अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कार्य प्रणाली - working of international monetary fund
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कार्य प्रणाली - working of international monetary fund
मुद्रा कोष की कार्य प्रणाली में मुख्य रूप से निम्न शामिल हैं -
(क) विदेशी मुद्रा संबंधी कार्य-अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सदस्य देशों की मांग पर उस देश की मुद्रा अथवा स्वर्ण के बदले उन देशों को वांछित विदेशी मुद्रा उपलब्ध करवाता है। विदेशी मुद्रा की पूर्ति निम्न तीन सीमाओं के अंतर्गत ही की जाती है -
(i) मांगी गई मुद्रा दुलर्भ मुद्रा घोषित न की गई हो
(ii) मांगी गई मुद्रा का प्रयोग चालू भुगतान के लिए ही किया जाता है।
(iii) जो सदस्य देश अपनी मुद्रा के बदले विदेशी मुद्रा की माग कर रहे है, उससे सदस्य देश के अभ्यश में एक वर्ष में 25 प्रतिशत की सीमा छूट दी जा सकती है।
सहायता की सीमा - (i) मुद्रा कोष प्रार्थी देश के अभ्यंश के बराबर तक सहायता दे सकता है। यह सहायता 5 वर्ष की अवधि के लिए होती है तथा विदेशी मुद्रा में की जाती है। (ii) अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष केवल अस्थायी असंतुलन को दूर करने के लिए ऋण देता है। वास्तव में जब किसी देश के विदेशी विनिमय कोष समाप्त हो जाए अथवा किसी अन्य अस्थायी संकट के कारण देश भुगतान न कर सके तो ही मुद्रा कोष उस देश की सहायता करता है। सामान्य रूप से मुद्रा कोष निम्नलिखित रूपों में सहायता प्रदान करता है:
(i) विनिमय कठिनाई दूर करना- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष उन देशों को आर्थिक सहायता देता है जिनकी अर्थव्यवस्था विदेशी व्यापार पर निर्भर करती है। इसमें साथ ही उन देशों के निर्यात वर्ष के कुछ महीने में होते हैं। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष विनिमय कठिनाई को दूर करता है
(ii) भुगतान संतुलन सुधारने के लिए आर्थिक नियोजन के कारण भुगतान प्रतिकूल हो जाता हैं। इसे सुधारने के लिए मुद्रा कोष प्रदान करता है।
(iii) विनिमय दर स्थिरता के लिए आर्थिक स्थिति की दुर्बलता के कारण कुछ देशों को अपनी विनिमय दर स्थिर रखने में कठिनाई होती है। उन देशों को भी मुद्रा कोष द्वारा आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।
(iv) संकटकालीन सहायता जब किसी देश की आर्थिक अथवा राजनीतिक संकट के कारण आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है तो इस स्थिति को सुधारने के लिए मुद्रा कोष द्वारा अल्पकालीन सहायता प्रदान की जाती है।
(ख) मुद्रा का दोबारा क्रय- जब किसी देश को मुद्रा कोष से ऋण लेना पड़ता है तो उसे अपनी मुद्रा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को बेचनी पड़ती है तभी वह किसी अन्य देश की मुद्रा खरीद सकता है। इस प्रकार ऋणी देश के मुद्रा के भंडार में इस देश के अभ्यश की तुलना में अधिक वृद्धि हो जाती है। इन ऋणों को चुकाने को ही दोबारा क्रय कहा जाता है। प्रत्येक ऋणी देश के लिए अपनी बेची मुद्रा को 5 वर्ष के अंदर पुन खरीदना आवश्यक होता है। ऐसा करने के लिए वह किसी भी सदस्य देश की मुद्रा का प्रयोग कर सकता है। यदि ऐसा संभव न हो तो ऋणी देश को सोने के बदले में अपनी मुद्रा वापिस खरीदनी पड़ती है।
(ग) दुर्लभ मुद्रा - यदि किसी देश का भुगतान संतुलन निरंतर पक्ष में होने पर उस देश की मुद्रा की मांग काफी बढ़ जाए अथवा किसी कारण से मुद्रा कोष यह अनुभव करे कि उसके पास किसी देश की मुद्रा दुर्लभ हो गई है
