समामेलन अथवा पंजीकरण - amalgamation or registration

समामेलन अथवा पंजीकरण - amalgamation or registration


समामेलन कंपनी के निर्माण की दूसरी अवस्था है। इसके लिए कंपनी रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण कराना पड़ता है। प्रस्तावित कंपनी को पंजीकृत कराने से पहले प्रवर्तकों को निम्नलिखित प्रारंभिक कार्यवाहियों करनी होती है:


1) कंपनियों के रजिस्ट्रार से यह पता करना कि प्रस्तावित कंपनी के लिए निश्चय किया गया नाम उपलब्ध है अथवा नहीं।


2) उद्योग ( विकास एवं विनिमय) अधिनियम, 1951 के अंतर्गत एक आशय पत्र पात्र करना जो बाद में औद्योगिक लाइसेनन में परिवर्तित किया जाना हो।


3) हामीदार (Under niter) दलाल, बैंक, कानूनी सलाहकार, लेखा-परीक्षक तथा ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति को निश्चित करना।


4) ज्ञापन पत्र एवं अंतर्नियमावली तैयार करना तथा छपवाना।


कंपनी अधिनियम की धारा 7 में कंपनी के समामेलन के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान है :


1) उपरोध प्रार्थना पत्र के साथ उस राज्य के कंपनी रजिस्ट्रार के पास जिसमें कंपनी का पंजीयत कार्यालय स्थित होगा, पंजीयन के लिए निम्नलिखित प्रपत्र एवं सूचनाएँ जमा करनी होगी


क) ज्ञापन पत्र के सभी अभिदान कर्ताओं द्वारा हस्ताक्षर किया हुआ निर्धारित तरीके से कंपनी का ज्ञापन पत्र एवं अंतर्नियमावली।


ख) कंपनी के निर्माण में सहायता करनेवाले वकील लागत लेखाकार चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट या व्यवसायरत कंपनी सचिव द्वारा, तथा कंपनी की अंतर्नियमावली में संचालक, प्रबंधक या सचिव रूप में नामांकित व्यक्ति द्वारा निर्धारित प्रारूप में यह घोषणा की जायेगी कि कंपनी के पंजियन संबंधित मामलों के बारे में कंपनी अधिनियम तथा इसके अधीन बनाये गये नियमों की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर दिया गया है।


ग) ज्ञापन पत्र के प्रत्येक अभिदानकर्ता तथा उन व्यक्तियों, जिनका नाम प्रथम संचालक यदि कोई हो, के रूप में अंतर्नियमावली में लिखा हो, को शपथ-पत्र पर ऐसी घोषणा करनी चाहिए कि उसे कंपनी के प्रवर्तन निर्माण या प्रबंध के संबंध में अपराधी नहीं ठहराया गया है।


घ) जिस स्थान पर कंपनी का पंजीकृत कार्यालय स्थापित होने तक पत्र-व्यवहार किया जा सके उसके पते की सूचना दी जानी चाहिए।


ङ) पहचान के साक्ष्य सहित ज्ञापन पत्र के प्रत्येक अभिदानकर्ता का नाम, निवास का पता, राष्ट्रीयता एवं अन्य निर्धारित विवरण :


च) कंपनी के प्रथम संचालकों के रूप में अंतर्नियमावली में वर्णित व्यक्तियों का विवरण, उनके नाम, संचालक पहचान संख्या, निवासीय पता, राष्ट्रीयता तथा पहचान के साक्ष्य के साथ अन्य निर्धारित विवरण:


छ) कंपनी के प्रथम संचालकों के रूप में अंतर्नियमावली में वर्णित व्यक्तियों के अन्य निगमित निकायों या फर्मों में हित का विवरण तथा ज) कंपनी के संचालकों की इस बात की लिखित सहमति कि वे उस हैसियत से कार्य करने को तैयार हैं। 


2) उपरोक्त उप-धारा (1) के अधीन फाइल किये गये प्रपत्रों एवं दी गई सूचनाओं के आधार पर रजिस्ट्रार द्वारा प्रपत्रों व सूचनाओं को रजिस्टर कर लिया जाता है तथा कंपनी को समामेलन का प्रमाण-पत्र निर्धारित प्रारूप में निर्गमित कर दिया जाता है।


3) कार्पोरेट पहचान संख्या का आबंटन करना- कंपनी अधिनियम की धारा 7 (3) के अनुसार, उपरोक्त उप-धारा (2) के अधीन जारी किये गये समामेलन प्रमाण-पत्र में वर्णित तिथि पर रजिस्ट्रार कंपनी को कार्पोरेंट पहचान संख्या आबंटित करेगा।


4) कंपनी द्वारा पंजीयन के उद्देश्य से रजिस्ट्रार के पास उपरोक्त उप-धारा (1) के अधीन जमा किए गए सभी प्रपत्रों एवं सूचनाओं की प्रतिलिपियों को मूल रूप में अपने पंजीकृत कार्यालय में कंपनी के विघटन तक रखना एवं संरक्षित करना आवश्यक है।


5) यदि कोई व्यक्ति कंपनी के पंजियन के संबंध में रजिस्ट्रार के पास फाइल किए गए किन्हीं प्रपत्रों में जान-बूझकर सूचनाओं का झूठा अथवा असत्य विवरण देता है या किसी सारभूत सूचना को छिपाता है तो उसके विरूद्ध कंपनी अधिनियम की धारा 447 के अधीन कार्यवाही की जायेगी।


6) यदि यह साबित हो जाये कि कंपनी के समामेलन हेतु दिए गए प्रपत्रों में कोई असत्य या गलत सूचना या मिथ्या कथन अथवा किसी सारभूत तथ्य या सूचना को छिपाकर समामेलन कराया गया है. तो प्रवर्तक, कंपनी के प्रथम संचालकों के रूप में नामित व्यक्ति व उपरोक्त उप-धारा (1) के वाक्य (ख) के अधीन घोषणा करने वाले व्यक्ति कंपनी अधिनियम की धारा 447 के अधीन कपट के लिए दंडनीय होंगे।


7) उपरोक्त उपधारा (6) में वर्णित दशा में यदि कोई व्यक्ति ट्रिब्यूनल से शिकायत करता है तथा ट्रिब्यूनल संतुष्ट हो जाता है कि शिकायत सत्य है तो वह निम्नांकित कार्यवाही कर सकता है:


क) जनहित अथवा कंपनी एवं इसके सदस्यों व लेनदारों के हित में ज्ञापन पत्र व अंतर्नियमावली में परिवर्तन हेतु तथा कंपनी के प्रबंध के नियमन हेतु कोई भी उपयुक्त आदेश दे सकता है; अथवा


ख) सदस्यों का दायित्व असीमित करने का आदेश दे सकता है; अथवा


ग) कंपनियों के रजिस्ट्रार से कंपनी के नाम को हटाने का आदेश दे सकता है; अथवा


घ) कंपनी के समापन का आदेश दे सकता है; अथवा


ङ) कोई अन्य आदेश दे सकता है जो वह उपयुक्त समझे ।