निर्धारण का आधार माना जाता है।


अल्पकाल में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि निर्धारित विक्रय मूल्य से कम से कम कुल लागत का इतना भाग तो प्राप्त हो जाय जिससे परिवर्तनशील लागतों की पूर्ति हो सके। साथ ही व्यवसाय को बनाये रखने के लिए यह भी अपेक्ष की जाती है कि उत्पादों के निर्धारित मूल्यों से विक्रय- मात्राओं, विक्रय मिश्रण तथा मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ावों के कारण संसाधनों की आवश्यकता में जो तत्कालीन परिवर्तन करने पड़ते हैं, उनकी भी पूर्ति होती रहे ।


किसी उत्पादन की सीमान्त लागत अथवा भेदात्मक लागत उसके मूल्य निर्धारण में मार्ग-दर्शक का कार्य करती है। मूल्य निर्धारण के लिए परिवर्तनशील लागतों का विश्लेषण करना आवश्यक होता है क्योंक परिवर्तनशील लागतों को ही लागत विभेदों (cost Differentials) का प्रमुख स्त्रोत माना जाता है।


(3) सरकारी नियन्त्रण - प्रजातान्त्रिक युग में प्रत्येक सरकार आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियन्त्रण रखती है। सरकार उपभोक्ताओं को उचित मूल्यों पर आवश्यक वस्तुएँ सुलभ कराने तथा उद्योगपतियों को न्यायोचित लाभ अर्जित करने की सुविधा देने के लिए मूल्य नियन्त्रण लागू करती है।

लागतों का विश्लेषण ही बताता है कि फर्म की उत्पादन लागत कितनी है तथा कितना लाभ मिल रहा है, अब मूल्य क्या रखा जाय जिससे उपभोक्ताओं को उचित दर पर वस्तु उपलब्ध हो सके तथा उत्पादक को भी उचित लाभ मिलता रहे। उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों के हितों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। मूल्य नियन्त्रण वाली वस्तुओं की लागत बढ़ने तथा घटने पर मूल्यों में भी आवश्यक संशोधन किया जा सकता है।


(3) जनोपयोगी सेवाओं का मूल्य निर्धारित करने के लिए जनोपयोगी सेवाओं का मूल्य, जैसे रेल का किराया, बस का किराया, बिजली के चार्जेज, तथा वाटर चार्जेज आदि भी लागत के आधार पर ही निर्धारित किये जाते हैं। अतः इन सेवाओं की लागतों का विस्तृत एवं गहन अध्ययन आवश्यक है जिससे सही लागत हो सके।


(5) आन्तरिक नियन्त्रण व्यवस्था लागू करने के लिए लाभ को अधिकतम करने के लिए तथा लागतों को न्यूनतम रखने के लिए संस्था के यहाँ आन्तरिक नियन्त्रण व्यवस्था बजट नियन्त्रण अथवा प्रमाप लागत नियन्त्रण के माध्यम से अपनाई जाती है। प्रमाप लागत नियन्त्रण में प्रत्येक क्रिया की प्रमाप लागत निर्धारित की जाती है और फिर उन प्रमापित लागतों की वास्तविक लागत से तुलना की जाती है तथा यह देखा जाता है कि अन्तर अनुकुल है अथवा प्रतिकुल यदि अन्तर अथवा विचरण प्रतिक है तो उसके कारणों का पता लगाया जाता है तथा उनको दूर करने का प्रयास किया जाता है


(6) साधनों का अनुकूलतम संयोग तथा उद्योगों का अनुकूलतम आकार ज्ञात करने के लिए प्रत्येक फर्म कम से कम लागत पर अधिकतम उत्पादन द्वारा अपने लाभ को अधिकतम करना चाहती है।


यह तभी सम्भव है जब उत्पादन के विभिन्न साधनों का अनुकूलतम संयोग प्राप्त हो जाय और फर्म का आकार भी अनुकूलतम हो जाय। विभिन्न उत्पादन के साधनों का अनुकूलतम संयोग प्राप्त करने और फर्म का अनुकूलतम आकार प्राप्त करने में लागत विश्लेषण सहायक होता है,

क्योंकि फर्म महँगे साधनों के स्थान पर सस्ते उत्पादन के साधनों का प्रतिस्थापन तब तक करती रहेगी, जब तक कि प्रत्येक उत्पादन के साधनों की सीमान्त उत्पत्ति एवं उसकी कीमत का अनुपात दूसरे साधनों की सीमान्त उत्पत्ति एवं उसकी कीमत के अनुमात के बराबर नहीं हो जाये।