तो वह दुर्लभता के कारणों के साथ इसकी सूचना सदस्य देशों को देता है। साथ ही ऐसी स्थिति में यदि कोष अपने साधनों से उस देश की मुद्रा की पूर्ति नहीं कर सकता तो वह संबंधित मुद्रा की मांग पूरी न की जा सके तो मुद्रा कोष द्वारा इस मुद्रा को दुर्लभ मुद्रा घोषित कर दिया जाता है। सदस्य देशों को उस मुद्रा का प्रयोग सीमित करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है।
(घ) ट्रस्ट कोष की स्थापना- मुद्रा कोष ने 1976 में एक ट्रस्ट कोष की स्थापना की। इसके लिए पांच वर्ष की अवधि में कोष द्वारा 25 मिलियन औसत स्वर्ण बेचकर इससे प्राप्त होने वाले आधिक्य का अधिकांश भाग ट्रस्ट कोष में जमा करने का निर्णय लिया गया। इस कोष से विकासशील देश 1/2 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ऋण ले सकते हैं।
(ङ) पूरक वित्तीय सुविधा: - यह सुविधा सन 1979 आरंभ की गई। इसके अंतर्गत कोष के द्वारा सामान्य सहायता के अतिरिक्त पूरक वित्तीय सहायता भी दी जाती है। यह सहायता सदस्य देशों के भुगतान संतुलन के विपरीत होने पर दी जाती है यह सुविधा प्रायः दीर्घकाल के लिए होती है।
(च) सेवा शुल्क:- जब मुद्रा कोष किसी सदस्य देश को ऋण देता है तो जिस मुद्रा में ऋण दिया जाता है, कोष के पास उस मुद्रा की मात्रा में कमी हो जाती है परंतु ऋणी देश की मुद्रा की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। यदि कोष में जिस देश की मुद्रा की मात्रा उसक अभ्यश से अधिक हो जाती है तो वह देश कोष का ऋणी बन जाता है। ऐसी स्थिति में कोष अधिक मुद्रा की मात्रा पर संबंधित देश से शुल्क वसूल करता है।
(छ) विदेशी विनिमय नियंत्रण संबंधी सलाह- मुद्रा कोष स्वतंत्र व्यापार के पक्ष में है, ताकि अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह अथवा पूजी के पलायन को रोका जा सके। फिर भी यह विनिमय नियंत्रण को अपनाने की सलाह देता है। इसके अतिरिक्त संकटकाल में अथवा दुर्लभ मुद्रा के संबंध में भी विनिमय नियंत्रण अपनाने की छूट दी जाती है।
(ज) विशेषज्ञों की सेवाए- मुद्रा कोष द्वारा सदस्य देशों को अपने विशेषज्ञों की सेवाए प्रदान की जाती हैं। यह बाहरी विशेषज्ञों को भी जटिल समस्याओं के लिए सदस्य देशों में भेजता है। मुद्रा कोष द्वारा दी जाने वाली सहायता भुगतान संतुलन की समस्या से लेकर आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र की किसी भी विशेष समस्या से संबधित हो सकती है।
कोष के विशेषज्ञों ने कई देशों को कर, मुद्रा विनिमय तथा विकास नीतियों के संबंध में सहायता दी है। कुछ देशों में मुद्रा कोष के सहयोग से केंद्रीय बैंकों की स्थापना एवं उनके विभिन्न विभागों की व्यवस्था भी की है। इसके लिए कोष के विशेषज्ञों को एक सप्ताह से लेकर एक वर्ष तक की अवधि के लिए संबंधित देश में रहना पड़ता है।
(झ) प्रशिक्षण कार्यक्रम-अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सन 1951 से सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम आरंभ किया है। इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय भुगतान, आर्थिक विकास और वित्तीय व्यवस्था तथा उनके विश्लेषणों से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण की अवधि 6 मास से लेकर 1 वर्ष तक होती है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम केंद्रीय बैंक तथा सरकार के वित्त विभाग के उच्च पदाधिकारियों के लिए आरंभ किया गया है। इसके अंतर्गत मौखिक व्याख्यानों एवं वाद-विवाद के अतिरिक्त व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। (अ) प्रकाशन संबंधी कार्य मुद्रा कोष प्रकाशन का कार्य भी करता है। यह मुद्रा, बैंकिंग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं प्रशुल्क नीति से संबंधित अनेक प्रकाशन भी निकालता है।
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