व्यर्थ संविदा - void contract

व्यर्थ संविदा - void contract


व्यर्थ संविदा का कोई कानूनी महत्व नहीं होता। व्यर्थ संविदा का आशय ऐसे संविदा से है जो राजनियम द्वारा स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित कर दिया गया हो। ऐसे बहुत से करार होते हैं जो नैतिक तथा सामाजिक दृष्टिकोण से अव्यावहारिक होते हैं और जो लोकनीति के विरुद्ध होते हैं। ये सब व्यर्थ संविदा की श्रेणी में आते हैं और इनका कोई कानूनी महत्व नहीं होता है।


भारतीय अनुबंध अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अधीन निम्नलिखित ठहराव स्पष्ट रूप से व्यर्थ घोषित हैं : 


i. विवाह में रुकावट डालने वाले ठहराव भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 26 के अनुसार,


“प्रत्येक ऐसा ठहराव जो अवयस्क को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति के विवाह में रुकावट डालने के  लिए हो व्यर्थ होता है।"

भारतीय राजनियम के अनुसार विवाह करना एवं विवाहित दशा में रहना प्रत्येक वयस्क नागरिक का मूलभूत अधिकार है।


ii. व्यापार में रुकावट डालने वाले ठहराव भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 27 के अनुसार, “ऐसा ठहराव जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को वैध धंधा, व्यवसाय, व्यापार अथवा कारोबार करने के अधिकार से वंचित करना हो, वह ठहराव व्यर्थ होगा ।" प्रत्येक व्यक्ति को वैधानिक व्यापार अथवा कारोबार या धंधा करने का अधिकार प्राप्त है और इसमें रुकावट डालने वाला प्रत्येक ठहराव व्यर्थ होता हैं । ऐसी रुकावट सामान्य हो अथवा आंशिक शर्तयुक्त हो अथवा शर्त-रहित, ठहराव व्यर्थ माना जाता है।


धारा 27 के अपवादः व्यापार में रुकावट डालने वाले सभी ठहराव व्यर्थ होते हैं, किन्तु इस धारा के निम्नलिखित अपवाद हैं:


• व्यापार की ख्याति का विक्रय ।


• विद्यमान साझेदारों पर प्रतिबंध ।


• साझेदारी भंग होने अथवा इसकी आशंका ।


• साझेदारी से मिलता-जुलता कार्य


• सेवा संबंधी ठहराव


• आपसी प्रतियोगिता को रोकने के लिए व्यापारिक संयोजन ।


• व्यापारिक व्यवहारों की स्वतंत्रता पर रोक।


iii. वैधानिक कार्यवाही में रुकावट डालने वाले ठहराव भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा


28 के अनुसार, "ऐसा प्रत्येक ठहराव, जिसके द्वारा कोई पक्षकार किसी ठहराव के अधीन उससे संबंधित अपने अधिकारों को साधारण न्यायालय में प्रचलित वैधानिक कार्यवाही द्वारा प्रवर्तित कराने से पूर्णतया रोका जाता है, अथवा जो उस समय को सीमित करे जिसके अन्दर वह अपने अधिकारों को प्रवर्तित करा सकता है, उस सीमा तक व्यर्थ होता है। " प्रत्येक ऐसा ठहराव जो न्याय के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है, व्यर्थ होता है क्योंकि उसका उद्देश्य अवैध है।


उपर्युक्त परिभाषा के अनुसार, ऐसे ठहराव जो साधारण न्यायालय में किसी व्यक्ति को अपने अधिकार को प्रवर्तित करने से रोकते हैं अथवा जो भारतीय लिमिटेशन अधिनियम द्वारा प्रदान की गई अवधि कोक करते हैं, व्यर्थ होते हैं।


iv. ऐसे ठहराव जिनका अर्थ निश्चित न हों भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 29 के अनुसार, ...ऐसे ठहराव जिनका अर्थ निश्चित न हो अथवा निश्चित न किया जा सकता हो, व्यर्थ होते हैं।" यदि पक्षकार स्वयं न तो ठहराव के अर्थ को समझते हैं और न इनका अर्थ निश्चित किया जा सकता है, तो यह स्वाभाविक प्रतीत होता है कि ऐसे ठहराव को कार्यान्वित नहीं कराया जा सकता है


V. बाजी लगाने के रूप में किये गए ठहराव भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 30 के अनुसार, "बजी लगाने के रूप में किये गए ठहराव व्यर्थ होते हैं।"


किसी अनिश्चित घटना के तय होने पर रूपया अथवा एनी वस्तु देने का वचन, बाजी लगाना होता है। बाजी लगाने के ठहराव पर जीता गया धन या ऐसे ठहराव के अथवा किसी अनिश्चित घटना के परिणाम को मानने की गारंटी स्वरुप किसी अन्य व्यक्ति को सौंपे गए धन को वापस पाने हेतु कोई वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।