(7) वास्तविक लागत, प्रमाप लागत तथा अनुमानित लागत में तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा लागत विश्लेषण से वास्तविक लागत प्रमाप लागत तथा अनुमानित लगात की विस्तृत एवं व्यापक जानकारी मिलती है, जिससे पूर्वानुमान लगाकर अनेक प्रबन्धकीय निर्णय लिये जा सकते हैं। प्रबन्धक इन सुचनाओं के आधार पर उन कारणों का पता लगा सकता है जिनके कारण ये लागतें अधिक हैं तथा उन कारणों को दूर करने का तरीका निकाला जाता है जिससे संस्था की वास्तविक लागत न्युनतम हो ।


(8) संस्था के लाभप्रद तथा अलाभप्रद कार्यों की जानकारी प्रत्येक उत्पादन संस्थान की अनेक क्रियायें, प्रकियोयें, विभाग आदि होते हैं लागत विश्लेषण से इन क्रियाओं, प्रक्रियाओं तथा विभागों की पृथक-पृथक लागत लाभ तथा विक्रय ज्ञात हो जाता है, जिससे यह ज्ञात हो जाता है कि कौनसी किया, प्रक्रिया तथा विभाग लाभ पर चल रहे तथा कौन से हानि पर चल रहे है जिससे हानियों को दूर किया जाय और यदि यह सम्भव नहीं हो तो उन क्रियाओं, प्रक्रियाओं अथवा विभागों को बन्द किया जाये।


(9) लाभ तथा हानि के कारणों का ज्ञान लागत विश्लेषण के माध्यम से उन कारणों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है जिनसे संस्था को हानि हो रही है तथा प्रबन्धक उन कारणों को दूर करने का प्रयास कर सकता है।


( 10 ) अपव्यय का ज्ञान कहाँ अपव्यय है और इसको कैसे रोका जा सकता है? लागत विश्लेषण इस कार्य में सहयोग देता है। लागत विश्लेषण से केवल यही ज्ञात नहीं होता है कि वस्तु के निर्माण की लागत विश्लेषण से केवल यही नहीं होता है कि वस्तु के निर्माण की लागत क्या है ? बल्कि उन्हें किस तरह से न्यूनतम किया जा सकता है जिससे अपव्यय को दूर किया जा सके।


(11) भविष्य के लिए योजना निर्माण तथा नीति निर्धारण में सहायक- किसी कार्य को करने अथवा नही करने का निर्णय प्रबन्धकों को लेना पड़ता है और निर्णय हेतु पूर्वानुमान आवश्यक है। पूर्वानुमान के लिए ऑकड़ों की आवश्यकता होती है जिनके माध्यम से भावी योजना व नीति तय की जा सकती है। लागत विश्लेषण इस रूप में प्रबन्धक के लिए मार्ग-दर्शक का कार्य करते हैं। इसी आधार पर प्रबन्धक यह तय करता है कि विभिन्न प्रकार के उत्पादन में कौन-सा उत्पादन किया जाये, उत्पादन के लिए कौनसा विकल्प अपनाया जाये, उत्पादन की अधिकतम मात्रा क्या होनी चाहिए, स्वय उत्पादन करे या बाजार में से कय करके विक्रय किया जावे।


(12) टेण्डर मूल्य निर्धारित करने में सहायक - साधारणतया सरकार तथा अन्य विक्रेताओं द्वारा निर्माणी संस्था से टेण्डर मूल्य आमन्त्रित किये जाते हैं। लागत विश्लेषण द्वारा गत अवधि की लागत तथा वर्तमान प्रवृति के माध्यम से टेण्डर मूल्य आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।

(13) विक्रय नीति निर्धारित करने में सहायक-विक्रय क्षेत्र के चुनाव में लागत विश्लेषण की पद्धति सहायक होती है अर्थात् जिस बाजार में कम लागत पर अधिक विक्रय किया जा सकता है उस बाजार को चुना जा सकता है।


(14) वित्तीय लेखांकन को समझने में सहायक लागत विश्लेषण वित्तीय लेखांकन की पूरक मानी जाती है। लागत विश्लेषण में लेखे विश्लेषणात्मक रूप में होते हैं जिससे वित्तीय लेखों को समझे में पर्याप्त सहायता मिलती है।


(15) लाभ की विस्तृत जानकारी लागत विश्लेषण से केवल लाभ या हानि ही ज्ञात नहीं होती बल्कि इस बात का भी ज्ञान हो जाता है कि किस विभाग या प्रक्रिया या वस्तु से कितना लाभ या नुकसान हुआ और इसके क्या कारण है?


( 16 ) वित्तीय लेखों की शुद्धता की जाँच - लागत विश्लेषण से वित्तीय लेखों की जाँच की जा सकती है और यदि कोई त्रुटि है तो उसका सुधार किया जा सकता है।